आखिर कब तक हावी रहेगा लोकतंत्र में भाई-भतीजावाद

By राकेश सैन | Publish Date: Apr 16 2019 12:45PM
आखिर कब तक हावी रहेगा लोकतंत्र में भाई-भतीजावाद
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असल में वंशवाद वह कर्क रोग है जो लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खत्म किए जा रहा है। वंशवादी दलों के केंद्र में केवल एक खास परिवार या व्यक्ति ही रहता है। उसका संचालन, रीति-नीति, संगठनात्मक ढांचा, शक्तियां यानि सारी व्यवस्था का केंद्र बिंदू वही परिवार रहता है।

राजस्थानी में कहावत है- केला, बिच्छी, केकड़ा वनस्पतियों में बांस, अपने जन्मे आप मरे या फिर सत्यानाश। यानि केला व बांस जिन्दगी में एक ही बार फल-फूल देते हैं और बांस के फूल अकाल या विपत्ती का संकेत हैं। चैत्र और वैशाख में वनस्पति जगत में बोराई यौवन पर है और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर भी वंशवाद की नई कोपलें फूटती दिखा रही हैं। राहुल गांधी ने 10 अप्रैल को अमेठी लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। इस दौरान हुए रोड शो में चर्चा का विषय रहे प्रियंका के बच्चे। जब राहुल रोड शो कर रहे थे तो उनके साथ बहन प्रियंका और जीजा रॉबर्ट वाड्रा तो थे ही, साथ ही भांजा रेहान और भांजी मिराया भी नजर आए। रोड शो के दौरान प्रियंका अपने बच्चों को अमेठी के बारे में बताती दिखीं। रेहान राहुल के बगल में खड़े रहे। कोई भी चीज राहुल पर उछाली जाती तो वह उसे रेहान को देते। उन्होंने एक माला भी रेहान को पहनाई। पार्टी के धुरंधर पैदल थे और पूरे दृश्य में परिवार के केवल पांच लोग ही मुख्यत: दृष्टिगोचर हुए। दृश्य ठीक वैसा था जैसे सिंह अपने शावकों को जंगल से परिचित करा रहा हो और बिल्ली अपने बच्चों को घरों की चोर मोरियां दिखा रही हो। वंशवाद की सुंदर-सुंदर कलियां देख कर चाहे 'दरबारी' फाग गा रहे हों परंतु लोकतंत्र के हितैषियों के लिए यह दृश्य बांस की बोराई से कम त्रासद और लोकतंत्र के लिए अशुभ नहीं हो सकता।
संविधान में व्यस्क मताधिकार की व्यवस्था करते हुए बाबा साहिब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि- मैने आज रानियों की नसबंदी कर दी। भविष्य के राजा मतपेटियों से निकलेंगे। लेकिन देखने में आरहा है कि आज के कुछ राजा-रानियों ने उसी संवैधानिक व्यवस्था को सैरोगेसी मदर यानि किराए की कोख बना दिया, जहां से कुछ खास परिवारों के नौनिहाल ही कलगी और छत्र लिए पैदा हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस तरह हावी है कि मानो कोई औद्योगिक घराना राजनीतिक व्यवस्था चला रहा हो। यूपी की सपा, बिहार के राजद और तमिलनाडु की डीएमके में परिवारिक सदस्यों के बीच बंटे राजनैतिक साम्राज्य का किस्सा तो कुछ ज्यादा ही विवादास्पद है। देश में गिनेचुने राज्य ही होंगे जहां हमें वंशानुगत राजनीति के कोई उदाहरण नहीं मिलते। इन्हीं रुझानों और प्रवृत्तियों का अध्ययन करते हुए ब्रिटिश लेखक और इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच ने अपनी 2011 में प्रकाशित पुस्तक 'इंडिया: ए पोट्रेट' में लिखा था कि वो दिन दूर नहीं जब भारत में एक तरह से राजतंत्र जैसी व्यवस्था कायम हो जाएगी। हाल में हुए कुछ अध्ययनों के मुताबिक 2009 में 29 प्रतिशत सांसद कुनबे की राजनीति से आए थे। राष्ट्रीय दलों में वंशवाद के मामले में कांग्रेस पहले स्थान पर रही है। उसके 37 प्रतिशत वंशानुगत सांसद थे। 2014 की संसद में वंशानुगत राजनीति के प्रतिनिधियों में कमी देखी गई। 2009 में मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में 36 प्रतिशत मंत्री वंशवादी थे तो 2014 में ये संख्या 24 प्रतिशत रह गई। संसद में इस समय 36 दलों के प्रतिनिधि हैं, इनमें से 13 दलों के प्रतिनिधि दरअसल कुछ परिवारों के सदस्य ही हैं। कुनबावाद की बहस पर संतुलन साधने की मीडिया की प्रवृति और सभी दलों में इसके होने का तर्क दे कर चाहे कांग्रेस बचने का प्रयास करती आई है परंतु इस तथ्य को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि भारतीय लोकतंत्र में वंशवादी अमरबेल रोपने और खाद पानी देने का पाप इसी दल ने ही किया है। मोती लाल नेहरू से लेकर जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा, राजीव-सोनिया, राहुल-प्रियंका के बाद भांजा-भांजी की जोड़ी छठी पीढ़ी है जो राजनीतिक परिस्थितियों का सिंहावलोकन करती लग रही है। 


