Gyan Ganga: हनुमानजी के बिना प्रभु श्रीराम का दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 14, 2021   18:33
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Gyan Ganga: हनुमानजी के बिना प्रभु श्रीराम का दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता

जब कोई संत मिलते हैं तो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाते हैं। यहाँ हनुमान जी संत की भूमिका में हैं और श्रीराम−सुग्रीव की भूमिका जीव और ब्रह्म की है। अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति दृढ़ करने की जो बात गोस्वामी जी ने लिखी वह अपने गर्भ में गूढ़ रहस्य संजोए हुए है।

विगत अंकों में हमने पढ़ा कि श्री हनुमान जी जीव और ब्रह्म के मिलन को प्रतिक्षण तत्पर हैं और सुग्रीव श्री हनुमान जी पर उनके सामर्थ्य व विवेक पर पूर्ण विश्वास करते हैं। सज्जनों रामायण के अंदर वर्णित यह भिन्न−भिन्न प्रसंग जो हम पढ़ते अथवा सुनते हैं ऐसा नहीं कि ये एक कहानी अथवा उपन्यास के कोई अंश हैं। इन प्रसंगों में घटने वाली निम्न से भी निम्न दिखने वाली कोई घटना सीधे हमारे लिए अध्यात्मिक ऊँचाइयों का श्रेष्ठतम संदेश समेटे होती है। अब यहाँ ही आप देख लीजिए श्री हनुमान जी जब श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता करवाते हैं तो अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता करवाते हैं−

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।

पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढाइ।।

अर्थात् श्री हनुमान जी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर अग्नि को साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रभु श्रीराम एवं सुग्रीव की प्रीति जोड़ दी। 

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सज्जनों आप चिंतन दृष्टि से अगर देखेंगे तो हनुमान जी ने श्रीराम जी और सुग्रीव का मैत्री संबंध बिल्कुल वैसे ही जोड़ा जैसे सांसारिक तौर पर कोई पंडित दूल्हा−दुल्हन को अग्नि साक्षी करवाकर उनका पति−पत्नी का संबंध जोड़ता है। तो क्या श्री हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव को दूल्हा−दुल्हन के प्रपेक्ष्य में लिया? निःसंदेह इसका उत्तर हाँ में है। सांसारिक दृष्टिकोण से भले ही हमें यह हास्यसपद लगे लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसे पूर्णतः उचित व न्यायसंगत मानता है। वह यूं कि धर्मिक ग्रंथों में सभी जीव आत्माओं को नारी रूप में ही देखा गया है। और पुरुष केवल ईश्वर को ही गया गया है। जैसे गुरबाणी में भी आता है−

इसु जम महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई।।

और जब कोई संत मिलते हैं तो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाते हैं। यहाँ हनुमान जी संत की भूमिका में हैं और श्रीराम−सुग्रीव की भूमिका जीव और ब्रह्म की है। अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति दृढ़ करने की जो बात गोस्वामी जी ने लिखी वह अपने गर्भ में गूढ़ रहस्य संजोए हुए है। वह यह कि प्रीति तो संसार में किसी न किसी से हो ही जाती है। लेकिन आवश्यक नहीं कि वह प्रीति दृढ़ ही हो। कारण कि जरा-सा स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ तो प्रीति टूट जाती है। लेकिन श्री हनुमान जी का मत तो यही है कि देखो भई सांसारिक प्रीति या संबंध बनाने में और उन्हें आगे सुदृढ़ अथवा विकसित करने हेतु हमारा अवतार ही नहीं हुआ। जीव और ब्रह्म की प्रीति कैसे सुदृढ़ हो हमारा सारा चिंतन, प्रयास व बल इसी के निमित है। अब श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री की शुरुआत तो हमने करवा दी लेकिन बीच में यह जलती हुई अग्नि को साक्षी बना दिया। इसके पीछे कुछेक कारण हैं। प्रथम तो यह कि मित्रता के साक्षी के रूप में उसी को रखना चाहिए जो पूर्णतः पावन व पवित्र हो। जो केवल धर्म का पक्ष ले। जैसे अग्नि का धर्म जलाना होता है। अब उसमें पापी तथा पुण्यात्मा जो भी हाथ डालेगा वह उसे समान रूप से जला डालेगी। अग्नि कोई पक्षपात नहीं करती। उसके अंदर न किसी के लिए राग है और न ही द्वेष। संदेश है कि अगर मित्रों में साक्षी ऐसा हो जो पूर्णतः निष्पक्ष हो तो आपकी मित्रता सर्वोत्तम है, श्रेष्ठ है। 

