Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 23, 2021   16:25
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Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें।

श्री रामजी ने सुग्रीव की बात सुनी तो हँस पड़े क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव का वैराग्य क्षणिक व परिस्थितिजन्य है। परिस्थिति बदलेगी तो सुग्रीव की बैरागी अवस्था भी परिवर्तित हो जाएगी। लेकिन सुग्रीव को प्रभु श्रीराम जी सदा यूं ही बिन पेंदे के लोटे की तरह थोड़ी रखना चाहते थे। जिसमें जिधर चाहो लोटा उधर ही लुढ़क जाता है। उसे स्थिर होना है तो उसका पेंदा अर्थात् आधार होना अति आवश्यक है। वास्तव में विश्वास ही वह आधार है जिस पर एक साधक सदा टिका रह सकता है। इसलिए भगवान ने भी थोड़ी सख्ती दिखा दी कहा कि सुग्रीव देखो तुम्हें अब बदलना होगा। मैं भले ही अब तक वैसा ही करता रहा जैसा तुम कहते व चाहते रहे। लेकिन अब मैं अपने दिए वचन से नहीं मुडूँगा। मेरा कहा अटल होता है मैंने जब यह प्रण ले ही लिया कि मैं बालि को मारूंगा ही मारूंगा और तुम्हें राज्य सिंघासन पर भी अवश्य बिठाऊँगा तो समझ लो कि दोनों प्रसंग घटित होकर ही रहेंगे। इसलिए अब तुम्हें अपने मन की अवस्था मेरे वचनों के अनुसार ही निर्मित करनी पड़ेगी। श्रीराम जी ने सुग्रीव को मानों बड़े तरीके से कह दिया−

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जो कछु कहेहु सत्य सब सोई।

सखा बचन मम मृषा न होई।।

श्रीराम कहते हैं कि हे सुग्रीव निःसंदेह तुम्हारी बातें सत्य की चाशनी में डूबी हैं। लेकिन क्या करूं मैंने जब वचन दे ही दिया है तो इसका अर्थ कि बालि का मरना तो निश्चित ही है। 

श्रीराम जी तो दया के सागर हैं, करूणा निधान हैं, उन्हें किसी के प्रति कोई शत्रुता कहाँ। अगर शत्रुता का भाव उन्हें कण मात्र भी छुआ होता तो श्रीराम मंथरा को तो अवश्य ही दंडित करते। दंड देने की बात तो छोड़िए पूरी रामायण खंड में एक भी ऐसा लघु से लघु प्रसंग भी प्रतीत नहीं होता जिसमें प्रभु श्रीराम मंथरा के लिए कोई कटु शब्द बोलते हों। क्योंकि देखा जाए तो मंथरा ही तो प्रभु श्रीराम जी के बनवास के लिए पृष्ठ भूमि तैयार करती है। कैकेई को भड़काती है और श्रीराम तो अपनी माता कैकेई को भी कभी अपशब्द नहीं कहते। अपने पिता राजा दशरथ पर तो फिर भी असंतोष का कारण बनता था क्योंकि माना कि माता कैकेई तो सौतेली थी उन्हें कोई व्यक्तिगत पीड़ा कैसे होती। परंतु राजा दशरथ तो उनके सौतेले पिता न थे। सायंकाल तो वे घोषणा करते हैं कि सुबह श्रीराम को अयोध्या को सिंघासन पर बिराजमान करेंगे। और सुबह हुई तो निर्णय पलट देते हैं। मात्र निर्णय ही पलटते तो कोई बात न थी, लेकिन यहाँ तो वे सीधा भाग्य ही पलट देते हैं। श्रीराम जी को 14 वर्ष का बनवास दे डाला। पिता वाला कोई स्नेह, प्रेम व दुलार की कोई परंपरा की कोई लाज ही न रखी। कितना अन्याय, अत्याचार व शोषित व्यवहार होने पर भी श्रीराम जी के उनके प्रति व्यवहार, सत्कार व प्यार में कोई त्रुटि नहीं आती अपितु श्रीराम जी कहते हैं कि अरे! किसने कहा कि मुझे मेरे पिता ने अयोध्या का राजपाठ न देकर अन्याय किया। अयोध्या का राजपाठ तो एक सीमित क्षेत्र तक ही था। लेकिन पिता दशरथ ने मुझे इससे कहीं अधिक विशाल व विराट राज्य की वागडोर दी है। और वो राज्य है 'वनों का राज्य।' वे कहते हैं कि−

पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। 

जहं सब भांति मोर बड़ काजू।।

पिता दशरथ ने वनों का राज्य देकर मुझ पर कृपा ही की है। क्योंकि वहीं पर वास्तव में मेरे समस्त कार्य सिद्ध होने हैं। 

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सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें। और अब तो मुझे राजपाठ व धन परिवार की भी चाहना नहीं। क्योंकि सर्वस्व त्याग कर मैं तो आपकी सेवा करने चला हूँ। तो फिर यह झगड़ा झंझट क्यों। तो यह सुन श्रीराम जी को अवश्य ही बालि को मारने की योजना स्थगित कर देनी चाहिए थी। क्योंकि पीड़ित ही अगर आरोपी को दण्डित नहीं करना चाहता तो श्रीराम जी क्यों बलपूर्वक बालि को दंड देना चाहते हैं? इसके पीछे बहुत से सूक्ष्म, अनिवार्य व न्याय संगत कारण हैं। प्रथम कारण बालि का अहंकार था। वानरों की इतिहास गाथा वास्तव में कुछ और ही संदेश समेटे हुए है। वानर जाति का उदय यूं ही अस्तित्व में नहीं आया था। हुआ यूं था कि जब पृथ्वी रावण के पापों व अत्याचारों से त्रास्त थी, तो देवगणों ने ब्रह्मा जी को जाकर प्रार्थना की आप प्रभु को मृत्यु लोक पर अवतरित होने के लिए मनाइए। प्रभु दुष्टों के संहार व धर्म की स्थापना हेतु इस धरा धाम पर अवतार धारण करने हेतु सहमति प्रदान कर देते हैं। देव गणों को लगा कि अब अपना काम तो हो गया। प्रभु अवतार लेंगे और राक्षसों का वध करेंगे। अब हमारा क्या काम! हम जाकर विषय भोग भोगते हैं। देवगण जैसे ही वापिस पलटने लगे तो ब्रह्मा जी ने सबको रोक लिया कि प्रभु से केवल स्वार्थ का रिश्ता रखना कदापि यथोचित नहीं है। आप सबको भी प्रभु की सेवा में धरा पर देह धारण करनी होगी। प्रभु नारायण से नर बनने का साहस रखते हैं तो आप लोगों को कम से कम देवता से वानर रूप धरण करना ही चाहिए−

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बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ। 

सभी देवता वानर रूप धारण कर प्रभु के वन आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाकी सभी वानर तो ठीक निर्वाह कर रहे थे लेकिन बालि को अपने बल का इतना अहंकार हो गया कि वह स्वयं को ईश्वर से भी अधिक बलशाली मान चुका था। वानर देह तो इसलिए धारण की थी कि प्रभु की सेवा करनी है एवं रावण वध में उनका सहयोग करना है। लेकिन कृत्य देखिए कि वह रावण से ही मित्रता किए बैठा है। क्योंकि एक प्रसंग में जब बालि रावण को पराजित कर अपने कांख में दबाकर समस्त विश्व का भ्रमण करता है तो रावण क्षमा याचना करता हुआ बालि की अनेकों स्तुतियां कर उसे रिझाकर अपने पक्ष में कर लेता है। बालि भी आत्म प्रशंसा के वशीभूत होकर उसे अभय दान दे देता है। यद्यपि होना तो यह चाहिए था कि ऐसे दुष्ट को दंडित करे लेकिन बालि को तो धुन थी कि उसके बल व सामर्थ्य का पूरी दुनिया लोहा माने। प्रभु का यश फैले या न फैले इससे उसे कोई सरोकार नहीं था। परंतु अपना यश व कीर्ति सर्वत्र फैलनी चाहिए इसकी उसे बहुत चिंता थी। बल व सामर्थ्य की ही बात की जाए तो हनुमान जी के सामने उसकी क्या बिसात थी। लेकिन श्री हनुमान जी ने भी कभी अपने बल का प्रदर्शन व अहंकार नहीं किया। अपितु इसी प्रतीक्षा में लगे रहे कि हमें प्रभु की सेवा में अपना सर्वस्व लगाना है। बालि एक नहीं अपितु दो−दो गलतियां एक साथ करता है। रावण से तो मित्रता की लेकिन साथ में अपने ही भाई सुग्रीव के साथ शत्रुता पूर्ण व्यवहार करने लगा। प्रभु भला अपने सेवकों व भक्तों के प्रति किसी का शत्रु भाव कैसे स्वीकार कर सकते हैं।

