Gyan Ganga: भक्त हनुमान एवं भगवान श्रीराम का अलौकिक व मीठा वार्तालाप

Hanuman
सुखी भारती । Dec 10 2020 3:56PM

प्रभु श्रीराम जी के नयन श्री हनुमान जी के भाव को अमृत की तरह पी रहे थे। और श्री हनुमान जी के इन तर्कों को नकार रहे थे। मानो कह रहें हों कि हे हनुमंत! पहली बात तो तुम मंद कतई नहीं हो। अगर यही तुम्हारा दृढ़ मानना है कि तुम मंद हो तो हमें वह भी अत्यंत प्रिय है।

गतांक से आगे...श्री हनुमान जी ने सोचा कि मैं भी कितना पगला हूँ। पहले तो परीक्षक व निरीक्षक बना रहा और उलाहनों व तानों की लड़ी बुन डाली। जो शायद आगे भी जारी रहे। लेकिन अपनी व्यथा तो मैंने अभी तक नहीं बताई। न ही यह बताया कि प्रभु आप बिन जीवन उस बगिया के समान है जिससे बहार रुठी-सी पड़ी है। और इस बगिया की प्रत्येक कली, फूल, व पत्ती पर सिर्फ और सिर्फ पत्तझड़ का ही स्थाई डेरा है। नयन आपकी बाट जोह−जोह कर इतने थक गए हैं कि पत्थर से हो गए हैं। इसकी पुतलियां नरम मास की गुठली नहीं अपितु पत्थर की डलियां सी बन गईं हैं। और हृदय का सन्नाटा तो यूं है कि जैसे कोई अनाथ पड़ा मरुस्थल का टीला हो। नेत्राों से अश्रुपात करते हुए हनुमंत लाल प्रभु श्री राम जी से विनती करते हैं−

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।


पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।

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अर्थात् हे प्रभु एक तो मैं यूँ ही मंद मति हूँ। दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञानी भी हूँ। फिर हे दीन बंधु भगवान! आप ने मुझे भुला दिया। श्री हनुमान जी के हृदय से अब कहीं जाकर यह भार थोड़ा हल्का हुआ कि कम से कम मैंने अपनी वास्तविक दयनीय दशा तो प्रभु चरणों में उड़ेली। इतिहास मेरी मूढ़ता का साक्षी तो रहे कि केवल 'ब्राह्मण का वेष' बना लेने से ही 'ब्रह्म' समझ में नहीं आ पाता। अगर समझ ही होती तो मैं यह प्रश्न कदाचित न पूछता कि आप कौन हो? अपितु यह पूछता कि प्रभु मुझे आखिर यह तो बताओ कि मैं कौन हूँ? ब्राह्मण तो ज्ञानी होता है। सब जानता है लेकिन मैंने क्या जाना? कुछ भी तो नहीं! निरा मंद नहीं तो और क्या हूँ मैं? मंद न होता तो क्या मैं सूर्य को पफल समझ कर खाता? थोड़ा सोचता न कि नहीं मेरे प्रभु तो स्वयं सूर्यकुल से हैं। तो भला मैं सूर्य का निरादर कैसे करुँ। लेकिन मैं कहाँ टला? मंदबुद्धि वानर जो ठहरा। वानर भला कुछ बिगाड़े बिना आखिर रह ही कैसे सकता है?

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सबको पता है कि मैं पवन पुत्र हूँ। साक्षात् पवन देव हूँ। बह कर कहीं भी जा सकता हूँ। लेकिन बस वर्षों से यहीं रुका बैठा हूँ। एक बार भी सोचा कि प्रभु अगर चल कर मुझ तक नहीं पहुँचे तो क्यों न मैं ही अयोध्यापुरी पहुँच जाऊँ। मुझे भला वहाँ दाखिल होने से कौन रोक सकता था। क्या हवा किसी के रोकने से रुकी है? लेकिन मैं कैसा मंदमति हूँ कि आज तक अकारण ही रुका रहा। यह मेरा मंद होना नहीं तो और क्या है? बहा तो ऐसा बहा कि सूर्य देव को भी अपने मुख में बहा ले गया और रुका तो ऐसा रुका कि सूर्यपुत्र सुग्रीव की चौखट को कभी लांघा ही नहीं। न मेरे बहने में नियंत्रण है और न ठहरने की सीमा है। आज प्रभु ने स्वयं मेरी सुध लेनिे की सोची तो मैं 'अखिल चतुर शिरोमणि' बन बैठा।

