'पैसे हीरो के लिए हैं', Rakesh Bedi ने किया Bollywood के काले सच और सख्त 'हायरार्की' का खुलासा

एक्टर ने एक घटना के बारे में बताया जब उन्हें एक फिल्म की शूटिंग के दौरान तुरंत पेमेंट की ज़रूरत थी। प्रोड्यूसर से अपना पेमेंट मांगने पर, बेदी को बताया गया कि पैसे फिल्म के हीरो के लिए रिज़र्व हैं।
अपनी कॉमिक टाइमिंग और दमदार अभिनय से दशकों तक दर्शकों का मनोरंजन करने वाले दिग्गज अभिनेता राकेश बेदी ने हाल ही में बॉलीवुड के अंदरूनी कामकाज और स्टारडम के बदलते स्वरूप पर खुलकर बात की। 'धुरंधर' जैसी वेब सीरीज में पाकिस्तानी राजनेता जमील जमाली के किरदार से वाहवाही लूटने वाले बेदी ने अपने शुरुआती करियर का एक ऐसा किस्सा साझा किया, जो इंडस्ट्री में कलाकारों के बीच होने वाले भेदभाव को उजागर करता है। एक्टर ने एक घटना के बारे में बताया जब उन्हें एक फिल्म की शूटिंग के दौरान तुरंत पेमेंट की ज़रूरत थी। प्रोड्यूसर से अपना पेमेंट मांगने पर, बेदी को बताया गया कि पैसे फिल्म के हीरो के लिए रिज़र्व हैं। उन्होंने बताया कि इस पल ने इंडस्ट्री के हायरार्की वाले स्ट्रक्चर को दिखाया, जहाँ जाने-माने स्टार्स को अक्सर खास ट्रीटमेंट मिलता है।
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जब प्रोड्यूसर ने कहा- "पैसे हैं, पर तुम्हारे लिए नहीं"
एक इंटरव्यू के दौरान राकेश बेदी ने उस दौर को याद किया जब वह पैसों की तंगी से जूझ रहे थे। उन्होंने बताया कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें अपनी किश्त (इंस्टॉलमेंट) भरने के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। बेदी ने याद करते हुए कहा: सेट पर प्रोड्यूसर आया और उसके हाथ में पैसों का पैकेट था। मैंने उससे अपनी बकाया राशि मांगी, तो उसने साफ कह दिया कि पैसे नहीं हैं। जब मैंने उसके हाथ में मौजूद पैकेट की ओर इशारा किया, तो उसका जवाब हैरान करने वाला था। उसने कहा 'यार, यह पैसे हीरो को देने के लिए हैं।' इस घटना ने बेदी को अहसास कराया कि इंडस्ट्री में एक सख्त 'हायरार्की' (श्रेणीबद्ध व्यवस्था) है, जहाँ छोटे या सपोर्टिंग एक्टर्स की जरूरतों से ऊपर बड़े स्टार्स की सुख-सुविधाओं को रखा जाता है।
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शेयर बाजार जैसा है स्टारडम
इंडस्ट्री में 'इक्विटी' और सम्मान पर बात करते हुए बेदी ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि किसी कलाकार का स्टेटस शेयर बाजार की तरह होता है; जैसे एक शेयर की कीमत ₹10 से ₹1000 तक जा सकती है, वैसे ही सफलता मिलने पर लोगों का नजरिया रातों-रात बदल जाता है।
हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि रुतबा चाहे जो भी हो, किसी के साथ बुरा बर्ताव या बेइज्जती करना कतई सही नहीं है। उन्होंने अपना व्यक्तिगत सिद्धांत साझा करते हुए कहा कि वह आज भी किसी ड्रेस-मैन से अपने जूते पहनने में मदद नहीं मांगते, क्योंकि वह हर इंसान की गरिमा में विश्वास रखते हैं।
बदल गया है शोहरत का पैमाना
राकेश बेदी ने 'ये जो है जिंदगी', 'श्रीमान श्रीमती' और 'चश्मे बद्दूर' जैसे कल्ट क्लासिक्स के दौर का आज के दौर से मुकाबला किया। पहले कलाकार एक मैगजीन में अपना नाम छपने पर खुश हो जाते थे। आज एक छोटी सी बातचीत या वीडियो मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। उन्होंने माना कि आज स्टारडम का 'क्वांटम' (पैमाना) बहुत बड़ा हो गया है, और वह खुद को इस डिजिटल युग की तुरंत मिलने वाली शोहरत के साथ ढालने की कोशिश कर रहे हैं।
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