लिहाज़ा प्रभु ने अपना निर्णय यथावत रखा कि मैं बालि को जरूर मारूंगा। मारूंगा भी उसी बाण से जिससे मैंने ताड़ के वृक्षों को काटा था। मानों कह रहे हों कि बालि भी ताड़ के वृक्षों की तरह सीधा अकड़ा खड़ा है। किसी को छाया भी नहीं देता। तो क्यों न व्यर्थ के इस बोझ से पृथ्वी के भार को कम किया जाए। बालि को मारने का दूसरा कारण था वह कारण भी उसके बल के साथ ही जुड़ा था। क्या था वह कारण? हम अगले अंक में विस्तार पूर्वक जानेंगे...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







जानकी जयंती विशेषः मां सीता के बिना अधूरे हैं प्रभु श्रीराम

  •  ललित गर्ग
  •  मार्च 6, 2021   12:24
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जानकी जयंती विशेषः मां सीता के बिना अधूरे हैं प्रभु श्रीराम

माता सीता का विलक्षण व्यक्तित्व यूं लगता मानो पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो। उनके आदर्श समय के साथ-साथ प्रकट होते रहे, उद्देश्य गतिशील रहे, सिद्धांत आचरण बनते थे और संकल्प साध्य तक पहुंचते थे।

पौराणिक काल में ऐसी कई महिलाएं हुई हैं जिन्हें हम आदर्श और उत्तम चरित्र की महिलाएं मानते हैं, जो भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। लेकिन उनमें से सर्वोत्तम हैं माता सीता। जैसे श्रीराम को पुरुषों में उत्तम पुरुषोत्तम कहा गया है, उसी तरह माता सीता भी महिलाओं में सबसे उत्तम एवं आदर्श नारी चरित्र हैं। धर्मशास्त्रों में ऐसी ही अनेक गृहस्थ और पतिव्रता स्त्रियों के बारे में लिखा गया है, जो आज भी हर नारी के लिए आदर्श और प्रेरणा हैं। अनेक लोग माता सीता के जीवन को संघर्ष से भरा भी मानते हैं, लेकिन असल में उनके इसी संघर्षमय जीवन में आधुनिक हर कामकाजी या गृहस्थ स्त्री के लिए बेहतर, उत्तम और संतुलित जीवन के अनमोल सूत्र समाये हैं। उनकी सत्य निष्ठा, चरित्र निष्ठा, सिद्धांत निष्ठा और अध्यात्म निष्ठा अद्भुत एवं प्रेरक है। वे त्याग, तपस्या, तितिक्षा, तेजस्विता, बौद्धिकता, चैतन्यता, पारिवारिकता एवं पतिव्रता धर्म की प्रतीक हैं, प्रतिभा, पवित्रता, प्रशासन एवं पुरुषार्थ की पर्याय हैं।

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पौराणिक कथा के अनुसार, राजा जनक अकाल एवं सूखे की विकराल स्थिति को देखते हुए स्वयं ही एक बार हल से खेत जोत रहे थे तभी उनका हल किसी चीज से टकराया था। तब राजा जनक ने देखा तो वहां एक कलश प्राप्त हुआ। उस कलश में एक सुंदर कन्या थी। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, वह इस कन्या को अपने साथ लें आएं। जोती हुई भूमि तथा हल के नोक को भी ‘सीता’ कहा जाता है, इसलिए बालिका का नाम ‘सीता’ रखा गया था। फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सीता धरती से प्रकट हुई। राजा जनक की सबसे बड़ी पु़त्री होने के कारण माता सीता ने अपने सम्पूर्ण जीवन काल में विवेक, प्रेम, त्याग, समर्पण एवं सत्य को केन्द्रिय भाव बनाया। 

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’- मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ज्योति की यात्रा मनुष्य की शाश्वत अभीप्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य है, प्रकाश की खोज। प्रकाश उसे मिलता है, जो उसकी खोज करता है। कुछ व्यक्तित्व प्रकाश के स्रोत होते हैं। वे स्वयं प्रकाशित होते हैं और दूसरों को भी निरंतर रोशनी बांटते हैं। माता सीता ऐसा ही एक लाइटहाउस है यानी प्रकाश-गृह है, जिसके चारों ओर रोशनदान हैं, खुले वातायन हैं। प्रखर संयम, साधना, संतुलन, धैर्य, त्याग और आत्माराधना से उनका समग्र जीवन उद्भासित है। आत्मज्योति से ज्योतित उनकी अंतश्चेतना, अनेकों को आलोकदान करने में समर्थ रही हैं। उनका चिंतन, संभाषण, आचरण, सृजन, पतिव्रता धर्म, मातृत्व, सेवा- ये सब ऐसे खुले वातायन हैं, जिनसे निरंतर ज्योति-रश्मियां प्रस्फुटित होती रही हैं और पूरी मानवजाति को उपकृत किया हैं। उनका जीवन ज्ञान, दर्शन और चरित्र की त्रिवेणी में अभिस्नात है। उनका बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक और चुंबकीय है, आंतरिक व्यक्तित्व उससे हजार गुणा निर्मल और पवित्र है। वे शांत, सौहार्द एवं प्रेममय पारिवारिक परिवेश निर्माता हैं, उनके चिंतन में भारत की आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित है। आपकी वैचारिक उदात्तता, ज्ञान की अगाधता, आत्मा की पवित्रता, सृजनधर्मिता, अप्रमत्तता और विनम्रता उन्हें विशिष्ट श्रेणी में स्थापित करती हैं।

