Tata Sons को RBI से झटका, Upper Layer NBFC से बाहर निकलने की अर्जी खारिज

Tata Group
ANI
Ankit Jaiswal । Sep 14 2026 7:23PM

भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस का मुख्य निवेश कंपनी पंजीकरण वापस लेने का आवेदन खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद टाटा संस के लिए एनबीएफसी की ऊपरी श्रेणी से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया है। अब कंपनी के लिए शेयर बाजार में अनिवार्य सूचीबद्धता की संभावना बढ़ गई है।

टाटा समूह की सबसे बड़ी होल्डिंग कंपनी टाटा संस को लेकर लंबे समय से चल रहा रेगुलेटरी मामला अब एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की मुख्य निवेश कंपनी के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन वापस करने की अर्जी खारिज कर दी है। इस फैसले के बाद कंपनी के लिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का रास्ता लगभग तय हो गया है। टाटा संस ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के ढांचे से बाहर निकलने के लिए मार्च 2024 में यह आवेदन किया था।

मौजूद जानकारी के अनुसार, रिजर्व बैंक का फैसला शनिवार को टाटा संस के कंपनी सचिव और मुख्य वित्तीय अधिकारी को भेजे गए पत्र के जरिए बताया गया। इस फैसले के साथ टाटा संस की उस कोशिश पर विराम लग गया है, जिसके जरिए कंपनी अनिवार्य शेयर बाजार सूचीबद्धता से बचते हुए एक निजी होल्डिंग कंपनी के रूप में काम करना चाहती थी। टाटा संस और रिजर्व बैंक ने इस मामले पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने सितंबर 2022 में टाटा संस को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी की अपर लेयर में रखा था। इस श्रेणी में शामिल कंपनियों के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी है। टाटा संस के लिए शुरुआती समय सीमा 30 सितंबर 2025 तय की गई थी। कंपनी ने इस समय सीमा से पहले ही नियामकीय ढांचे से बाहर निकलने का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया था।

इसके तहत टाटा संस ने वर्ष 2024 में 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकाया और खुद को कर्जमुक्त कर लिया। इसके बाद कंपनी ने मुख्य निवेश कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण वापस करने के लिए आवेदन किया। यदि भारतीय रिजर्व बैंक इस आवेदन को स्वीकार कर लेता तो टाटा संस गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के नियमन से बाहर निकल सकती थी और निजी कंपनी बनी रह सकती थी। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने आवेदन पर फैसला लंबित रखा और इस दौरान टाटा संस को अपर लेयर वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की सूची में शामिल करता रहा।

अब इस फैसले के बाद टाटा संस के लिए यह विकल्प बंद हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के नए नियमों के तहत एक लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक संपत्ति वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां स्वतः अपर लेयर में आती हैं। मार्च 2026 तक टाटा संस की अकेले की संपत्ति दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। ऐसे में कंपनी के लिए इस श्रेणी से बाहर निकलना और सूचीबद्धता की अनिवार्यता से बचना और मुश्किल हो गया है।

बता दें कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए रिजर्व बैंक ने अक्टूबर 2021 में आकार आधारित नियामकीय व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत कंपनियों को आधार, मध्य, ऊपरी और शीर्ष श्रेणियों में बांटा गया। हर अपर लेयर के साथ निगरानी और नियामकीय आवश्यकताएं बढ़ती जाती हैं। सितंबर 2022 में टाटा संस के साथ बजाज फाइनेंस और श्रीराम फाइनेंस जैसी कंपनियों को भी अपर लेयर में रखा गया था।

टाटा संस की संभावित सूचीबद्धता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के सबसे पुराने और बड़े कारोबारी समूहों में से एक की शीर्ष होल्डिंग कंपनी है। इसके पास सूचना प्रौद्योगिकी, वाहन, इस्पात, उपभोक्ता उत्पाद, विमानन, आतिथ्य और वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कई टाटा कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। शेयर बाजार में आने के बाद कंपनी को अपने वित्तीय प्रदर्शन, निवेश और पूंजी के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी नियमित रूप से सार्वजनिक करनी होगी।

इससे कंपनी पर सार्वजनिक निवेशकों की निगरानी भी बढ़ेगी। निवेशक टाटा संस की विभिन्न कंपनियों में हिस्सेदारी के मूल्य, पूंजी के इस्तेमाल और निवेश पर मिलने वाले लाभ को लेकर ज्यादा स्पष्टता की मांग कर सकते हैं। यही वजह है कि प्रस्तावित सूचीबद्धता को टाटा समूह की संरचना में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

वहीं कंपनी के स्वामित्व को लेकर भी अलग-अलग पक्षों की सोच सामने आती रही है। नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है और वह सूचीबद्धता को लेकर चिंतित बताया जाता है। जून में नोएल टाटा की ओर से रिजर्व बैंक के समक्ष यह चिंता जताए जाने की बात सामने आई थी कि सार्वजनिक सूचीबद्धता कंपनी की दीर्घकालिक संरचना और परोपकारी गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी ओर, शापूरजी पालोनजी समूह की टाटा संस में करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह समूह लंबे समय से सूचीबद्धता के पक्ष में रहा है और उसका तर्क है कि इससे हिस्सेदारों को अपनी हिस्सेदारी का वास्तविक मूल्य प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। दोनों पक्षों के बीच यह मतभेद कई बार कानूनी विवादों तक भी पहुंच चुका है।

यह फैसला टाटा समूह में नेतृत्व परिवर्तन के दौर के बीच भी आया है। एन चंद्रशेखरन ने कहा है कि फरवरी 2027 में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह नया कार्यकाल नहीं मांगेंगे। करीब एक दशक तक समूह का नेतृत्व करने के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगा और टाटा संस की भविष्य की संरचना कैसी होगी, इन चर्चाओं के बीच सूचीबद्धता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, रिजर्व बैंक का आवेदन खारिज करना अपने आप में प्रारंभिक शेयर बिक्री की घोषणा नहीं है। प्रस्तावित सूचीबद्धता का समय, आकार और ढांचा अभी तय नहीं हुआ है। नियमों के मुताबिक ऊपरी श्रेणी की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर सूचीबद्ध होने के बाद भी कम से कम पांच साल तक अतिरिक्त नियामकीय आवश्यकताएं लागू रहती हैं। ऐसे में अब निगाहें टाटा संस के अगले कदम और टाटा ट्रस्ट्स तथा शापूरजी पालोनजी समूह के बीच मतभेदों के बीच बनने वाली सूचीबद्धता की संरचना पर है।

All the updates here:

अन्य न्यूज़