इसके अंदर आध्यात्मिक संदेश यह है कि सुग्रीव जीव है और श्रीराम जी ब्रह्म। दोनों के मिलन पर साधना, त्याग, तपस्या की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। तो जीव ब्रह्म से प्रीति व संबंध निरंतर प्रगाढ़ करता रहता है। योग व समाध की राहि पर नित नई ऊँचाइयों को प्राप्त होता है। श्रीराम−सुग्रीव और अग्नि तो ठीक है लेकिन साथ में श्री हनुमान जी की निरंतर उपस्थिति का क्या तात्पर्य है? वह यह कि भले ही गुरु अथवा संत ने जीव एवं ब्रह्म के बीच एक बार मित्रता की नींव रख दी हो और बीच में साधना की अग्नि भी अनवरत जल रही हो लेकिन तब भी श्री हनुमान जी जैसे गुरु अथवा संत की सदैव, प्रतिक्षण साथ रखना परम आवश्यक है। क्योंकि अभी तो मित्रता का सिर्फ आरंभ ही हुआ है, प्रगाढ़ नहीं हुई। हो सकता है कि दोनों मित्रों में कल को कोई ऐसी घटना भी घट जाये जो दोनों मित्रों के परस्पर प्रेम को समाप्त ही कर दे। तो ऐसी स्थिति में कौन इस संबंध की रक्षा करेगा? कौन दिशा दिखायेगा? तो ऐसे में श्री हनुमान जी जैसे संत ही होते हैं जो विकट परिस्थिति में भी सब कुछ संभाल लेते हैं। और सुग्रीव के प्रसंग में हम आगे देखते भी हैं कि कैसे राज्य प्राप्त करने के पश्चात सुग्रीव अपनी सेवा−कर्त्तव्य को भूल ही जाता है। और सुग्रीव को पुनः मार्ग पर लाने हेतु जब श्रीराम जी श्री लक्ष्मण को भेजते हैं तो श्री हनुमान जी ही थे जो सुग्रीव को समझाकर सारी बिगड़ती परिस्थितियां संभाल लेते हैं। और सुग्रीव पुनः श्रीराम जी की सेवा में उपस्थित व तत्पर हो उठता है।

सांसारिक विवाह साधना के इसी क्रम की तो झांकी है। पंडित संत की भूमिका निभाता है। पति परमात्मा की और पत्नी जीव की भूमिका निभाती है। और बीच में अग्नि सांकेतिक रूप है। त्याग, तपस्या व पावनता का। अर्थात् पति−पत्नी के मध्य अगर त्याग, तपस्या व पावनता का संस्कार विद्यमान है और सदैव किसी साधु का सान्निध्य है तो मानना कि यह बैकुण्ठ की जीती जागती झांकी है।

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श्री हनुमान जी की निरंतर उपस्थिति केवल यहीं नहीं है। आप श्रीराम दरबार की झांकी में दृष्टिपात कीजिए। जिसमें श्रीराम जी के संग श्री सीता जी एवं श्री लक्ष्मण जी का होना तो न्यायसंगत लगता है। क्योंकि परिवारिक सदस्य हैं। लेकिन साथ में सदैव श्री हनुमान जी की उपस्थिति इसी भाव को इंगित करती है कि श्रीराम जी के रूप में ब्रह्म, लक्ष्मण जी के रूप में वैराग्य और श्री सीता जी के रूप में भले ही भक्ति विद्यमान हो लेकिन श्री हनुमान जी के रूप में संत की उपस्थिति के बिना श्री राम दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता। 

इसके बाद हमारे सामने हनुमान जी प्रभु श्रीराम एवं सुग्रीव जी की मैत्री के कौन से पक्ष का दर्शन करवाएंगे...जानेंगे अगले अंक में... क्रमशः...

