Swiggy में बढ़ा भारतीयों का दबदबा, 50% से ज्यादा हुई हिस्सेदारी, Share Price में आया उछाल

घरेलू हिस्सेदारी 50% से अधिक होने के बाद स्विगी अब भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे उसके रैपिड-डिलीवरी कारोबार को परिचालन संबंधी लाभ मिल सकता है। हालांकि, कंपनी ने स्पष्ट किया है कि इस बदलाव से प्रबंधन या नियंत्रण में तत्काल कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
शेयर बाजार में मंगलवार का कारोबारी सत्र स्विगी के निवेशकों के लिए राहत भरा रहा। कंपनी के शेयरों में करीब 7 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई। इस बढ़त की बड़ी वजह कंपनी की ओर से दी गई वह जानकारी रही, जिसमें बताया गया कि उसकी घरेलू हिस्सेदारी अब 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है। मौजूद जानकारी के अनुसार यह बदलाव कंपनी को भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनी बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुंचाता है।
बता दें कि कारोबार के दौरान स्विगी का शेयर लगभग 6.7 प्रतिशत चढ़कर 266 रुपये पर बंद हुआ। यह उस दिन बीएसई 500 सूचकांक के सबसे अधिक बढ़त दर्ज करने वाले प्रमुख शेयरों में शामिल रहा। हालांकि वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक कंपनी का शेयर लगभग 29.3 प्रतिशत नीचे है, जबकि इसी अवधि में निफ्टी 50 सूचकांक में लगभग 6.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
कंपनी ने शेयर बाजार को दी गई सूचना में बताया कि 6 जुलाई तक उसके पूर्ण रूप से परिवर्तित चुकता इक्विटी शेयरों में कुल विदेशी निवेश 49.76 प्रतिशत रह गया है। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश और अन्य अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश शामिल हैं। इसके साथ ही घरेलू निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 50.24 प्रतिशत हो गई है।
हालांकि कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल विदेशी हिस्सेदारी घटने और घरेलू हिस्सेदारी बढ़ने से कंपनी का स्वामित्व या नियंत्रण स्वतः नहीं बदल जाता है। स्विगी के अनुसार कंपनी की शेयर पूंजी, प्रबंधन, कारोबार, मतदान अधिकार या शेयरधारकों के अधिकारों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यदि भविष्य में कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है तो उसकी जानकारी नियामकीय नियमों के अनुसार सार्वजनिक की जाएगी।
गौरतलब है कि भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनी का दर्जा मिलने से कंपनियों को विदेशी निवेश नियमों के तहत कुछ अतिरिक्त ऑपरेशन सुविधाएं मिल सकती हैं। विशेष रूप से त्वरित वितरण कारोबार में यह दर्जा काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी स्थिति में कंपनियां पात्र कारोबार में सूची आधारित मॉडल अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं, जिससे खरीद, भंडारण और आपूर्ति व्यवस्था पर अधिक नियंत्रण मिलता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार स्विगी पहले ही अपने रैपिड डिलीवरी कारोबार इंस्टामार्ट का पुनर्गठन कर चुकी है। इसे एक अधीनस्थ सहायक कंपनी के रूप में तैयार किया गया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भविष्य में सूची आधारित कारोबार मॉडल अपनाने की तैयारी का हिस्सा हो सकता है। कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी राहुल बोथरा भी पहले कह चुके हैं कि ऐसा बदलाव कारोबार के लिए स्वाभाविक विकास होगा और इससे लंबे समय में लाभप्रदता बेहतर हो सकती है, हालांकि इसके लिए अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी।
बता दें कि कुछ सप्ताह पहले कंपनी के शेयरधारकों ने भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनी बनने से जुड़े प्रस्तावित अनुच्छेद संशोधनों को मंजूरी नहीं दी थी। उस समय कंपनी ने कहा था कि इन बदलावों का उद्देश्य कॉरपोरेट प्रशासन को मजबूत करना था, न कि संस्थापकों का नियंत्रण बढ़ाना।
स्विगी के प्रमुख प्रतिस्पर्धी इटरनल पहले ही विदेशी हिस्सेदारी को 49.5 प्रतिशत तक सीमित रखकर भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनी की स्थिति मजबूत कर चुके हैं। इससे उसके रैपिड डिलीवरी प्लेटफार्म ब्लिंकिट को ऑपरेशन संबंधी अधिक लचीलापन मिला है। अब स्विगी भी उसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है, हालांकि कंपनी ने दोहराया है कि केवल घरेलू हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक होने से उसका आधिकारिक स्वामित्व और नियंत्रण स्वतः परिवर्तित नहीं माना जाएगा। आने वाले समय में नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इस दिशा में आगे की तस्वीर और साफ हो सकती है।
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