ट्रंप और जिनपिंग की दोस्ती ने बदल डाले वैश्विक राजनीतिक समीकरण, Quad का भविष्य अधर में

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ट्रंप की चीन यात्रा ने यह भी साफ कर दिया कि चीन को अलग थलग करने की अमेरिकी रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। वहीं बीजिंग ने ट्रंप की इस यात्रा को केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे अपनी तकनीकी, आर्थिक और सामरिक शक्ति के प्रदर्शन में बदल दिया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा बदलती विश्व व्यवस्था का ऐसा प्रतीक बनकर सामने आई जिसने वैश्विक राजनीति की दिशा पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ट्रंप की लंबी बैठकों, व्यापारिक समझौतों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी सहयोग पर चर्चा तथा अमेरिकी उद्योगपतियों की भारी मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि तमाम टकरावों और आरोपों के बावजूद अमेरिका और चीन एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। इसी के साथ यह सवाल भी तेज हो गया है कि क्या इस यात्रा ने क्वॉड जैसे रणनीतिक समूहों के भविष्य पर भी अनिश्चितता पैदा कर दी है?

दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी, तब ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “अमेरिका भारत को चीन और रूस के हाथों खो रहा है।” यही नहीं, मोदी की चीन और रूस के नेताओं के साथ तस्वीरों को वाशिंगटन में रणनीतिक असहजता के रूप में देखा गया था। लेकिन अब वही ट्रंप खुद चीन की धरती पर शी जिनपिंग के साथ बैठकों में व्यस्त रहे। उनके साथ अमेरिका के सबसे बड़े उद्योगपति और तकनीकी कंपनियों के प्रमुख भी मौजूद रहे। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि भारत का चीन से संवाद अमेरिका के लिए “भारत को खो देना” था, तो फिर ट्रंप की अपनी चीन यात्रा को क्या कहा जाए? क्या यह अमेरिकी यथार्थवाद है, आर्थिक मजबूरी है या फिर वैश्विक शक्ति संतुलन की नई स्वीकारोक्ति है?

ट्रंप की इस यात्रा ने यह भी साफ कर दिया कि चीन को अलग थलग करने की अमेरिकी रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। वहीं बीजिंग ने ट्रंप की इस यात्रा को केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे अपनी तकनीकी, आर्थिक और सामरिक शक्ति के प्रदर्शन में बदल दिया। शहर की सड़कों पर चालक रहित विद्युत वाहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां, मानवरूपी रोबोट और डिजिटल विज्ञापन चीन की नई ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता था कि अब वह केवल सस्ती वस्तुएं बनाने वाला देश नहीं बल्कि भविष्य की तकनीकों का नेतृत्व करने वाली शक्ति बन चुका है।

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देखा जाये तो ट्रंप की यात्रा ऐसे समय हुई जब अमेरिका ईरान युद्ध के कारण कई मोर्चों पर दबाव में है। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार चीन ने ईरान संकट का उपयोग अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच चीन ने ऊर्जा आपूर्ति और हथियारों के जरिये अपनी भूमिका बढ़ाई, जबकि अमेरिका युद्ध और आर्थिक दबावों में उलझा रहा। यही कारण है कि ट्रंप को अंततः बीजिंग पहुंचकर शी जिनपिंग से संवाद करना पड़ा।

बीजिंग में हुई बातचीत के दौरान ताइवान सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया। शी जिनपिंग ने साफ कहा कि यदि ताइवान के मुद्दे को ठीक ढंग से नहीं संभाला गया तो दोनों देशों के बीच टकराव और संघर्ष हो सकता है। यह बयान केवल चेतावनी नहीं था बल्कि बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी था। चीन अब अमेरिका से बराबरी की भाषा में बात कर रहा है।

ट्रंप की प्राथमिकता हालांकि व्यापार और निवेश रही। उनके साथ एलन मस्क, जेन्सन हुआंग और अन्य अमेरिकी उद्योगपति भी पहुंचे। यह इस बात का संकेत था कि अमेरिकी उद्योग जगत चीन से दूरी नहीं चाहता। दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था और विशाल तकनीकी बाजार से अलग होना अमेरिका के लिए आसान नहीं है।