-सुखी भारती







महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:35
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महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पावन नाम हमारे गौरवशाली इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज भी उन्हें सरबंसदानी, दानवीर, क्रांतिवीर एवं संत−सिपाही के रूप में याद किया जाता है। यों तो हमारे देश में अनेकों दानवीर हुए हैं जिन्होंने मानवता को त्रास मुक्त करने के लिए अनेकों बलिदान दिए। जैसे महर्षि शिबि ने इस संसार को राक्षसों के आतंक से बचाने के लिए जीते जी अपनी हडि्डयों का दान तक दे डाला। लेकिन दुनिया के इतिहास को बांचने पर कोई भी ऐसा उद्धरण नहीं मिलता जहाँ पर किसी ने अपने माता−पिता, पुत्रों एवं अपने सर्वस्व का दान दिया हो। मानवता की रक्षा हेतु गुरु जी अपने 7 और 9 साल के बच्चों का बलिदान देने से भी नहीं घबराए।

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हमारे विद्वतजनों का कथन है कि पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं। जिस समय उनका जन्म हुआ तो पीर भीखण शाह जी ने पश्चिम दिशा में सिजदा करने की बजाय पूर्व दिशा में सिजदा किया। जब उनके शिष्यों ने उनकी इस उल्टी रीति का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि इस संसार के दुःख, संताप हरने वाला अवतार धरण कर चुका है। मैंने पूर्व दिशा से उठ रहे उसी इलाही नूर को सिजदा किया है। आप सब देखेंगे कि वो अपने दिव्य बल−शौर्य, कुर्बानी और संतत्व से इस संसार का काया कल्प करके रख देगा। और उनकी इस बात को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 9 साल की छोटी-सी अवस्था में ही सिद्ध कर दिया था। जिस समय कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आकर उन्हें औरंगज़ेब द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचारों से अवगत कराते हैं। तो उनकी बात सुनकर श्री गुरु तेग बहादुर जी अत्यंत गंभीर होकर वचन करते हैं कि इसके लिए तो किसी महापुरुष को अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी। उस समय बाल गोबिंद भी श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास ही बैठे थे, कहने लगे−पिता जी आप से बड़ा महापुरुष इस संसार में भला और कौन हो सकता है? वह जानते थे कि महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुर्बानियां भी महान ही देनी पड़ती हैं। इसलिए बाल गोबिंद 9 साल की अल्प आयु में ही मानवता की रक्षा हेतु अपने गुरु पिता का बलिदान देकर क्रांति का आगाज़ करते हैं। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि समाज में फैले अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार की जड़ें जमा चुकी गहरी मलीनता को साफ करने लिए किसी महान क्रांति की ही आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि क्रांति ही वह मशाल है जो जुल्म और जालिमों द्वारा फैलाई कालिमा को दूर कर सकती है। महान कवि नामधरी सिंह दिनकर भी क्रांति की परिभाषा देते हुए कहते हैं− 'जब अचानक से आई कोई परिवर्तन की लहर इस संसार की दशा व दिशा को तेजी से बदल दे उसे क्रांति कहा जाता है। क्रांति वह धधकती ज्वाला है जो मानव के अंदर पल रहे अन्याय के भय को समाप्त कर इसके खिलाफ लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।' और गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐसी ही क्रांति का आगाज़ करते हुए कहा−'चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं। तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।। 

क्रांति को अंग्रेजी में Revolution कहा जाता है जो लैटिन भाषा के शब्द revolutio से निकला है जिसका अर्थ होता है a turn around अर्थात् किसी अवस्था का बिलकुल ही पलट जाना। अगर हम अवस्था की बात करें तो संसार में रहने वाले जीवों की मुख्यतः दो अवस्थाएं होती हैं। एक है बाह्य और दूसरी है आंतरिक। बाह्य अवस्था में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक आदि कारण आते हैं। परंतु आंतरिक कारणों में मानव का चिंतन, नैतिकता, चरित्र आदि जैसे गुण आते हैं। 