माता सीता का विलक्षण व्यक्तित्व यूं लगता मानो पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो। उनके आदर्श समय के साथ-साथ प्रकट होते रहे, उद्देश्य गतिशील रहे, सिद्धांत आचरण बनते थे और संकल्प साध्य तक पहुंचते थे। यदि मन में श्रेष्ठ के चयन की दृढ़ इच्छा हो तो निश्चित ही ऐसा ही होता है। सीता स्वयंवर तो सिर्फ एक नाटक था। असल में सीता ने श्रीराम और श्रीराम ने सीता को पहले ही चुन लिया था। मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान श्रीराम तथा जनकपुत्री जानकी (सीता) का विवाह हुआ था, तभी से इस पंचमी को ‘विवाह पंचमी पर्व’ के रूप में मनाया जाता है।

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यह बहुत ही आश्चर्य है कि वनवास श्रीराम को मिला लेकिन माता सीता भी उनके साथ महलों के सारे सुख, धन और वैभव को छोड़कर चल दीं। सिर्फ इसलिए कि उन्हें अपने पतिव्रत धर्म को निभाना था। इसलिए भी कि उन्होंने सात वचन साथ में पढ़े थे। उस काल में वन बहुत ही भयानक हुआ करता था। वहां रहना भी बहुत कठिन था लेकिन माता सीता ने श्रीराम के साथ ही रहना स्वीकार किया। निश्चित ही पति को अपनी पत्नी के हर कदम पर साथ देना जरूरी है, उसी तरह पत्नी का भी उसके पति के हर सुख और दुख में साथ देना जरूरी है। कोई महिला यदि अपने पति के दुख में दुखी और सुखी में सुखी नहीं होती है, तो उसे सोचना चाहिए कि वह क्या है। आदर्श और उत्तम दांपत्य जीवन शिव-पार्वती और राम-सीता की तरह ही हो सकता है। माता सीता की जीवनयात्रा एक आदर्श नारी, पत्नी, मां,  की, एक संस्कारदृष्टि संपन्न मातृत्व एवं प्रेम की तथा एक आदर्श समाज निर्माता की यात्रा है। इस यात्रा के अनेक पड़ाव है। वहां उनकी पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों से संबंधित बहुमूल्य दृष्टियां एवं अभिप्रेरणाएं उपलब्ध होती हैं।

माता सीता सिर्फ गृहिणी ही नहीं थीं अर्थात घर में रहकर रोटी बनाना या घर के ही कामकाज देखना। वे प्रभु श्रीराम के हर कार्य में हाथ बंटाती थीं, जहां श्रीराम के कारण उनकी पूर्णता थी, वहीं श्रीराम भी माता सीता के कारण ही पूर्ण होते हैं। श्रीराम जहां रुकते थे, वहां वे तीन लोगों के रहने के लिए एक कुटिया बनाते, खुद के कपड़े धोते, जलाने की लकड़ियां इकट्ठी करते और खाने के लिए कंद-मूल तोड़ते थे। उक्त सभी कार्यों में लक्ष्मण सहित माता सीता उनका साथ देती थीं। माता सीता का जब रावण ने अपहरण कर लिया और उन्हें अशोक वाटिका में रखा तब इस कठिन परिस्थिति में उन्होंने शील, सहनशीलता, साहस और धर्म का पालन किया। इस दौरान रावण ने उन्हें साम, दाम, दंड और भेद की नीति से अपनी ओर झुकाने, लुभाने एवं प्रभावित करने का प्रयास किया लेकिन माता सीता नहीं झुकीं, क्योंकि उनको रावण की ताकत और वैभव के आगे अपने पति श्रीराम और उनकी शक्ति के प्रति पूरा विश्वास था। वे सौम्यता, शुचिता, सहिष्णुता, सृजनशीलता, श्रद्धा, समर्पण, स्फुरणा और सकारात्मक सोच की एक मिशाल हैं।