व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक बयान ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कई संवेदनशील मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए। बयान के अनुसार ट्रंप और शी जिनपिंग ने अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन में बाजार पहुंच बढ़ाने, चीन के निवेश को अमेरिका में प्रोत्साहित करने और कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर चर्चा की। दोनों देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने और ऊर्जा आपूर्ति बाधित न होने देने पर भी सहमति जताई। चीन ने जलडमरूमध्य के सैन्यीकरण का विरोध दोहराया, जबकि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देने पर भी साझा रुख सामने आया। यह बयान इस बात का संकेत है कि तीखी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अविश्वास के बावजूद अमेरिका और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर टकराव के बजाय नियंत्रित सहयोग की राह भी तलाश रहे हैं।

यही वह बिंदु है जहां क्वॉड का भविष्य भी सवालों में घिरता दिखाई देता है। क्वॉड को लंबे समय से हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाले समूह के रूप में देखा जाता रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की यह साझेदारी चीन को लेकर साझा रणनीतिक चिंता पर आधारित मानी जाती है। लेकिन यदि अमेरिका का राष्ट्रपति खुद चीन के साथ संबंधों को स्थिर करने, व्यापार बढ़ाने और तकनीकी सहयोग तलाशने बीजिंग पहुंचता है, तो फिर क्वॉड की वास्तविक दिशा क्या रह जाएगी?

भारत के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में नई दिल्ली ने क्वॉड को अपनी हिंद प्रशांत रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है। लेकिन ट्रंप की चीन यात्रा यह संकेत देती है कि अंततः अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही निर्णय लेगा। यदि आर्थिक या सामरिक कारणों से उसे चीन के साथ समझौता करना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति स्थायी मित्रताओं से अधिक स्थायी हितों पर चलती है।

ट्रंप की यात्रा ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया है। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल व्यापार युद्ध तक सीमित नहीं है। यह तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, दुर्लभ खनिज, चिप निर्माण, समुद्री मार्गों और वैश्विक प्रभाव की व्यापक लड़ाई बन चुकी है। लेकिन इस प्रतिस्पर्धा के बीच दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर भी हैं। अमेरिका चीन को रोकना चाहता है, लेकिन उसकी कंपनियां चीन के बाजार और विनिर्माण क्षमता से अलग नहीं हो पा रहीं। दूसरी ओर चीन अमेरिकी तकनीक और वैश्विक वित्तीय संरचना से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

इसीलिए बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात केवल दो नेताओं की बैठक नहीं थी। यह उस नई विश्व व्यवस्था की झलक थी जिसमें प्रतिद्वंद्विता और सहयोग साथ-साथ चलेंगे। दोनों देश सार्वजनिक रूप से एक दूसरे को चुनौती देंगे, लेकिन आर्थिक और तकनीकी स्तर पर पूरी तरह अलग भी नहीं होंगे।

इस पूरी प्रक्रिया में भारत की स्थिति बेहद जटिल हो जाती है। एक ओर वह अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी मजबूत कर रहा है, दूसरी ओर रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखता है और चीन के साथ संवाद भी बनाए हुए है। ट्रंप की चीन यात्रा भारत को यह संदेश भी देती है कि वैश्विक राजनीति में किसी एक धुरी पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।

बहरहाल, ट्रंप की बीजिंग यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी की विश्व राजनीति का केंद्र अब अमेरिका चीन संबंध ही होंगे। यही संबंध तय करेंगे कि वैश्विक अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी, तकनीकी नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा और भविष्य की विश्व व्यवस्था कैसी होगी। लेकिन इसके साथ ही यह यात्रा एक बड़ा सवाल भी छोड़ गई है कि यदि अमेरिका खुद चीन के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से गढ़ रहा है, तो फिर दुनिया के बाकी देशों से वह किस प्रकार की रणनीतिक निष्ठा की अपेक्षा कर सकता है?

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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