दुखद बात तो यह है कि कुनबावाद को लोगों ने भी सहजता से लेना शुरू कर दिया है, मानो वे इसके अभ्यस्त हो चले हैं। कांग्रेस में भांजा-भांजी के पदार्पण से ये बहस उठी है कि आखिर लोकतंत्र में भाई-भतीजावाद कब तक हावी रहेगा और इससे निजात मिलेगी भी या नहीं। क्या लोकतंत्र जमीनी संघर्षों, सामाजिक सरोकारों और नेतृत्व कौशल को परखने के बजाय परिवार केंद्रित राजनीति का शिकार हो जाएगा? परिवारवाद के पक्ष में कहा जाता है कि डाक्टर का बेटा डाक्टर सकता है तो नेता का जाया नेता क्यों नहीं? दलील ठीक है परंतु कोई भी बिना परिश्रम के चिकित्सक नहीं बन सकता जबकि वंशवादी राजनीति में संतानें अपने खानदान की बदौलत नेता बनती हैं। परिश्रम या संघर्ष कर कोई भी व्यक्ति नेता बने तो इसमें क्या आपत्ति हो सकती है? दूसरा प्रश्न पूछा जाता है कि वंशवादी राजनीति में हर्ज ही क्या है? आखिर किसी न किसी को तो व्यवस्था चलानी है, वह किसी नेता की संतति हो तो क्या फर्क पड़ता है?
 
असल में वंशवाद वह कर्क रोग है जो लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खत्म किए जा रहा है। वंशवादी दलों के केंद्र में केवल एक खास परिवार या व्यक्ति ही रहता है। उसका संचालन, रीति-नीति, संगठनात्मक ढांचा, शक्तियां यानि सारी व्यवस्था का केंद्र बिंदू वही परिवार रहता है। उसी की सुविधा व सुरक्षित भविष्य के लिए उस दल की व्यवस्था को तोड़ा-मरोड़ा व गढ़ा जाता है। जैसे कांग्रेस, सपा, राजग जैसे दल नेहरू-गांधी और यादव परिवारों के आसपास ही घूमते हैं। बहुत अच्छे कार्यकर्ता लेफ्टीनेंट जनरल तक तो पदोन्नत होते हैं परंतु जनरल या फील्ड मार्शल इन्हीं कुनबों के लोग रहते हैं। जिन राजनीतिक दलों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन करना होता है उसी में ही जनतंत्र का दम घुट जाता है। इस तरह के कुनबा-कबीलावादी दल सत्ता में आते हैं तो सरकार के कल्याण का केंद्र यही खानदान बनते हैं न कि साधारण लोग। इन कुनबों की सुविधा के लिए जनहित की उपेक्षा होनी शुरू हो जाती है। सरकारी मशीनरी इन्हीं की सेवा सुश्रुषा में जुटी दिखाई देती है। इन्हीं के लिए कायदे-कानून बनाए या तोड़े जाते हैं। उदाहरण के लिए 2004 से लेकर 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार सत्तारूढ़ थी परंतु आरोप लगते रहे हैं कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् नामक संस्था गठित कर सोनिया गांधी सरकार में दखलंदाजी करती रहीं। संविधान में इस परिषद् की कोई व्यवस्था नहीं है परंतु कुनबे के दरबारियों ने इस तरह की व्यवस्था खड़ी कर दी कि सोनिया बिना जवाबदेही के सबकुछ संचालित करती रहीं। दूसरा उदाहरण है कि मनमोहन सरकार में हवाई अड्डों पर जिन वीवीआईपी को चेकिंग में छूट दी गई थी उनमें रॉबर्ट वाड्रा भी शामिल थे। उनके पास कोई संवैधानिक पद नहीं था परंतु उन्हें यह सुविधा केवल गांधी खानदान का जंवाई होने के कारण मिली। क्या किसी आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव हो सकता है?


देखा जाए तो 1885 से देश के राजनीतिक पटल पर छाई रही कांग्रेस पार्टी के अधोपतन का कारण यही कुनबावाद रहा है। परिवारवाद के चलते ही बिना अनुभव के पहले इंदिरा फिर राजीव को प्रधानमंत्री, सोनिया व राहुल को अध्यक्ष बना दिया गया। इंदिरा तो राजनीति में चल पड़ीं परंतु राजीव इतने सफल नहीं हुए। प्रणब मुखर्जी जैसे कई मंझे नेताओं के सहारे व मनमोहन सिंह को आगे कर सोनिया ने पार्टी को न केवल चलाया बल्कि दस साल सत्ता का स्वाद भी चखाया परंतु राहुल गांधी और उनके नेतृत्व में कांग्रेस की हालत सबके सामने है। कांग्रेस अब राहुल की दीदी में अपना भविष्य देख रही है और प्रियंका गांधी वाड्र अपने पति, बेटा-बेटी के रूप में एक के साथ तीन मुफ्त का पैकेज अपने भईया की पार्टी को देने का प्रयास कर रही लगती हैं। रॉबर्ट वाड्रा को लेकर तो उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर उत्साहित दिखाई दे ही रहे हैं और अगर भविष्य में भांजा-भांजी भी वंशवादी राजनीति की नई श्रृंखला बनते हैं तो इसमें अधिक अचरज नहीं होना चाहिए।
 


- राकेश सैन
 

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