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श्रीराम के वियोग में दुःखी, पीड़ित माता सीता को देखकर हनुमानजी भी बेचैन हो गये और अपनी शक्ति को दिखाकर मां सीता को आश्वस्त किया कि वे तत्क्षण उन्हें श्रीराम के पास ले जा सकते हैं। लेकिन सीताजी ने कहा कि ‘श्रीराम के प्रति मेरा जो समर्पण है, जो संपूर्ण त्याग है, मेरा पतिव्रता का धर्म है, उसको ध्यान में रखकर मैं श्रीराम के अतिरिक्त किसी अन्य का स्पर्श नहीं कर सकती। अब श्रीराम यहां स्वयं आएं, रावण का वध करें। रामजी ही मुझे मान-मर्यादा के साथ लेकर जाएं, यही उचित होगा।

रावण के लोभ ने पहली बार सीता को श्रीराम से अलग किया। दूसरी बार अयोध्या के लोगों की सामान्य सोच एवं नासमझी ने श्रीराम से माता को विलग कराया। लेकिन माता कहां अलग हो पायी? सदैव श्रीराम के साथ और श्रीराम के पूर्व ही स्वर और शब्दों में रहीं। कहते हैं कि भगवती पार्वती ने महादेव से निवेदन किया कि वह कोई ऐसी कथा सुनाये, जो हर प्रकार के दुख और क्लेश में संतुष्टि की प्रेरणा प्रदान करें एवं जीवन को पूर्णता की ओर अग्रसर करे। तब पहली बार इस धरती पर भगवान भोलेशंकर ने माता पार्वती को सीताराम की कथा सुनाई। जीवन के उतार-चढ़ावों, संकटों, झंझावातों और असंतोष में केवल श्रीराम एवं सीता का दाम्पत्य ही शाश्वत शांति और संतोष प्रदान करता है। उनका जीवन कर्म और ज्ञान के बीच के समन्वय का उदाहरण बनकर प्रेम और चरित्र की एक अनुपम मर्यादा स्थापित करता है। यही कारण है भारतीय समाज में माता सीता के माध्यम से जिन आदर्शों की कल्पना की गई है, वे भारतीयों को आज भी उतनी ही श्रद्धा से स्वीकार हैं। ऐसे विलक्षण जीवन और विलक्षण कार्यों की प्रेरक माता सीता पर न केवल समूचा हिन्दू समाज बल्कि संपूर्ण मानवता गर्व का अनुभव करती है।

- ललित गर्ग







Gyan Ganga: गीता में भगवान ने कहा है- मुझे याद करो लेकिन सांसारिक कर्म भी करते रहो

  •  आरएन तिवारी
  •  मार्च 5, 2021   18:03
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Gyan Ganga: गीता में भगवान ने कहा है- मुझे याद करो लेकिन सांसारिक कर्म भी करते रहो

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपने सांसारिक कर्मों को भी करते रहो और युद्ध भी करो। इस समय युद्ध करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। अपने मन और बुद्धि को मुझमें लगाकर मेरे शरणागत हो जाओ। तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा।

प्रभासाक्षी के सहृदय पाठकों ! प्रेम की भावना मनुष्य को कभी हारने नहीं देती और नफरत की भावना कभी जीतने नहीं देती। हमें अपने जीवन में प्रेम को सर्वोपरि रखना चाहिए। 

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं-

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि प्रेम तत्व को समझने वाला सच्चा साधक ही भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हो सकता है। अर्जुन ने प्रश्न किया था, हे परम पिता परमेश्वर! मनुष्य अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आपको कैसे जान सकता है? उसके जवाब में भगवान कहते हैं-

