NSE की प्रस्तावित लिस्टिंग से भारतीय IPO बाजार मजबूत होगा, Unlisted Shares पर बढ़ेगा दबाव

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की प्रस्तावित लिस्टिंग से भारत के आईपीओ बाजार को मजबूती मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इससे गैर-लिस्टेड शेयरों के कारोबार पर दबाव बढ़ सकता है। एनएसई की सार्वजनिक लिस्टिंग के बाद निवेशकों का ध्यान अंतरिक्ष, रक्षा और विमानन जैसे नए कारोबारी क्षेत्रों की कंपनियों पर केंद्रित हो सकता है।
भारत के शेयर बाजार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई की बहुप्रतीक्षित लिस्टिंग अब एक बड़ा बदलाव ला सकती है। जहां इसके सार्वजनिक बाजार में आने से आईपीओ बाजार को मजबूती मिलने की उम्मीद है, वहीं गैर-लिस्टेड शेयरों में चल रही तेजी को बड़ा झटका लग सकता है। पिछले कुछ वर्षों में इस बाजार ने अमीर निवेशकों और बड़े कोषों के बीच अपनी अलग जगह बनाई है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, दुनिया के सबसे ज्यादा वायदा कारोबार वाले शेयर बाजार के संचालक एनएसई की गैर-लिस्टेड शेयरों के कारोबार में करीब आधी हिस्सेदारी थी। यह अनुमान गैर-लिस्टेड जो़न नाम के कारोबार मंच का है। एनएसई के सार्वजनिक बाजार में आने के बाद उसके शेयरों की निजी खरीद-बिक्री का आकर्षण तेजी से कम हो सकता है। इसका सीधा असर उन ऑनलाइन मंचों और विशेष दलालों पर पड़ सकता है, जो गैर-लिस्टेड कंपनियों के शेयरों के खरीदार और विक्रेता को आपस में जोड़ते हैं।
बता दें कि भारत में पिछले दो साल के दौरान आईपीओ से जुटाई गई रकम ने लगातार नए रिकॉर्ड बनाए हैं। इसी माहौल में गैर-लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में निवेश का चलन भी तेजी से बढ़ा। निवेशक उन कंपनियों में लिस्टेड होने से पहले पैसा लगाने लगे, जिनके भविष्य में शेयर बाजार में आने की उम्मीद थी। इससे ऑनलाइन कारोबार मंचों, विशेषज्ञ दलालों और कागजी प्रक्रिया में मदद करने वाले दूसरे बिचौलियों का पूरा कारोबार खड़ा हो गया।
एनएसई इस व्यवस्था का सबसे बड़ा आकर्षण रहा। इसका कारोबार बहुत बड़ा है, मुनाफा मजबूत है और शेयर बाजार में इसकी स्थिति बेहद प्रभावशाली है। साथ ही, कंपनी से जुड़ी जानकारी का खुलासा भी सूचीबद्ध कंपनियों की तरह होता रहा है। दूसरी ओर, बीएसई पहले से शेयर बाजार में लिस्टेड है, इसलिए उसके मूल्यांकन को एनएसई के लिए एक तरह का पैमाना माना जाता रहा। एनएसई की लिस्टिंग में वर्षों की देरी ने निवेशकों को उसके गैर-लिस्टेड शेयरों में लंबे समय तक खरीद-बिक्री का मौका दिया।
मोटीलाल ओसवाल प्राइवेट वेल्थ के मुख्य निवेश अधिकारी संदीपन रॉय ने एनएसई को लगभग पहले से ही लिस्टेडजैसी कंपनी बताते हुए कहा कि इससे पूरा कारोबार सिस्टम खड़ा हो गया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आईपीओ से पहले एनएसई के करीब 2 लाख 31 हजार शेयरधारक थे। 2016 में यह संख्या 80 से भी कम थी। मार्च 2025 में जारी आखिरी मासिक जानकारी के अनुसार, उस महीने करीब 1,500 करोड़ रुपये के शेयरों का लेनदेन हुआ था।
एनएसई के बाजार से हटने के बाद गैर-लिस्टेड शेयरों के कारोबार को नया बड़ा आकर्षण तलाशना होगा। फिलहाल किसी दूसरी गैर-लिस्टेड कंपनी में एनएसई जैसी बड़ी पहचान, कारोबार का स्तर और खरीद-बिक्री की सुविधा नहीं है। ऐसे में निवेशकों को छोटी कंपनियों की ओर ले जाना आसान नहीं होगा, क्योंकि इनमें वित्तीय जानकारी कम उपलब्ध होती है और शेयरों को खरीदना-बेचना भी मुश्किल हो सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों को इस बाजार में कुछ खास क्षेत्रों की कंपनियों से उम्मीद बनी हुई है। तीन ए कैपिटल सर्विसेज के संस्थापक राजन शाह के मुताबिक, अंतरिक्ष तकनीक, विमानन, रक्षा, आंकड़ा केंद्र और नए दौर के कारोबार से जुड़ी कंपनियां निवेशकों का ध्यान खींच सकती हैं। इनमें स्टरलाइट इलेक्ट्रिक, इंडोफिल इंडस्ट्रीज, क्रास्नी डिफेंस टेक्नोलॉजीज, बेरार फाइनेंस, किनेको, इंडियन पोटाश और गरुड़ एयरोस्पेस जैसी कंपनियां शामिल हैं।
लेकिन गैर-लिस्टेड शेयरों में निवेश हमेशा फायदे का सौदा नहीं रहा है। एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज और टाटा कैपिटल जैसी चर्चित कंपनियों में निवेश करने वाले कुछ लोगों को नुकसान उठाना पड़ा। एनएसई के शेयर खरीदने वाले कुछ निवेशक भी सार्वजनिक निर्गम के समय नुकसान की स्थिति में पहुंच सकते हैं। गैर-लिस्टेडजो़न के सह-संस्थापक उमेश पालीवाल के मुताबिक, इस बाजार में कई बार बहुत ज्यादा मुनाफा भी मिला है, लेकिन सही समय पर निवेश और सही मूल्यांकन सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।
गौरतलब है कि एनएसई की लिस्टिंग केवल एक कंपनी के शेयर बाजार में आने की घटना नहीं होगी। इससे प्राथमिक बाजार में गतिविधि बढ़ने के साथ गैर-लिस्टेड शेयरों के कारोबार का पूरा ढांचा भी बदल सकता है और निवेशकों के लिए जोखिम, अवसर और कंपनियों के मूल्यांकन के नए मानक तय होने हैं।
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