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम क्रांति के द्वारा किसी की बाह्य अवस्था तो बदल सकते हैं लेकिन किसी की आंतरिक अवस्था को बदलना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जैसे आप किसी को रहने के लिए अच्छा घर, अच्छे कपड़े व खाना तो दे सकते हैं लेकिन उसे मानसिक तृप्ति देना आप के वश में नहीं है। वस्तुतः यह व्यक्ति की आंतरिक अवस्था है जो उसके अंदर से उत्पन्न होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी इस बात से भिज्ञ थे कि बाह्य क्रांति के द्वारा आप लोगों पर कुछ समय तक शासन तो कर सकते हैं लेकिन उनके अंदर आंतरिक परिवर्तन नहीं ला सकते। एवं किसी में अंदरूनी परिवर्तन लाए बिना उसे बदलना सिर्फ उसका लिबास बदलने के समान है। जिन्हें कुछ समय पश्चात फिर से बदलना पड़ सकता है। इसलिए वही क्रांति सफल मानी जाती है जिससे लोगों की सोच में भी अंतर आ जाए। इसलिए वे खालसा पंथ की सृजना करके एक आध्यात्मिक क्रांति का आगाज़ करते हैं। क्योंकि इसी के द्वारा ही समाज के बिगड़े चेहरे को फिर से संवारा जा सकता है। जिससे जालिम हुकमरानों के पैरों तले रौंदी मानवता को फिर से खुले आसमान में उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, परिणाम स्वरूप बिचित्र सिंह जैसे डरे, सहमे, भीरु लोगों में शौर्य का संचार हो जाता है।

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उस समय औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा। परिणामतः वह न तो लोगों की दशा बदल सका एवं न ही दिशा। अपितु लोगों के अंदर एक डर, भय व सहम पैदा कर दिया। 

लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब खालसे का सृजन किया तो वह उनसे शीश भी मांगते हैं। परंतु गुरु जी को बिना कोई प्रश्न पूछे उनके सेवक अपने शीश कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं। आइए देखते हैं अंतर कहाँ पर है? किसी की सोच बदलने या उसे अपनी सोच छोड़ने के लिए उसे नए एवं श्रेष्ठ विचार प्रदान करने पड़ते हैं। जिस पगडंडी को लोग मार्ग समझ लेते हैं उसकी बजाय उन्हें विशाल मार्ग देना पड़ता है। और इस पगडंडी से विशाल मार्ग पर आगे बढ़ना ही क्रांति से आध्यात्मिक क्रांति का सफर है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी वाले दिन इसी विशाल आध्यात्मिक क्रांति की स्थापना की एवं लोगों के अंदर नवचेतना का संचार किया। हम इस बात को भलीभांति जानते हैं कि श्री गुरु जी एक महान योद्धा व तलवार के धनी थे। वह तलवार के जोर पर लोगों को खालसा बना सकते थे। लेकिन उन्होंने पहले लोगों की आंतरिक अवस्था को बदलकर आध्यात्मिक क्रांति को पहल दी एवं लोगों के अंदर भक्ति एवं शक्ति के सच्चे सुमेल की स्थापना की और वे संत सिपाही कहलाए। एवं दबे कुचले लोगों धर्म, जाति, देश और खुद की रक्षा के लिए शौर्य पैदा किया। समाज पर भारी पड़ रही आतंकी शक्तियों का समूल नाश किया। सज्जनों इतिहास में ऐसे महान पन्ने किसी आध्यात्मिक पुरुष द्वारा ही लिखे जा सकते हैं। जो विश्व पटल पर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करते हैं। 

आज सदियां बीत जाने के बाद भी मानव श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना जीवन धन्य कर रहा है। महापुरुष व उनकी शिक्षाएं किसी खास काल के लिए होती अपितु वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम करती हैं। 