प्रभु श्रीराम जी के पावन सुंदर नयन श्री हनुमान जी के इस पावन भाव को अमृत की तरह पी रहे थे। और श्री हनुमान जी के इन तर्कों व दावों को सिरे से नकार रहे थे। मानो कह रहें हों कि हे हनुमंत! पहली बात तो तुम मंद कतई नहीं हो। अगर यही तुम्हारा दृढ़ मानना है कि तुम मंद हो तो हमें वह भी अत्यंत प्रिय है। क्योंकि मंद होना तुम्हारा अवगुण नहीं अपितु गुण है। क्योंकि पवन का बहना तो तभी अच्छा लगता है न जब वह 'मंद−मंद' बहे। और तुम्हारा यही ठहर जाना और गति की सीमा तोड़ते हुए सूर्य तक पहुँच कर उसे निगल लेना कुछ भी तो आपत्तिजनक नहीं है। क्योंकि पवन को कभी−कभी ठहरना भी चाहिए। कब? जब आरती के समय ज्योति प्रज्ज्वलित करने का समय हो। हे हनुमंत! निश्चित ही आप जानते हैं कि सुग्रीव के हृदय में ज्ञान की ज्योति का उदय होना अति आवश्यक है। सुग्रीव के पुण्य इतने कहाँ कि हम उस तक चल कर पहुँचते। लेकिन आपके हृदय में परहित की भावना भला कैसे दबी रहती। क्योंकि आपको तो पता था कि हम आपकी सेवाओं का लाभ लेने के लिए आप तक निश्चित ही आने वाले हैं। और आप इतने चतुर हैं कि सीधे सुग्रीव के पास आकर बैठ गए। एवं अभी तक वहीं रुके हुए हैं। मुझे पता है कि अब आप यही कहेंगे कि हम सुग्रीव के पास चलें एवं उसके हृदय की ज्योति प्रज्ज्वलित करें।

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रही बात यह कि तुम सूर्य की तरपफ इतनी तीव्र गति से गए और सूर्य को मधुर फल समझ कर खा लिया, तो यह तो तुम्हारा सर्वोत्तम गुण हुआ। कौन नहीं जानता कि सूर्य साक्षात् भगवान हैं। एवं भगवान की तरफ किसी की गति अधिक से भी अधिक हो तो यह तो अति उत्तम गुण हुआ। भला वो कदम ही क्या जो भगवान की तरपफ न बढ़ें। एवं वह भी तीव्रतम गति से। फिर तुमने सूर्य भगवान को मधुर फल जाना। वाह हनुमंत! तुम्हारी लीला में ही तो जीवन का सार छुपा हुआ है। क्योंकि संसार में 'ईश्वर ही' तो 'एकमात्र फल' हैं। शेष संसार तो कूड़ा मात्र है। एवं तुम कूड़ा छोड फल की तरफ भागे तो यह तो तुम्हारी बुद्धि का मंद होना कहाँ से हुआ? हनुमंत! क्या कभी सांसारिक जीवों की हालत देखी है? उन्हें भगवान में फल तो कतई प्रतीत नहीं होता। क्योंकि उनके लिए तो 'विषय भोग' ही फल हैं। कदाचित किसी की दृष्टि में भगवान फल की संज्ञा में आता भी हो लेकिन यह कहाँ आवश्यक है कि फल के प्रति सभी रुचिकर भाव रखते ही हों। फल केवल फल ही न दिखे अपितु उसकी मधुरता की कल्पना करते ही मुख में पानी आ जाए। और जहाँ फल हों उसे पाने वहाँ दौड़े चले जाएं एवं उसे पाने की इतनी लालसा हो कि उसे बिना चबाए सीधे निगल जाना निश्चित ही यह दर्शाता है कि व्यक्ति का फल के प्रति कितना प्रेम व पागलपन है। और हनुमंत तुम में पागलपन है। तो भला तुम्हारी गति की तीव्रता को भी मैं कैसे अर्थहीन कह दूँ। प्रभु श्री राम अपने प्रिय हनुमान जी में और क्या−क्या विशेषताएं व गुण के भंडार देखते हैं। जानेंगे अगले अंक में.. क्रमशः

-सुखी भारती

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