प्रियंका गांधी चुनाव लड़ें तो जीत मुश्किल, न लड़ें तो बीजेपी के तानें सुनें

By अजय कुमार | Publish Date: Apr 23 2019 12:01PM
प्रियंका गांधी चुनाव लड़ें तो जीत मुश्किल, न लड़ें तो बीजेपी के तानें सुनें
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असल में कांग्रेसी प्रियंका के वाराणसी से चुनाव लड़ने को लेकर भले ही जितना भी उत्साहित हो और राहुल गांधी इसे सिक्रेट बता रहे हों, परंतु सच्चाई यही है कि कांग्रेस इस समय अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी।

सियासत की डगर बड़ी पथरीली और उबड़−खाबड़ होती है। यहां कदम−कदम पर ठोकर का डर रहता है। हर कदम बहुत संभल कर रखना पड़ता है। जरा सी भी लापरवाही खतरनाक साबित हो सकती है। संभवता इस बात का अहसास कांग्रेस का तुरूप का इंका समझी जाने वाली प्रियंका वाड्रा को भी हो गया होगा। अभी प्रियंका को यूपी की राजनीति में कदम रखे दो−ढाई महीना ही हुआ होगा,लेकिन उनकी चमक फीकी पड़ने लगी है। वह भी भाई राहुल गांधी की तरह ही अपना पक्ष जनता के सामने मजबूती से नहीं रख पा रही हैं। शायद इसी लिए प्रियंका जनसभा करने की बजाए रोड शो को अधिक तरजीह दे रही हैं, लेकिन इस हकीकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि कोई भी नेता बिना बोले जनता से संवाद स्थापित नहीं कर सकता है, लेकिन मजबूरी यह है कि प्रियंका जैसे ही बोलती हैं भाजपा नेता उनकी बात पकड़ लेते हैं। ऐसे ही बढ़ बोलेपन का शिकार प्रियंका वाड्रा तब हो गईं जब अपने कार्यकर्ताओं के बीच में प्रियंका वाड्रा ने अति उत्साह में कह दिया था,' क्या मैं बनारस से लड़ जाऊं। हालांकि जब कांग्रेस आलाकमान से इस संबंध में पूछा गया तो उसने साफ कर दिया कि अभी किसी ऐसे मुददे पर बात नहीं हुई है, लेकिन कुछ दिग्गज कांग्रेसी जरूर प्रियंका के बयान से उत्साहित नजर आए। तो उधर, प्रियंका के मुंह से निकले यह शब्द भाजपा नेताओं ने पकड़ लिए। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि लोकतांत्रिक देश मं प्रियंका वाराणसी सहित कहीं से भी चुनाव लड़ने को स्वतंत्र हैं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के थिंक−टैंक के अहम हिस्सा, गांधी परिवार के करीबी पार्टी नेता सैम पित्रोदा का मानना है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला करती हैं तो यह अच्छी बात होगी। पूरे देश की निगाह इस जबरदस्त मुकाबले पर रहेगी। सैम की तरह ही कपिल सिब्बल जैसे नेता भी प्रियंका के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर खुशी का इजहार कर चुके हैं, लेकिन वह यह नहीं सोच पा रहे हैं कि अगर प्रियंका चुनाव हार जाती है तो इससे कांग्रेस के यूपी मिशन 2022 पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा। यही नहीं प्रियंका के वाराणसी से चुनाव लड़ने पर व उन सीटों अन्य सीटों पर भी समय नहीं दे पाएंगी जिसकी जिम्मेदारी कांग्रेस अध्यक्ष ने उनके कंधों पर डाली है।
भाजपा को जिताए