इसलिए सज्जनों अगर आज हम भी समाज से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, चरित्रहीनता, जाति−पाति, ईर्ष्या, द्वेष का समूल नाश करना चाहते हैं तो हमें भी अपने अंदर एक संपूर्ण क्रांति अर्थात आध्यात्मिक क्रांति की मशाल जगानी पड़ेगी। क्योंकि यदि हर एक व्यक्ति अपने अंदर से दूषित विचारों का नाश कर दे तो फिर समाज को सुंदर, आनंदमयी एकता के सूत्र में बंधने से कोई भी अमानवीय ताक्त नहीं रोक सकती। इसलिए आओ हम सब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दानवीरता को याद करते हुए उनके श्री चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

-सुखी भारती







Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:28
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Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या?

हम विगत अंकों से श्री हनुमान जी के दिव्य चरित की महिमा व उनके समाज पर पड़ रहे उत्कृष्ट प्रभाव का अवलोकन कर पा रहे हैं। उनकी जीव को प्रभु से जोड़ने की कला व उनके पीछे छुपे परमार्थ की स्वर्ण अक्षरों में भी प्रशंसा की जाए तो कम है। कितनी विचित्र बात है कि वे स्वयं तो दास बन गए और सुग्रीव को बनवा दिया मित्र। मानो वे कहना चाह रहे हों कि हे जीव! अगर तूने किसी को मित्र बनाना ही है तो संसार में सच्चा मित्र मिलना अति दुर्लभ व कठिन है। कहने को तो सब कह देंगे कि हे मित्र! हम सदा साये की तरह आपके साथ चलेंगे। लेकिन हम इतना तो जानते ही हैं कि साया भी तो तभी तक साथ चलता है जब तक आपके समीप प्रकाश के स्रोत विद्यमान हैं। प्रकाश हो तो एक साया तो होता ही है और प्रायः अनेकों साए भी प्रकट होने लगते हैं। लेकिन कब तक? ज़रा प्रकाश का साथ घटने तो दो, अंधकार को रास्तों पर बिछने तो दें, फिर देखना। साए का कहीं नामोनिशान भी प्रतीत नहीं होगा। 

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ठीक इसी प्रकार संसार के मित्र होते हैं। जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या? जो केवलमात्र स्वार्थ की नींव पर टिके हों। उनके ऐसे बेबुनियाद दावे हमें आखिर कहाँ तक आधार देंगे? जिसमें शब्दों के तो बड़े से बड़े इन्द्र जाल हों लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य ही निकले। हम बैठे हैं तो साथ बैठने वालों की संख्या बहुत हो लेकिन प्रश्न तो यह है कि साथ खड़ा कौन होता है? 

मित्रता की ही बात करें तो कर्ण और दुर्योधन में लोक मत के अनुसार गहरी मित्रता है। लेकिन इस मित्रता की आधारशिला क्या थी? यही न कि दुर्योधन ने कुंतीपुत्र कर्ण को अंग प्रदेश का राजा घोषित किया था। उसमें भी उसका कोई स्वार्थ यही था कि इतना बड़ा योद्धा मेरे सदा काम आएगा। कर्ण को भले ही राज्य का लोभ नहीं था। लेकिन मन में यह अहसास तो हावी था ही कि भरी सभा में जब सब मेरा तिरस्कार कर रहे थे तो दुर्योधन ने मुझे अंगराज बना कर सम्मान दिया। मुझे राजा बनाया और इसका ऋण मैं दुर्योधन के काम आकर चुकाऊंगा। यही वह कारण था जिसके चलते कर्ण ने दुर्योधन का अधर्म में भी साथ निभाया। तो क्या मित्र का धर्म यही था कि हमें तो बस आँखें बंद कर अपने मित्र का हर परिस्थिति में साथ देना है भले ही वह धर्म पर हो अथवा अधर्म पर। जी नहीं! वास्तविक मित्र तो वह ही है जो अपने मित्र को अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर उन्मुख करे। यह कैसी मित्रता है कि एक मित्र कुँए में गिर रहा है और हम उसको गिरने से बचाने के बजाय ऊँचे स्वर में यह कहते आगे बढ़ रहे हैं कि मित्र तुम अकेले कुँए में क्यों गिरोगे, रुको मैं भी तुम्हारे साथ गिरता ही गिरुंगा क्योंकि मैं तेरा सच्चा मित्र हूँ।