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श्री भगवान उवाच 

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ 

हे कुंती नन्दन अर्जुन! जो मनुष्य जीवन के अंत समय में मेरा ही स्मरण करता हुआ शारीरिक बन्धन से मुक्त होता है, वह मेरे ही भाव को अर्थात् मुझको ही प्राप्त होता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। हम मनुष्यों को भगवान ने एक विशेष छूट दे रखी है, मरणासन्न व्यक्ति के कैसे भी आचरण क्यों न हों, उसने किसी भी तरह का जीवन क्यों न बिताया हो, पर अंत समय में वह भगवान को याद कर ले तो उसका कल्याण हो जाएगा। श्रीमद्भागवत में अजामिल की एक बहुत ही प्यारी कथा आती है। उसने जीवनभर पाप का आचरण किया था, किन्तु मृत्यु के समय नारायण नाम का उच्चारण करने से वह बैकुंठलोक को गया था। भगवान ने मनुष्य का उद्धार करने के लिए ही जीव को मानव शरीर दिया है और जीव ने भी मानव शरीर को स्वीकार किया है। इसलिए जीव का उद्धार हो जाए, तभी भगवान का यह शरीर देना और जीव का यह मानव तन  लेना सफल होगा। परंतु वह अपना उद्धार किए बिना ही आज इस दुनिया से विदा हो रहा है, इसके लिए भगवान कहते हैं— “कि भैया ! तेरी और मेरी दोनों की इज्जत रह जाए, इसलिए अब जाते-जाते तू मुझको याद करता जाए। इसीलिए आज भी हमारे सनातन धर्म में मरणासन्न व्यक्ति को तुलसी और गंगा-जल दिया जाता है तथा राम नाम कहलवाया जाता है।

    

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ 

हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। अंत समय में हुए, चिन्तन के अनुसार ही अगले जन्म की प्राप्ति होती है। जिसका जैसा स्वभाव होता है, अंतकाल में वह वैसा ही चिन्तन करता है। राजा भरत जो बाद में जड़ भरत के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। उन्होंने शरीर छोड़ते समय एक मृग शिशु का चिन्तन किया था इसीलिए उनको दूसरे जन्म में मृग बनना पड़ा था। अब अगले श्लोक में बताते हैं कि, अंत समय में भगवान का स्मरण होने के लिए हमें क्या करना चाहिए।   

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥ 

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपने सांसारिक कर्मों को भी करते रहो और युद्ध भी करो। इस समय युद्ध करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। अपने मन और बुद्धि को मुझमें लगाकर मेरे शरणागत हो जाओ। तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा। गीता का यह शाश्वत संदेश, भगवान के स्मरण में हमें समय का विभाग नहीं करना चाहिए, भगवान का चिंतन और स्मरण तो सदा सर्वदा करते रहना चाहिए।

अब अपनी प्राप्ति का माहात्म्य बताते हुए भगवान कहते हैं--  

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌ ।

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ 

मुझे प्राप्त करके उस मनुष्य का इस दुख-रूपी क्षणभंगुर संसार में पुनर्जन्म कभी नही होता है, बल्कि वह महात्मा परम-सिद्धि को प्राप्त करके मेरे परम-धाम को प्राप्त होता है। पुनर्जन्म का अर्थ है- फिर से जन्म लेना। चाहे मनुष्य रूप में हो या पशु-पक्षी रूप में हो। पुनर्जन्म को दु:खालय अर्थात दु:खो का घर कहा गया है। जीव को नौ महीने तक मल-मूत्र से भरे हुए माँ के गर्भ में रहना पड़ता है। माँ के गर्भ से ही दु:ख का प्रारम्भ हो जाता है, जो मृत्यु पर्यन्त चलता रहता है। जन्म के बाद कोई भी कष्ट होने पर वह रोता रहता है। थोड़ा बड़ा होने पर खाने-पीने, खिलौने आदि की इच्छा पूरी न होने पर बड़ा दु:ख होता है। विद्यार्थी जीवन में कष्ट उठाकर पढ़ाई की चिंता बनी रहती है। परीक्षा में असफल होने पर कई विद्यार्थी आत्महत्या तक कर लेते हैं। जवान होने पर अपनी इच्छानुसार विवाह न होने पर दु:ख होता है। विवाह हो जाता है, तो मन मुताबिक पति अथवा पत्नी न मिलने से दु:ख होता है। बाल-बच्चे हो जाते हैं तो उनका पालन-पोषण करने में कष्ट होता है। लड़कियाँ बड़ी हो जाती हैं तो जल्दी विवाह न होने पर माँ-बाप की नींद उड़ जाती है। बुढ़ापे में अनेक प्रकार के रोग घेर लेते हैं। ठीक से उठने-बैठने, चलने-फिरने, और खाने-पीने में दु:ख होता है। रात में खाँसते–खाँसते हाल बेहाल हो जाता है। घर-परिवार के लोग भी मनाने लगते हैं, हे भगवान ! इनको जल्दी उठा लें। मरने के समय भी भयंकर कष्ट होते हैं। ऐसे दु:ख कहाँ तक गिनाएँ ? उनका कोई अंत नहीं, इसीलिए इस संसार को दु:खालय कहा गया है।

