Gyan Ganga: प्रभु ने बालि को समझाया कि निर्बल को बलवान बनाना ही वास्तविक बल है

Gyan Ganga: प्रभु ने बालि को समझाया कि निर्बल को बलवान बनाना ही वास्तविक बल है

ठीक वैसे ही जैसे एक पिता की पाँच संतानें में से तीन तो पिता की सेवा करते हैं और सदैव उनकी आज्ञा में रहते हैं। परंतु शेष दो परिवार की समस्त मर्यादाओं को तोड़कर केवल बदनामी कमाते हैं। और खानदान का नाम मिट्टी में मिलाते है। तो निर्णय स्पष्ट है कि पिता को अपनी आज्ञा में चलनी वाली तीन संताने अधिक प्रिय होंगी।

कितने आश्चर्य की बात है कि मानव किसी की तरफ बड़ी सहजता से अंगुली उठा देता है। लेकिन यह देखना भूल जाता है कि जब वो किसी की तरफ एक अंगुली उठाता है तो उसकी तीन अंगुलियां उसकी खुद की तरफ होती है। अर्थात जिन्हें हम अधर्मी कहने की भूल करते हैं, हो सकता है हम उसस और भी तीन गुना अधिक अधर्मी हो। लेकिन अपनी पीठ पे दाग किस को दिखाई देता है? यद्यपि सामने वाले के माथे का तो हम भाग्य तक भी पढ़ने को जाते हैं। और हद तो तब हो जाती है, जब हम साक्षात ईश्वर पर भी अंगुली उठाने का दुस्साहस करने लगतें हैं। और बालि यही दुस्साहस करता है। साथ में श्रीराम जी से एक प्रश्न भी करता है-

मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।।

 

कैसा पर्दा है माया का। दुनिया को चाँद तक की तो सूचना रहती है कि वहाँ क्या है, क्या था और क्या होने वाला है। लेकिन स्वयं के हृदय का भी भान नहीं रहता कि यह कितना पावन था और अब कितना मलिन है और जाने भविष्य में क्या करवट लेगा। बालि का यह पूछना कि मैं आपका शत्रु कैसे हूँ और सुग्रीव आपको प्यारा क्यों है? और कम से कम मुझे मारने से पहले मुझे मेरे अंदर कोई अवगुन तो बता देते।

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सज्जनों कैसा हास्यस्पद प्रश्न है। बालि कह रहा है कि मैं बैरी क्यो और सुग्रीव प्यारा क्यों? तो पहली बात तो यह है कि प्रभु किसी के शत्रु होते ही नहीं। हाँ हम भले ही प्रभु के शत्रु बन जाते हैं। श्रीराम तो रावण को भी बैर की दृष्टि से नहीं देखते, बस रावण ही था जो श्रीराम जी से ज़बरदस्ती बैर व हठ करने का प्रण लिए बैठा है। प्रभु भला किसी से क्या बैर करेंगे, क्या किसी ने उनका कुछ छीन लिया है, अथवा कोई उन्हें हानि पहुँचा रहा है? प्रभु से भला क्या छीना जा सकता है? क्योंकि किसी से जब कोई कुछ छीनता है, तो उस वस्तु को छीनकर ऐसे स्थान पर रखा जाता है जहाँ पर छिनी वस्तु के मालिक की पहुँच न हो। तो प्रभु से छीनकर कोई जीव क्या ऐसे स्थान पर जा सकता है, जहाँ पर प्रभु न हो? सृष्टि के कण-कण में तो प्रभु रमण कर रहे हैं। तो छीनकर भागने वाला जहाँ भी जाएगा, तो प्रभु के पास ही जाएगा। प्रभु किसी से उस अवस्था में ही बैर करते शोभा देते हैं, जब कोई उन्हें हानि पहुँचा रहा हो। सोचने का विषय है कि क्या कोई भी माया रचित जीव प्रभु को हानि पहुँचाने में सक्षम है? यह तो बिलकुल वैसे ही है कि कोई व्यक्ति तलवार से हवा को चीरने लगे। अथवा नदी के पानी को तीर मारकर भेदना चाहे। क्या वास्तविकता में ऐसा होता है? अर्थात कोई ऐसी बाध्यता तो है ही नहीं कि ईश्वर किसी जीव से बैर करे। लेकिन हाँ किसी जीव विशेष से वह प्रेम अवश्य कर सकता है। ध्यान दीजिएगा हमने ईश्वर के संदर्भ में ‘विशेष प्रेम’ की बात की है क्योंकि सामान्यता उनका सहज प्रेम तो सभी जीवों से ही है। गोस्वामी जी कहते भी है-‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ क्योंकि समस्त जीवों को ईश्वर ने उत्पन्न किया है। तो सभी जीव उसको प्रिय तो होंगे ही, लेकिन उनमें से भी जो जीव ईश्वर द्वारा प्रदत्त सृष्टि संचालक नियमों  का निष्ठा से पालन करते हैं तो वे उन्हें विशेष रूप से प्रिय होते हैं। 

