America ने बदला Energy का पूरा खेल, Gulf देशों को पछाड़कर बना भारत का टॉप गैस सप्लायर

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Ankit Jaiswal । Jun 12 2026 9:51PM

मई में अमेरिका भारत का शीर्ष एलएनजी और एलपीजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जिसने पारंपरिक खाड़ी देशों से आयात को काफी पीछे छोड़ दिया है। भू-राजनीतिक संकट के कारण आपूर्ति बाधित होने से भारत की ऊर्जा खरीद में यह ऐतिहासिक बदलाव हुआ है, जो भारत-अमेरिका ऊर्जा व्यापार के नए समीकरण को दर्शाता है।

दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चल रही अनिश्चितता का असर अब भारत के आयात पैटर्न पर भी साफ दिखाई देने लगा है। मई महीने में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब अमेरिका भारत को द्रवीकृत प्राकृतिक गैस और द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण खाड़ी देशों से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।

मौजूद जानकारी के अनुसार भारत अपनी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की लगभग 60 प्रतिशत जरूरत और द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की लगभग पूरी आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते प्राप्त करता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद इस मार्ग पर आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति बदल गई।

ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार मई में अमेरिका ने भारत को लगभग 6.3 लाख टन द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति की। यह मात्रा खाड़ी देशों से संयुक्त रूप से प्राप्त 3.8 लाख टन आपूर्ति से करीब 60 प्रतिशत अधिक रही। इसी तरह द्रवीकृत प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी अमेरिका ने अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ाई।

गौरतलब है कि मई महीने में अमेरिका से भारत को लगभग 9 लाख टन द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति हुई। यह भारत की कुल जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा था। अप्रैल की तुलना में यह लगभग तीन गुना वृद्धि मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अमेरिकी आपूर्ति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ऊर्जा विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार आने वाले वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा व्यापार का केंद्र गैस क्षेत्र बनने जा रहा है। उनका मानना है कि अमेरिका के पास प्रचुर मात्रा में शेल गैस संसाधन और तेजी से विकसित हो रहा निर्यात ढांचा है, जिससे वह भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बता दें कि युद्ध और आपूर्ति संकट से पहले अमेरिकी गैस को भारत में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने में कठिनाई होती थी। इसका मुख्य कारण परिवहन लागत थी। खाड़ी देशों से आने वाली गैस भारत के लिए अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती थी। लेकिन मौजूदा हालात में भारत के पास विकल्प सीमित हो गए हैं, जिससे अमेरिकी गैस की मांग बढ़ी है।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ मनीष सेजवाल का कहना है कि जून के अंत तक अमेरिका से भारत आने वाली द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस की मात्रा 10 लाख टन के आंकड़े को पार कर सकती है। यह भारत के ऊर्जा आयात ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

गौरतलब है कि द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस भारत में मुख्य रूप से रसोई गैस के रूप में उपयोग की जाती है। इसकी कीमत और उपलब्धता राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील विषय मानी जाती है। इसलिए सरकारें आम उपभोक्ताओं को वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाने का प्रयास करती रही हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार एक वैश्विक वित्तीय संस्था की हालिया रिपोर्ट में अमेरिका को भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति में बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार युद्ध से पहले की तुलना में भारत को अमेरिकी गैस निर्यात लगभग आठ गुना बढ़ चुका है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अमेरिका चाहता है कि भारत के साथ उसका व्यापार घाटा कम हो और ऊर्जा आयात इस दिशा में सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। हालांकि अमेरिकी गैस खाड़ी देशों की तुलना में महंगी है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं हैं।

बता दें कि ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद भारत का ऊर्जा आयात बिल बढ़ा है, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर भी देखने को मिला है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक, चौथा सबसे बड़ा द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आयातक और दूसरा सबसे बड़ा द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस आयातक देश है। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।

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