मैन्युफैक्चरिंग और महंगे शेयरों से डरे Foreign Investors, आखिर क्यों भारतीय बाजार से कतरा रहे हैं निवेशक?

भारतीय शेयर बाजार के ऊंचे मूल्यांकन और एआई क्षेत्र में सीमित विकल्पों के चलते विदेशी निवेशकों का रुझान अब उत्तर एशियाई बाजारों की ओर बढ़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और रुपए की कमजोरी ने विदेशी संस्थागत निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे बाजार से भारी पूंजी निकासी देखी जा रही है। शेयर बाजार, विदेशी निवेशक, एआई स्टॉक और भारतीय अर्थव्यवस्था इस विश्लेषण के प्रमुख पहलू हैं।
टेक्नोलॉजी शेयरों की चमक के बीच भारतीय शेयर बाजार को लेकर विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। कई वैश्विक निवेशक अब भारत की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद यहां पैसा लगाने से पीछे हट रहे हैं। एआई से जुड़ी कंपनियों में निवेश के सीमित विकल्प, कमजोर कारोबारी नतीजे, महंगा मूल्यांकन और कच्चे तेल पर निर्भरता को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, सिंगापुर स्थित मल्टी फैमली निवेश कार्यालय रीड कैपिटल पार्टनर्स ने करीब एक महीने पहले अपने शेयर निवेश में कटौती करते हुए भारतीय बाजार से पूरी तरह बाहर निकलने का फैसला किया। कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी जेराल्ड गैन का कहना है कि भारत की आर्थिक वृद्धि की कहानी अब पहले जैसी मजबूत नहीं दिखाई दे रही है। उनका मानना है कि भारत में फिलहाल ऐसा कोई बड़ा निवेश अवसर नहीं दिख रहा, जो विदेशी पूंजी को आकर्षित कर सके।
यह रुख कई दूसरे वैश्विक निवेश प्रबंधकों में भी दिखाई दे रहा है। हाल के बैंक ऑफ अमेरिका निवेशक सर्वेक्षण में भारत को एशिया का सबसे कम पसंदीदा बाजार बताया गया। जानूस हेंडरसन इन्वेस्टर्स और वैंटेज प्वाइंट एसेट मैनेजमेंट से जुड़े निवेश प्रबंधकों ने भी पिछले करीब एक साल में भारत में अपना निवेश घटाकर लगभग शून्य कर दिया है।
गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले भारत विदेशी निवेशकों के लिए दुनिया के सबसे आकर्षक बाजारों में शामिल था। तेज आर्थिक वृद्धि, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा निर्माण और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विनिर्माण बढ़ाने की कोशिशें इसके पक्ष में प्रमुख तर्क थे। लेकिन अब दक्षिण कोरिया और ताइवान की एआई आधारित कंपनियों से मिल रहे बेहतर रिटर्न ने निवेशकों का ध्यान उत्तर एशिया की ओर मोड़ दिया है।
भारतीय शेयरों का मौजूदा मूल्यांकन भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का कारण है। भारतीय कंपनियां अगले साल की अनुमानित कमाई के करीब 17.6 गुने मूल्य पर कारोबार कर रही हैं। यह स्तर ऐतिहासिक औसत से थोड़ा नीचे है, लेकिन दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में अब भी काफी महंगा है। निफ्टी पचास का मूल्यांकन उभरते बाजारों के सूचकांक से करीब 77 प्रतिशत अधिक है। इसके चलते विदेशी निवेशकों ने इस साल लगभग 25 अरब डॉलर की शुद्ध निकासी की है।
इस दबाव का असर बाजार पर भी दिख रहा है। निफ्टी पचास फिलहाल वर्ष 2024 के मध्य के आसपास के स्तर पर है और एक दशक से चली आ रही लगातार वार्षिक बढ़त की श्रृंखला टूटने की स्थिति में है। दुबई स्थित वैश्विक मुख्य निवेश अधिकारी कार्यालय के प्रमुख गैरी डुगन के मुताबिक, उसके करीब 30 प्रतिशत ग्राहकों ने भारत से अपना पूरा निवेश निकाल लिया है।
हालांकि, घरेलू निवेशकों ने बाजार को बड़ा सहारा दिया है। बंबई शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक घरेलू संस्थानों ने इस साल करीब 60 अरब डॉलर के शेयर खरीदे हैं। इसी खरीदारी से छोटे शेयरों में मजबूती बनी हुई है। देश में आंकड़ा केंद्रों के विस्तार से जुड़ी कंपनियों को भी इसका फायदा मिल रहा है।
दूसरी ओर, मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कई तिमाहियों तक चलने वाले तेज वृद्धि चक्र में प्रवेश कर चुकी है। संस्था को उम्मीद है कि अगले साल जून तक बंबई संवेदी सूचकांक करीब 19 प्रतिशत चढ़कर 89,000 तक पहुंच सकता है, जबकि बेहतर स्थिति में यह 1 लाख का स्तर भी छू सकता है।
लेकिन विदेशी निवेशकों की मुख्य चिंता सिर्फ शेयर बाजार का प्रदर्शन नहीं है। जानूस हेंडरसन के सत धुरा के अनुसार, असली चुनौती रोजगार, मैन्युफैक्चरिंग और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने की है। उनका कहना है कि वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में एकरूपता, अचल संपत्ति सुधार और दिवाला कानून जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन इससे रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग की मूल समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी भारतीय संपत्तियों की कमजोरी उजागर की है। अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिरा। भारतीय अर्थव्यवस्था की तेल आयात पर भारी निर्भरता से चालू खाते पर दबाव बढ़ता है और कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के डॉलर में मिलने वाले रिटर्न को कम करता है। भारत ने मुद्रा को संभालने के लिए प्रवासी भारतीयों से 127 अरब डॉलर जुटाए हैं, लेकिन इसके बावजूद रुपया एशिया की कमजोर मुद्राओं में बना हुआ है।
यूरोपियन बैंक से जुड़े अर्थशास्त्री कार्लोस कासानोवा के मुताबिक कमजोर मुद्रा विदेशी निवेशकों की चिंता बढ़ा सकती है और कंपनियों के मुनाफे की स्थिरता पर भी सवाल खड़े कर सकती है। वहीं, उभरते बाजारों के सूचकांकों में भारत का हिस्सा भी घटकर करीब 11 प्रतिशत रह गया है, जो एक साल पहले 16 प्रतिशत था। ऐसे में भारत के सामने विदेशी पूंजी वापस लाने, रोजगार बढ़ाने और एआई आधारित वैश्विक निवेश दौड़ में अपनी जगह बनाने की चुनौती हैं।
अन्य न्यूज़