ठीक वैसे ही जैसे एक पिता की पाँच संतानें में से तीन तो पिता की सेवा करते हैं और सदैव उनकी आज्ञा में रहते हैं। परंतु शेष दो परिवार की समस्त मर्यादाओं को तोड़कर केवल बदनामी कमाते हैं। और खानदान का नाम मिट्टी में मिलाते है। तो निर्णय स्पष्ट है कि पिता को अपनी आज्ञा में चलनी वाली तीन संताने अधिक प्रिय होंगी। अब प्रश्न उठता है कि जीव का उद्देश्य क्या है? सभी धार्मिक ग्रंथ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जो कि भोग योनि के साथ-साथ कर्म योनि भी है। और मानव के अतिरिक्त शेष योनियां केवल भोग योनियां हैं। वे कोई नया कर्म कर ही नहीं सकतीं। बस अपने प्रारब्बध में लिखे लेखों के भोग सकती हैं। मानव के लिए सकारात्मक पक्ष यही था कि वह नया कर्म भी कर सकता है। लेकिन नए कर्म से तात्पर्य मात्र यह नहीं था कि बंधन बांधने वाले कर्म ही करता जाए। बंधन तोड़ने वाला कर्म भी तो करना था। और वह कर्म था ईश्वर की भक्ति, सेवा व अर्चना। सुग्रीव भले ही थोड़ी मनमानी करता है। लेकिन थोड़ा यहाँ-वहाँ भटककर वह पुनः श्रीराम जी की ही शरणागत होता है। उनकी सेवा में तत्पर होता है। और इसीलिए सुग्रीव श्रीराम जी को अधिक प्रिय व सनेही है।

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बालि के भीतर जो असीमित बल था, वह भी तो प्रभु का ही दिया हुआ था। और प्रभु तो ऐसे हैं कि सबको सिर्फ बल ही देते हैं। किसी को निर्बल करना तो उनकी रीति, प्रीति व नीति में है ही नहीं। और बल देने के पीछे प्रभु की यही भावना है कि इस बल का प्रयोग किसी को उठाने के लिए तो अवश्य करना लेकिन गिराने के लिए गलती से भी न करना। आपका बल किसी के शारीरिक, मानसिक व आत्मिक उत्थान का कारण बने तो मानो आप साक्षात प्रभु का ही प्रतिबिंब हैं। अन्यथा हम धरती पर भार से ज्यादा और कुछ भी नहीं। और भार को अधिक समय तक कोई नहीं ढोता है। लिहाज़ा यह धरा भी नहीं। बालि भी अपने अहंकार के कारण धरती पर एक भार ही बनकर रह गया था। और धरा के साथ-साथ, धरा स्वामी श्रीराम जी ने भी धरा के भार को भार मुक्त करने की अब ठान ली थी। घटनाक्रम में ऐसे बिलकुल भी नहीं था कि श्रीराम जी के मन में कहीं भी बैर भाव आया हो। लेकिन हाँ प्रभु को यह सोचकर निराशा अवश्य होती है, कि मैंने इसे इतना बल दिया लेकिन इसका सारा बल इसी सोच में व्यर्थ चला गया कि सभी मेरे (बालि) समक्ष निर्बल कैसे बने।

अगले अंक में बालि के उन अवगुणों की चर्चा होगी जो प्रभु ने उसे बताए---(क्रमशः)---जय श्रीराम

- सुखी भारती







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