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आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

हे अर्जुन! इस ब्रह्माण्ड में जितने भी छोटे-बड़े लोक हैं, चाहे ब्रह्म-लोक हो, इंद्रलोक हो या देवलोक हो वहाँ जाने पर लौटकर आना ही पड़ता है। इन लोकों में सभी जीव जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं, किन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मुझे प्राप्त करके मनुष्य का पुनर्जन्म कभी नहीं होता है। अर्थात भग्वत्प्राप्ति का सुख अनंत है, अपार है, अगाध है। यह सुख कभी नष्ट नहीं होता, सदा बना रहता है।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ ।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन ! जिसे वेदों और शास्त्रों में अव्यक्त अविनाशी के नाम से कहा गया है, उसी को परम-गति कहा जाता हैं जिसको प्राप्त करके मनुष्य कभी वापस नहीं आता है, वही मेरा परम-धाम है। इसलिए तो प्रभु ने स्पष्ट कहा— सर्वधर्मानपरित्यज्यमामेकम शरणमव्रज।

सच्चा साधक संसार के सभी प्रपंचों को छोड़कर भगवान के चरण कमलों में अपना चित्त लगाता है। मीराबाई ने क्या किया? सब कुछ छोड़कर नंदलाल को अपनी आँखों की पुतलियों में बसाकर गाने लगी और सदा के लिए अमर हो गईं...

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल॥

मोहनी मुरती साँवली सूरती,

नैना बने विसाल,

अधर सुधारस मुरली राजत॥

उर वैजंति माल,

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल..........   

भक्त और भगवान के इतिहास में इस तरह का उदाहरण बहुत कम मिलता है।  

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी







Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 4, 2021   18:02
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Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

सुग्रीव बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है।

सुग्रीव के चरित्र से हम सब लोग भली−भांति अवगत हैं कि सुग्रीव भले ही बलवान हों। लेकिन वह बालि से इतना ज्यादा भयभीत हैं कि वह कंद्राओं में छुपकर रह रहे हैं। यह केवल सुग्रीव की ही गाथा नहीं है। अपितु संसार में समस्त जीव किसी न किसी भय से व्याप्त है। और भय जीव को भगाता है, दिन−रात उसके पीछे पड़ा रहता है। भय हमें रह रहकार अहसास करवाता है कि तू निर्बल है, असहाय एवं विवश है। ऐसे में जीव मानसिक रोगी बन जाता है। सुग्रीव जैसे ऋर्षयमूक पर्वत तक ही सिमटकर रह गया था। वैसे ही जीव भी अपने ही कपोल कल्पित विचारों की गुफा में सिकुड़ कर रह जाता है।

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श्रीराम जी से बस यही तो नहीं देखा जाता। वे कहते हैं कि हे जीव! तू यह कैसे भूल जाता है कि मैं जब तेरे साथ हूँ, मेरा बल तुझ पर न्योछावर है तो फिर तुझे किस से भय लगता है? हे सुग्रीव! मुझे अगर अपनी पत्नी ढूंढ़ने हेतु किसी समर्थ व बलवान साथी की कोई आवश्यकता होगी तो निश्चित ही मैं तुम्हारी अपेक्षा बालि का ही चयन करता। लेकिन मैंने बालि नहीं अपितु तुम्हारा चयन किया है क्योंकि मुझे किसी के बल की नहीं अपितु मेरे बल की किसी को आवश्यक्ता थी। और मेरे उस बल के अधिकारी तुम हो। और मैं कितने ऊँचे स्वर में कह रहा हूँ कि सुग्रीव तुम आगे बढ़ो। मैं और मेरा बल तुम्हारे पीछे खड़े हैं। आश्चर्य है कि बालि को अपने मिथ्या व अहं युक्त बल पर भी तनिक संदेह नहीं और तुम हो कि मेरा बल साथ पाकर भी भयभीत व विचलित हो। 

सुग्रीव अपने बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है। और श्रीराम जी को लगता है कि लो मैं अपने लक्ष्य भेदन में सफल हो गया। क्योंकि मेरा संग पाकर भी कोई निर्बल बना रहे तो फिर क्या लाभ। अधर्म, अनीति व अज्ञानता के सामने कोई व्यक्ति उठ खड़ा हो, बुराई को उसके द्वार पर जाकर ललकारे तो समझो समाज परिवर्तित होने वाला है। नई क्रांति का बिगुल बज उठा है और यूं मानो कि ऐसे अनाचारी के खिलाफ कदम उठ खड़े हुए तो युद्ध से पहले ही विजय का स्वाद चख लिया है। कदम नहीं उठाना ही गले में हार के हार को टांगे रखना होता है। और सुग्रीव जैसे दबे−कुचले जीवों का साहस लौट आना वास्तव में सुग्रीव की नहीं अपितु मेरी ही जीत है।