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भगवान श्रीराम भी सुग्रीव से मित्रता कर रहे हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ है कि सुग्रीव अपनी सेना सहित श्री सीता जी को ढुंढ़वाने में उनकी सहायता करेंगे। भला उन्हें किसी की सहायता की क्या आवश्यकता हो सकती थी। और वास्तव में तात्त्विक दृष्टि से तो श्रीसीता जी श्रीराम जी से विलग थीं ही नहीं। बस यह सब तो लीला मात्रा घटना थी। किंतु हाँ सहायता की आवश्यकता सुग्रीव को अवश्य थी। और श्रीराम ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य एवं पत्नी दिलाकर यह सहायता निश्चित ही की। उसे मान−सम्मान, पद प्रतिष्ठा सब दिया। लेकिन दुर्योधन की तरह उनका मित्र भाव कहीं भी ऐसा नहीं था मैं सुग्रीव का अपने लिए 'योग' नहीं अपितु 'प्रयोग' करूँगा। लेकिन सुग्रीव अगर श्रीराम से हुए इस पावन योग का दुरुपयोग करेगा तो अवश्य ही मैं उसे अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर मोडूंगा। और श्रीराम ने आगे चलकर ऐसा किया भी। क्योंकि राज्य और पत्नी मिलने के पश्चात तो सुग्रीव अपना सेवा कार्य भूल ही गया था। सिर्फ माया में मस्त होकर रह गया। प्रभु को लगा कि बारिश के चार मास बीतने के बाद भी सुग्रीव ने हमारी कोई सुध नहीं ली तो अब हमें ही उसकी सुध लेनी पड़ेगी। तो श्रीराम लक्ष्मण के समक्ष ही क्रोधित स्वर में यह घोषणा करते हैं कि सुग्रीव अपना सेवा धर्म बिसार चुका है। जिस कारण मैं उसी बाण से उसका वध करूंगा जिस बाण से मैंने बालि को मारा था−

सुग्रीवहिं सुधि मोरि बिसारी बिहारी। पावा राज कोस पुर नारी।। 

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥

लक्ष्मण जी श्रीराम जी का यह स्वभाव देखकर एक बार तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि प्रभु का स्वभाव तो सदैव क्षमा करना और सब कुछ देकर भी, सब भूल जाना ही है। लेकिन कह रहे हैं कि मैं सुग्रीव को उसी बाण से मार डालूंगा जिस से मैंने बालि को मारा था। यह देखकर लक्ष्मण मन ही मन समझ जाते हैं कि प्रभु सुग्रीव को मारने वाले बिलकुल नहीं हैं। क्योंकि प्रायः तो आजतक यही देखा गया है कि अगर कोई किसी पर क्रोधित है तो वह उसे उसी क्षण मारने के लिए दौड़ता है। और अकसर यही कहता है कि रूक तुझे मैं अभी मज़ा चखाता हूँ। लेकिन यहाँ प्रभु कह रहे हैं कि मैं आज नहीं अपितु कल मारूंगा तो इसका अर्थ है कि वे मारने−वारने वाले बिलकुल नहीं हैं। वे तो बस सुग्रीव का कोई पाप ही हर रहे हैं। श्री लक्ष्मण जी ने यह मौका पाकर कहा कि प्रभु आप बड़े हो और सुग्रीव के बड़े भाई को आपने मारा। सुग्रीव छोटा है तो उसे मारने का आदेश अपने छोटे भाई अर्थात् मुझे दीजिए न। श्रीराम ने सुग्रीव को देखा तो सोच में पड़ गए कि अरे लक्ष्मण तो सुग्रीव वध हेतु सच में ही तत्पर हो गए हैं। अरे भाई! अपने मित्र को भी भला कोई मारता है? मित्र की तो रक्षा की जाती है। हमें सुग्रीव को नहीं अपितु उसकी मूढ़ता और अज्ञानता को मारना है। इसलिए हे लक्ष्मण! सुग्रीव हमारे पास बालि के भय के कारण आया था। बालि वध के साथ ही सुग्रीव का भय भी चला गया। अब फिर से तुम भी उसको भय दिखाना, मारना मत। और भय भी इतना नहीं कि वह हमसे डर कर कहीं और दूर ही भाग जाए। बस ऐसे डराना कि भागकर भी हमारी ही तरफ आए।

भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।

सज्जनों कितनी पावन व हितकारी मित्रता है श्रीराम जी की। लेकिन यह सब संभव कब हुआ जब श्री हनुमान जी सद्प्रयास करते हैं। श्री हनुमान जी आगे भी कैसे−कैसे परहित के कार्य करते हैं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...

-सुखी भारती







Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 15, 2021   16:50
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Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

सज्जनों! श्रीमद्भगवत गीता केवल श्लोकों का पुंज नहीं है। श्लोक होते हुए भी भगवान की वाणी होने से ये मंत्र भी हैं। इन मंत्र रूपी श्लोकों में बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ है जो समस्त मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

आइए ! गीता प्रसंग में चलें--- पिछले अंक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मन में उत्पन्न शंका का समाधान करते हुए कर्मयोग करने का उपदेश दिया था। इस जगत में कर्म ही प्रधान है, कर्म की प्रधानता को देखकर ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा—

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कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।

श्री भगवान उवाच

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 

आगे भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है। 

इंसान के कर्तव्य कर्म का असर देवताओं पर भी पड़ता है और वे भी अपने कर्तव्य कर्म में संलग्न हो जाते हैं। 

इस विषय में एक दृष्टांत है- चार किसान बालक थे। आषाढ़ का महीना आने पर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलाने का समय आ गया है, वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समय पर अपने कर्तव्य का पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेत में जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरों ने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि क्या बात है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर 

ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्य पालन में पीछे क्यों रहें? ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लगे। अब मेघों (बादलों) ने विचार किया, हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगने पर उन्होंने भी सोचा कि हम अपने कर्तव्य से क्यों हटें? उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। अब मेघों की गर्जना सुनकर इंद्र ने सोचा कि बात क्या है? जब इंद्र को मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब इंद्र ने भी अपने कर्तव्य-पालन का निश्चय किया और मेघों को वर्षा करने की आज्ञा दे दी।    

यह है, कर्म का प्रभाव। जब प्रत्येक व्यक्ति अहंकार छोड़कर अपने-अपने कर्तव्य का पालन करता है, तब परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार को सुख पहुंचता है। 

अब निम्नलिखित श्लोक में भगवान अपना स्वयं का उदाहरण देकर अपने वक्तव्य की पुष्टि करते हैं। 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे पृथा पुत्र पार्थ! इस त्रैलोक में मेरे लिए कुछ भी करना बाकी नहीं है। मुझे सब कुछ प्राप्त है फिर भी मैं कर्म करता हूँ। भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

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“धर्म संरक्षणार्थाय धर्म संस्थापनाय च”

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन ! यदि मैं अपना कर्म सावधानी पूर्वक न करूँ तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि मैं आदर्श पुरुष हूँ। सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं, यदि मैं अपने कर्तव्य का पालन नहीं करूँ, तो इस संसार में कोई भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और कर्तव्य का पालन नहीं करने से उनका पतन हो जाएगा। मनुष्य को इस जगत में कैसे रहना चाहिए? यह बताने के लिए भगवान मनुष्य लोक में अवतार लेते हैं। सच पूछिए, तो संसार एक पाठशाला है जहाँ हमें लोभ और लालच को किनारे कर अपने साथ-साथ दूसरों के हित के लिए कर्म करना सीखना है। शास्त्र और उपनिषदों का यही निचोड़ है कि हम जीवन पर्यंत दूसरों के हित में लगे रहें। उसी का जीवन धन्य है जिसने स्वयं को पर हित में लगा दिया।

गोस्वामी तुलसीदास महाराज की यह अमर चौपाई भी इसी बात का समर्थन करती है।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण

- आरएन तिवारी







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