Gyan Ganga: आखिर क्यों पृथ्वी को अपनी बेटी बना लिया था महाराजा पृथु ने ?

Gyan Ganga: आखिर क्यों पृथ्वी को अपनी बेटी बना लिया था महाराजा पृथु ने ?

महाराज पृथु की जय-जयकार होने लगी। पृथु इतने प्रसन्न हुए कि पृथ्वी के प्रति उनका स्नेह पुत्री के समान हो गया। उन्होंने पृथ्वी को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार किया। पृथु की कन्या होने के कारण ही उन्हें पृथ्वी कहा जाता है।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं।

पिछले अंक में हम सबने ध्रुव चरित्र की कथा सुनी और बड़ा ही सुंदर संदेश प्राप्त किया, कि जिस प्रकार जल अपने आप ही नीचे की ओर बहने लगता है उसी प्रकार मैत्री और नम्रता आदि गुणों के कारण जिस पर भगवान प्रसन्न हो जाते हैं उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं।

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आइए ! अब आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं—

राजा वेन और पृथु की कथा

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी महाराज ! राजा ध्रुव के वंश में ही बड़ा पराक्रमी और यशस्वी राजा हुए अंग। अंग की पत्नी सुनीथा ने वेंन को जन्म दिया। वेन महा कुकर्मी और उपद्रवी था। उसकी दुष्टता के कारण राजर्षि अंग नगर छोड़कर जंगल में चले गए। अब वेन को राजा बनाया गया। वह कठोर और क्रूर राजा था। अपने कठोर और क्रूर व्यवहार से सभी ऋषि मुनियों को सताता और तंग करता था। ऋषि मुनियों के वाक्य अमोघ होते हैं। उन्होंने कुपित होकर वेन को शाप दे दिया और वह मर गया। 

हन्यताम् हन्यताम एष: पाप: प्रकृति दारुण:

जीवंजगद्सावाशु कुरुते भस्मसाद जगत ।। 

अब कोई राजा न होने के कारण मरे हुए वेन की दाहिनी भुजा का मंथन किया गया। जिससे भगवान विष्णु के अवतार आदि सम्राट महाराज पृथु प्रकट हुए। उनकी पत्नी अर्चि थी। विद्वान ब्राह्मणों ने पृथु का राज्याभिषेक किया। स्वर्ग से देवताओं ने पुष्प वृष्टि की तरह तरह के उपहार दिए। कुबेर ने सोने का सिंहासन दिया, इन्द्र ने अपना मुकुट दिया, विष्णु ने सुदर्शन चक्र दिया। 

तस्मै जहार धनदो हैमं वीरं वरासनम्।

वरुण: सलिलस्त्रावमातपत्रम शशिप्रभाम ॥   

इस प्रकार पृथु महाराज इस श्रीष्टि के प्रथम सम्राट हुए। 

मैत्रेयजी ने कहा- विदूरजी ! पृथु के राजा बनने के कुछ ही दिनों बाद पृथ्वी पर अकाल पड़ गया। भूख के कारण प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। भूख से पीड़ित प्रजा राजा पृथु के पास आई।

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वरं राजं जाठरेणा भितप्ता यथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षा:

त्वामद्य याता: शरणम शरण्यम य: साधितो वृत्तिकर: पतिर्न:॥ 

हे राजेश्वर! हम भूखों को तुरंत भोजन देने का प्रबंध कीजिए। ऐसा न हो कि अन्न के अभाव में हमारा अंत हो जाए। 

पृथु: प्रजानाम करुणम, निशम्य परिदेवितम 

दीर्घम दध्यौ कुरुश्रेष्ठ: निमित्तम सोनवपद्यत॥ 

प्रजा का क्रंदन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे, अंत में समझ गए कि पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न, औषधि अपने भीतर छिपा रखा है। राजा पृथु ने अपना धनुष उठाया और क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर वाण चढ़ाया। उन्हें देखकर पृथ्वी काँप उठी। जिस तरह शिकारी को देखकर हिरनी भागती है, उसी प्रकार पृथ्वी डर कर गाय का रूप धारण करके भागने लगी।

सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चांतरं तयो: 

धावन्ती तत्र तत्र एनम् ददर्शानुद्यतायुधम् ॥ 

देश-विदेश, स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष जहाँ-जहाँ वह दौड़कर गई पृथु के बाण उसका पीछा करते रहे। अंत में थक जाने के बाद वह हाथ जोड़कर बोली- महाराज स्त्री कोई अपराध भी करे तो साधारण जीव भी उस पर हाथ नहीं उठाते आप तो करुणा के सागर हैं। मुझे क्यों मारना चाहते हैं। महाराज पृथु ने कहा- वसुधे त्वाम वधिष्यामि तू मेरी आज्ञा का उलंघन करने वाली है, अन्न और वनस्पतियों को अपने गर्भ में छिपा रखा है। प्रजा भूख से मर रही है, इसलिए मैं तुम्हें भी मार डालूँगा। गो रूप धरण करने वाली पृथ्वी ने कहा- हे सर्वेश्वर! आप साक्षात कृष्ण के अवतार हैं। यदि आपको अन्न की आवश्यकता है तो मेरे योग्य बछड़ा दोहन-पात्र और दुहने वाले की व्यवस्था कीजिए। मैं उस बछड़े के स्नेह से द्रवित होकर दूध के रूप में सभी वस्तुएँ दे दूँगी। पृथ्वी के ये मनोहर वचन सुनकर पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथ को ही दोहन-पात्र बनाया और स्वयम दोग्धा अर्थात दुहने वाले बनकर समस्त धन-धान्य दुह लिया। पूरे राज्य में खुशहाली छा गई। महाराज पृथु की जय-जयकार होने लगी। पृथु इतने प्रसन्न हुए कि पृथ्वी के प्रति उनका स्नेह पुत्री के समान हो गया। उन्होंने पृथ्वी को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार किया। पृथु की कन्या होने के कारण ही उन्हें पृथ्वी कहा जाता है। पृथों: अपत्यम कन्या पृथ्वी। इस प्रकार पृथ्वी पर राज करते हुए पृथु महाराज ने सौ अश्वमेध किए। उनकी यज्ञशाला में साक्षात श्री विष्णु भगवान का प्रादुर्भाव हुआ था। उन्होंने अपनी प्रजा की संतान की तरह देख-भाल की थी। अंत में घोर तपस्या करते हुए परलोक को सिधार गए।

इसके बाद पुरंजन उपाख्यान की चर्चा आती है।   

आइए ! इस भवसागर को पार करने के लिए हम अपने आप को भगवान की शरण में समर्पित कर दें। 

मैं हूँ तेरी शरण में, संसार के रचइया 

किश्ती मेरी लगा दे उस पार हे कन्हैया 

मेरी अर्ज सुन लीजे प्रभु आकर सुधि लीजे 

एक बार दर्श दीजे समझूँगा श्याम रीझे 

पतवार थाम लो तुम मजधार मे है नैया---- मैं हूँ तेरी शरण मे, संसार के 

मेरे मन का है तू मोहन अब आ गया है सावन 

बुझे प्यास मेरे दिल की जब होगा तेरा आवन 

पावन पतित को करना जगदीश हे कन्हैया--- मैं हूँ तेरी शरण मे, संसार के

                                                    

क्रमश: अगले अंक में...

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव...

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

- आरएन तिवारी