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केवल आज ही क्यों सतयुग में भी तो ऐसा ही घटित हुआ था। हिरण्यकश्यपु ने कैसे दहाड़ कर कहा था कि क्या प्रभु उस निर्जीव स्तंभ में भी हैं? उसके प्रहार की छूहन भर से मेरा उस स्तंभ में से नरसिंह अवतार प्रकट हो गया था। वह निर्जीव खंभा तो केवल संकेत मात्र था। क्योंकि निर्जीव तो वास्तव में सजीव प्राणी थे जो मुर्दों की भांति हिरण्यकश्यपु के अधर्म व पाप के मूक साक्षी बने हुए थे। लेकिन जीवन में जरा-सी एक चोट क्या लगी कि उसमें साहस व क्रांति का ऐसा नरसिंह प्रकट होता है कि हिरण्यकश्यपु रूपी अधर्म को नाश कर देता है। 

सुग्रीव का बालि के विरुद्ध उठ खड़ा होना एक नवीन सृजन की नींव है। क्यों मानव को लगता है कि मैं निर्बल हूँ? क्यों वह भूल जाता है कि मेरे पीछे ईश्वर का बल कार्य कर रहा है। जबकि मैं पल−पल जीव को संकेत करता हूँ कि देख तू पग−पग पर असमर्थ था। लेकिन मैंने किसी भी परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा। माँ के गर्भ में जब तू नौ मास तक उल्टा लटका होता है, तो यह कोई कम प्रतिकूल स्थिति नहीं थी। तुझमें कहाँ यह बल था कि यह कष्ट सह पाते। शरीर के अंग भी ढंग से खुल नहीं पाते थे। कल्पना करो कि आज यद्यपि तुझमें शारीरिक क्षमता व बल भी अधिक है, अब अगर नौ मास तो क्या नौ क्षण भी ठीक वैसे ही उलटे लटकने को विवश कर दिया जाए तो तेरा क्या हाल हो तू इस कल्पना से ही सिहर उठेगा। वहाँ पर किसने तेरी रक्षा की? कभी सोचा भी है? जन्म हुआ तो शारीरिक क्षमता का असीम अभाव था। लाख स्वादिष्ट व्यंजनों के होने के बावजूद भी तेरे मुख में एक दांत तक नहीं था कि उन व्यंजनों का उपभोग कर सके। उसी समय माँ के आँचल में दूध आ जाना क्या ये मेरी प्रत्यक्ष कृपा का प्रमाण नहीं था? मुझे पता था कि धीरे−धीरे दूध के साथ−साथ तेरा अन्य भोज्य पदार्थों के सेवन का भी मन होता है तो मैंने तुझे नन्हें−नन्हें दांत दे दिए। तूने खूब छक कर सब कुछ खाया लेकिन सात−आठ वर्ष के आते−आते तेरे रूचिकर भोजन पदार्थों की सूची लंबी होती गई। जिसका सेवन करने में तेरे नन्हें दांतों का सामर्थ्य अभी सीमित था। तो मैंने सभी के सभी दांत झाड़ दिए और नए सिरे से पक्के दांत पुनः मोतियों की तरह तेरे मुख में जड़ दिए। 

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तेरी समस्त अक्षमताओं को अपनी क्षमता के बल से ढंकने की गाथा बड़ी लंबी व अनंत है। बस तेरे देखने भर की बात है। फिर देखना पग−पग पर भी बालि जैसे बाधक क्यों न बैठे हों, तू उन्हें चुटकियों में मसल सकता है। इसलिए हे जीव! तू किसी और का अंश नहीं अपितु मेरा ही अंश है। मैं जब किसी से भयभीत नहीं तो मेरा अंशी भला भयभीत क्यों हो? मैं पिता हूँ तो पुत्र पिता से अलग क्यों? तेरे हारने का कोई प्रश्न ही नहीं। उठ खड़ा हो और दूर कर दे अपनी प्रत्येक बाधा। प्रभु श्रीराम जी का आदेश प्राप्त कर सुग्रीव तो उठ खड़ा हुआ लेकिन क्या वह सफल हो पाता है? जानने के लिए अगला अंक जरूर पढ़ियेगा। क्रमशः... जय श्रीराम

-सुखी भारती







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