AI के दबाव से बदला Indian IT Companies का बिजनेस मॉडल और कमाई का तरीका

भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए एआई तकनीक से बदलता कारोबारी मॉडल एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। कंपनियों का तकनीक पर खर्च बढ़ने और काम की कीमतों पर दबाव के बीच वैश्विक क्षमता केंद्र तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बदलाव से आईटी कंपनियों की कमाई, रोजगार और पूरे उद्योग की दिशा प्रभावित हो सकती है।
भारत का आईटी सेवा क्षेत्र इस बार की सितंबर तिमाही के नतीजों में सिर्फ कमजोर वृद्धि की चिंता से नहीं जूझ रहा है। असली सवाल अब यह है कि एआई के बढ़ते इस्तेमाल से मिलने वाली उत्पादकता का फायदा आखिर किसे मिल रहा है। कंपनियों को बड़े काम मिल रहे हैं, दुनिया भर में तकनीक पर खर्च भी जारी है, लेकिन हर काम से होने वाली कमाई पर दबाव बढ़ रहा है।
करीब 315 अरब डॉलर का भारतीय तकनीक उद्योग लंबे समय से देश के लिए कमाई और रोजगार का बड़ा जरिया रहा है। इसका पुराना कारोबार मॉडल काफी सीधा था। विदेशी कंपनियों को तकनीक से जुड़े काम के लिए बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होती थी और भारत में कम लागत पर बड़ी संख्या में कुशल इंजीनियर उपलब्ध थे। जैसे-जैसे नए ग्राहक और परियोजनाएं बढ़ीं, वैसे-वैसे कंपनियों की कमाई और कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ती गई।
लेकिन अब यह पुराना तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है। नैसकॉम के अनुसार, भारत के तकनीक उद्योग में करीब 6 मिलियन लोग काम करते हैं। उद्योग संगठन के अध्यक्ष राजेश नांबियार का कहना है कि एआई ने इस क्षेत्र के पहले चले आ रहे सीधी रफ्तार वाले विकास मॉडल को बदल दिया है। कंपनियां अब उतने शुरुआती स्तर के कर्मचारियों की जरूरत महसूस नहीं कर रही हैं, क्योंकि अनुभवी कर्मचारियों की क्षमता एआई की मदद से काफी बढ़ सकती है।
बता दें कि यही बदलाव कंपनियों और उनके ग्राहकों के बीच कीमत को लेकर नई खींचतान पैदा कर रहा है। पहले ग्राहक तय संख्या में कर्मचारियों या काम के घंटों के हिसाब से भुगतान करते थे। अब वे कम लोगों और कम समय में वही नतीजा चाहते हैं। ऐसे में एआई से बढ़ी उत्पादकता का एक हिस्सा ग्राहकों को कम कीमत के रूप में वापस देना पड़ रहा है।
इसका असर खासकर सॉफ्टवेयर सुधार, जांच और पुराने तकनीकी सिस्टम की देखभाल जैसे कामों में दिखाई दे रहा है। कुछ कंपनियां ऐसे काम खुद भी करने लगी हैं। यानी तकनीक पर खर्च कम नहीं हुआ है, बल्कि उस खर्च का एक हिस्सा बाहरी सेवा देने वाली कंपनियों के बजाय सीधे ग्राहकों की अपनी तकनीकी टीमों तक जा रहा है।
गौरतलब है कि सर्विसनाउ के अनुसार 2026 में भारत में कंपनियों का एआई पर निवेश 119% बढ़ा है। औसतन भारतीय कंपनियां अपने तकनीकी बजट का 16.6% हिस्सा एआई पर खर्च कर रही हैं और 2027 तक यह हिस्सा 21.3% पहुंचने का अनुमान है। इससे साफ है कि तकनीक पर पैसा आ रहा है, लेकिन उसका पूरा फायदा पारंपरिक आईटी सेवा कंपनियों को नहीं मिल रहा है।
इस बदलाव में वैश्विक क्षमता केंद्र भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। नैसकॉम-जिनोव के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2,100 से ज्यादा ऐसे केंद्र हैं, जिनमें करीब 2.36 मिलियन लोग काम करते हैं और इनसे लगभग 100 अरब डॉलर का कारोबार जुड़ा है। वित्त वर्ष 2026 में इन केंद्रों ने करीब 200,000 लोगों को रोजगार दिया, जबकि आईटी सेवा कंपनियों ने करीब 110,000 लोगों को जोड़ा।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कई आईटी कंपनियां अब इन्हीं केंद्रों के कुछ कारोबार को अपने साथ जोड़ रही हैं। टीसीएस ने बेस्ट बाय के भारत स्थित तकनीकी केंद्र को संभालने की प्रक्रिया शुरू की है। एचसीएलटेक ने गार्डियन लाइफ का भारत कारोबार करीब 2,000 कर्मचारियों के साथ लिया है। विप्रो ने 386 मिलियन डॉलर में माइंडस्प्रिंट का अधिग्रहण किया, जिससे 3,200 से ज्यादा कर्मचारी उसके साथ आए। इंफोसिस ने डांस्के बैंक का भारत स्थित तकनीकी केंद्र भी अपने साथ जोड़ा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, पिछले एक साल में वैश्विक क्षमता केंद्रों और दूसरी आंतरिक तकनीकी इकाइयों से जुड़े सौदों का कुल कारोबारी मूल्य करीब 1.3 से 1.5 अरब डॉलर रहा है। एचएफएस रिसर्च का अनुमान है कि अगले 2 से 3 वर्षों में करीब 10% पुराने वैश्विक क्षमता केंद्र किसी न किसी रूप में बाहरी सेवा कंपनियों को अपना काम सौंप सकते हैं।
भारतीय आईटी कंपनियां अब एआई की पूरी श्रृंखला में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। एचसीएलटेक ओडिशा में सारवम एआई के साथ 1.48 अरब डॉलर का एआई केंद्र बनाने की योजना पर काम कर रही है। टीसीएस ने भी 2 अरब डॉलर के निवेश की योजना बताई है।
इस बदलाव का असर रोजगार पर भी पड़ रहा है। सितंबर में नौकरी डॉट कॉम के आंकड़ों के अनुसार आईटी और सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में भर्ती सालाना आधार पर 4% घटी, जबकि एआई और मशीन लर्निंग से जुड़ी भर्ती 20% बढ़ी। ऐसे में आगे कम सामान्य शुरुआती नौकरियां और ज्यादा तकनीकी तथा क्षेत्र विशेष की जानकारी रखने वाले कर्मचारियों की मांग देखने को मिल सकती है। इस तिमाही के नतीजे बताएंगे कि भारतीय आईटी कंपनियां इस बदलते दौर में अपनी कमाई और रोजगार के पुराने मॉडल को कितनी तेजी से बदल पाती हैं।
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