Coimbatore के Shakeel Akhtar की Trike 2 Pi को James Dyson Award 2026 में मिला सम्मान

कोयंबटूर के शकील अख्तर एस द्वारा विकसित तीन पहियों वाली इलेक्ट्रिक गश्ती गाड़ी 'ट्राइक 2 पाई' ने जेम्स डायसन पुरस्कार 2026 के भारत चरण में राष्ट्रीय उपविजेता का खिताब जीता है। इस वाहन का इस्तेमाल वर्तमान में कोयंबटूर पुलिस और चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ कर रही है। अब इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी है।
कोयंबटूर के एक छात्र की बनाई छोटी इलेक्ट्रिक गश्ती गाड़ी ने अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की है। बड़े पैदल क्षेत्रों में सुरक्षा कर्मचारियों की गश्त को आसान बनाने के मकसद से तैयार की गई ‘ट्राइक 2 पाई’ को जेम्स डायसन पुरस्कार 2026 के भारत चरण में राष्ट्रीय उपविजेता चुना गया है। इस वाहन को शकील अख्तर एस ने तैयार किया है, जो फिलहाल कोयंबटूर के कुमारगुरु कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से औद्योगिक स्वचालन और रोबोटिक्स में परास्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं।
बता दें कि कुमारगुरु कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी अन्ना विश्वविद्यालय से संबद्ध है। शकील की रुचि पर्यावरण के अनुकूल और कम ऊर्जा में चलने वाले इलेक्ट्रिक परिवहन साधन तैयार करने में रही है। ‘ट्राइक 2 पाई’ का विचार उनकी स्नातक पढ़ाई के दौरान आया था। उस समय वह करीब 150 एकड़ में फैले कॉलेज परिसर में एक शोध दल के साथ काम करते थे। परिसर में लगातार लंबी दूरी तक चलने के दौरान उनके मन में सवाल आया कि इससे भी बड़े रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, औद्योगिक परिसर और विश्वविद्यालयों में सुरक्षा कर्मचारियों के लिए लगातार पैदल गश्त करना कितना मुश्किल होता होगा।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए टीम ने किसी पुरानी गाड़ी में बदलाव करने के बजाय सुरक्षा गश्त के लिए एक अलग वाहन तैयार करने का फैसला किया। यह तीन पहियों वाला छोटा इलेक्ट्रिक वाहन है, जिसमें आगे का पहिया मोटर से चलता है और पीछे के दोनों पहिए अलग-अलग घूमते हैं। इसकी बनावट ऐसी है कि यह करीब डेढ़ मीटर के दायरे में भी आसानी से मुड़ सकता है। इससे भीड़भाड़ वाले या कम जगह वाले पैदल क्षेत्रों में इसे चलाना आसान हो जाता है।
इसमें चालक के बैठने के बजाय खड़े होकर चलाने की व्यवस्था है। इससे सुरक्षा कर्मचारी आसपास का क्षेत्र बेहतर तरीके से देख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत वाहन से उतरकर लोगों से बातचीत भी कर सकते हैं। हर पहिए में अलग स्प्रिंग वाली व्यवस्था दी गई है, जिससे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर झटके कम लगें। हल्की मेटल से बना ढांचा वाहन का भार नीचे रखता है और इसमें 250 वाट की मोटर लगाई गई है।
गौरतलब है कि इस वाहन को अंतिम रूप देने से पहले चार अलग चरणों में तैयार किया गया। शुरुआती नमूने में झटके कम करने की व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण सुरक्षा कर्मचारियों ने आराम को लेकर समस्या बताई। इसके बाद दूसरे नमूने में अलग-अलग स्प्रिंग वाली व्यवस्था, बेहतर चालक स्थान और नीचे रखा गया भार केंद्र जोड़ा गया। बाद के परीक्षण में सामने आया कि केवल आगे के पहिए पर ब्रेक होने से असमान सतह पर दिक्कत आ सकती है। इसके बाद पीछे के दोनों पहियों पर बराबर ब्रेक लगाने वाली यांत्रिक व्यवस्था तैयार की गई।
अंतिम नमूने में सायरन, लोगों तक आवाज पहुंचाने की व्यवस्था, चेतावनी बत्तियां, स्थान बताने वाली प्रणाली, रोशनी और बाहरी सुरक्षा आवरण जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गईं। परियोजना के अनुसार अलग-अलग उम्र और काम से जुड़े 50 से अधिक लोगों ने इसके विभिन्न नमूनों का इस्तेमाल कर सुझाव दिए हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, यह वाहन अब केवल कॉलेज परियोजना तक सीमित नहीं है। कोयंबटूर शहर की पुलिस इसे गश्त के लिए इस्तेमाल कर रही है। वहीं चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर रेलवे सुरक्षा बल के जवानों की निगरानी व्यवस्था के लिए 10 वाहन लगाए गए हैं।
शकील ने इसके लिए एलाइक्ल इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी भी शुरू की है, जिसे आईपीटीआईएफ का समर्थन मिला है। परियोजना को भारतीय इंजीनियरिंग संस्थान का शोध उत्कृष्टता पुरस्कार, पांच लाख रुपये की एआईसीटीई-एमआईसी युक्ति नवाचार चुनौती राशि, दो लाख रुपये की उत्पाद विकास सहायता और आईपीटीआईएफ इम्पैक्ट 3.0 के तहत 10 लाख रुपये की मदद मिल चुकी है।
अब इसकी पहली व्यावसायिक खेप तैयार करने और रेलवे सुरक्षा बल के साथ इसके इस्तेमाल का टेस्ट पूरा करने पर ध्यान है। आगे विश्वविद्यालयों, औद्योगिक क्षेत्रों, हवाई अड्डों और अस्पतालों में इसका इस्तेमाल बढ़ाने की योजना है। भविष्य में अलग भूभाग के लिए नया मॉडल और लगातार गश्त के लिए बदली जा सकने वाली बैटरी वाला मॉडल तैयार करने की भी योजना है। जेम्स डायसन पुरस्कार के वैश्विक स्तर के शीर्ष 20 में जगह बनाने के लिए भी इस परियोजना पर अब नजर रहेगी।
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