FMCG कंपनियों पर बढ़ी लागत की मार, दूसरी छमाही में घट सकता है मुनाफा

Fmcg Companies
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कच्चे माल की कीमतों में तेजी के कारण रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों के मार्जिन पर चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में दबाव बना रह सकता है। पाम तेल और चीनी जैसी जरूरी चीजों के दाम बढ़ने के बावजूद कंपनियों ने त्योहारी सत्र में मांग बचाने के लिए लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया है। पार्ले और नेस्ले जैसी कंपनियों का संकेत है कि कीमतों में संभावित बढ़ोतरी पर विचार दिसंबर के बाद किया जा सकता है।

रोजमर्रा की जरूरत का उपभोक्ता सामान (एफएमसीजी) बनाने वाली कंपनियों को चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में मार्जिन पर लगातार दबाव का सामना करना पड़ सकता है। कच्चे माल की बढ़ती लागत कंपनियों के मुनाफे को कम कर रही है, जिससे कंपनियां त्योहारी सत्र के बाद कीमतों में बढ़ोतरी और उपभोक्ता मांग पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं। सितंबर तिमाही में कच्चे माल की लागत का दबाव और गहरा गया, जिसने इससे पिछली तिमाही में दिखी नरमी के रुख को पलट दिया।

त्योहारी सत्र के दौरान उपभोक्ता मांग को बनाए रखने के लिए कंपनियों द्वारा इस बढ़ी हुई लागत का एक हिस्सा खुद वहन करने के साथ उनके मार्जिन पर असर पड़ा। ग्रांट थॉर्नटन भारत के भागीदार नवीन मलपानी ने कहा कि जिंसों में यह बढ़ोतरी असमान रही है। कच्चा तेल, पैकेजिंग सामग्री, पाम तेल और चीनी के चलते खासतौर से लागत का दबाव बना है।

उन्होंने कहा, ‘‘रुपये के संदर्भ में, सितंबर में पाम तेल की कीमतें सालाना आधार पर लगभग 21 प्रतिशत अधिक रहीं। दूसरी ओर मासिक आधार पर आठ प्रतिशत की गिरावट के बावजूद चीनी की कीमतें सालाना आधार पर करीब 18 प्रतिशत ऊंची बनी रहीं।’’ मलपानी ने कहा कि बढ़ती लागत की पूरी भरपाई कीमतों में बढ़ोतरी और परिचालन दक्षता के जरिये नहीं हो पाई है, जिससे परिचालन मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है। पार्ले प्रोडक्ट्स के मुख्य विपणन अधिकारी (सीएमओ) मयंक शाह ने पीटीआई-भाषा को बताया कि बढ़ती महंगाई एफएमसीजी उद्योग के लिए एक बड़ा विषय है, जो निश्चित रूप से चिंताजनक है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कंपनियां तुरंत कीमतें बढ़ाने के बजाय कार्यकुशलता में सुधार और लागत में कटौती के जरिये बढ़ी हुई लागत की भरपाई कर मार्जिन के झटके को आंशिक रूप से खुद वहन करने की कोशिश कर रही हैं। शाह ने कहा कि देश भर के शहरी और ग्रामीण इलाकों में मांग मजबूत बनी रही, क्योंकि कंपनियों ने लागत में हुई पूरी बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला। उन्होंने कहा, ‘‘कीमतों में बढ़ोतरी पर अधिकांश फैसले त्योहारी सत्र के बाद ही लिए जाएंगे... ऐसे में, आपको दिसंबर के बाद से इस दिशा में कुछ कदम दिख सकते हैं।’’ उन्होंने कहा कि कंपनियां लागत प्रबंधन के लिए छूट और विज्ञापन खर्चों में कटौती पर भी विचार कर रही हैं।

इसके साथ ही उन्होंने जोड़ा कि मांग को सुरक्षित रखना सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। नेस्ले इंडिया के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक मनीष तिवारी ने भी पिछले सप्ताह इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कहा था कि बढ़ती महंगाई, विशेष रूप से खाद्य मुद्रास्फीति एक हकीकत है। जिंसों के परिदृश्य पर नेस्ले इंडिया ने कहा कि कॉफी और गेहूं की कीमतें एक सीमित दायरे में रहने की उम्मीद है, जबकि दिसंबर तिमाही में चीनी और खाद्य तेल के दाम ऊंचे स्तर पर स्थिर रहेंगे।

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