असल में कांग्रेसी प्रियंका के वाराणसी से चुनाव लड़ने को लेकर भले ही जितना भी उत्साहित हो और राहुल गांधी इसे सिक्रेट बता रहे हों, परंतु सच्चाई यही है कि कांग्रेस इस समय अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी। उधर, राजनैतिक पडित और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी समझ रहे हैं कि अगर प्रियंका वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं और गठबंधन का प्रत्याशी मैदान में नहीं भी होता है तो भी मोदी की जीत की राह में कोई बड़ा व्यवधान नहीं आएगा। वाराणसी में मोदी ने पिछले पांच वर्षो में काफी काम किया है। 26 को मोदी वाराणसी अपना पर्चा भरने आ रहे हैं। वैसे, यह सोचने वालों की भी कमी नहीं है कि किसी निर्णायक लड़ाई में महारथियों को सबसे महत्वपूर्ण मोर्चे पर खुद ही मैदान में उतरना चाहिए। डॉ राम मनोहर लोहिया, राज नारायण और सुषमा स्वराज जैसे कई नेता अतीत में ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर चुके हैं। जवाहर लाल नेहरू को चुनौती देने के लिए 1962 में डॉ लोहिया ने फूलपुर से चुनाव लड़ा था। इंदिरा गांधी को 1971 और 1977 में समाजवादी नेता राज नारायण ने रायबरेली में चुनौती दी थी। सोनिया गांधी ने जब 1999 में कर्नाटक की बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला लिया था तो सुषमा स्वराज वहां उन्हें चुनौती देने पहुंची थीं। 1971 में राज नारायण चुनाव हार गए, लेकिन 1977 में उन्होंने इंदिरा गांधी को हरा कर हिसाब चुकाया था। डॉ लोहिया और सुषमा स्वराज भी चुनाव हार गए थे लेकिन हार से डॉ. लोहिया और सुषमा का कद कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही। कुछ मुकाबले होते ही ऐसे हैं। हार और जीत से कहीं अधिक महत्व लड़ने का होता है। इससे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच अच्छा मैसेज जाता है।
 
जब बात यह आती है कि प्रियंका वाराणसी से चुनाव लडने का जोखिम क्यों उठाएंगी। तो कह सकते हैं कि प्रियंका ने पहला साहसिक कदम तो तभी उठा लिया था जब उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि के तौर पर चुना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीजेपी काफी मजबूत है। यहां बनारस से नरेंद्र मोदी  चुनाव लड़ते हैं। गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ आते हैं। गाजीपुर में बीजेपी का बड़ा चेहरा मनोज सिन्हा मौजूद हैं। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या इलाहाबाद के हैं। इन दिग्गजों के 'घर' में प्रियंका कांग्रेस को तीन−चार सीट भी दिलाने में सफल रहीं तो यह बड़ी कामयाबी होगी। अगर वो चुनाव लड़ने का फैसला लेती हैं तो उनके मैदान में उतरते ही मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा। इसका असर कई सीटों पर पड़ेगा। चुनावी खेल का स्तर बढ़ जाएगा। 
 
प्रियंका के चुनाव लड़ने की चर्चा बनारस और इलाहाबाद की हो रही है। प्रियंका बनारस से चुनाव मैदान में उतरीं तो नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती होगी। पूरे देश की नजर इस सीट पर रहेगी। यह भी मुमकिन है कि उस परिस्थिति में सभी दल प्रियंका के समर्थन में आ जाएं और नरेंद्र मोदी को उनके ही गढ़ में घेर लिया जाए। सपा ने अभी तक यहां से अपना प्रत्याशी भी घोषित नहीं किया है। बताते चलें वाराणसी में अनहोनी होती रही है। कभी कांग्रेस का गढ रहा वाराणसी कई बार सियासी उलटफेर का गवाह बना है। यहां पर 1967 के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पहली और आखरी बार यहां जीती थी, जबकि 1977 में युवा तुर्क कहे जाने वाले चंद्रशेखर ने यहां कांग्रेस को धूल चटाई थी। वाराणसी की सीट उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके कमलापति त्रिपाठी और मुरली मनोहर जैसे दिग्गज नेताओं को ससंद पहुंचा चुकी है।


वाराणसी लोकसभा सीट से 7 बार कांग्रेस को जीत मिली है, 6 बार बीजेपी के उम्मीदवार जीत दर्ज करने में कामयाब रहे हैं। सीपीआई (एम) को एक बार, बीएलडी को एक बार और जनता दल को इस सीट पर एक बार सफलता मिली है। 1991 से इस सीट पर बीजेपी का बोलबाला है। वाराणसी में बीजेपी के जीतने का वोट गणित कुछ इस प्रकार है। यहां ढाई लाख ब्राह्मण, तीन लाख मुस्लिम, सवा तीन लाख वैश्य, दो लाख पटेल, करीब दो लाख कायस्थ, सवा लाख भूमिहार, डेढ़ लाख दलित और 80 हजार यादव मतदाता हैं। उच्च जाति और पिछड़ी जाति में बीजेपी की मजबूत पकड़ जीत की गारंटी है। पिछले चुनाव में इसी गणित ने अरविंद केजरीवाल के समिकरणों को धाराशायी कर दिया था।


 
वाराणसी में सातवें चरण में 19 मई को होगी वोटिंग। 2014 में यहां से नरेंद्र मोदी बीजेपी के उम्मीदवार थे और उन्हें कुल 5,81,122 वोट मिले थे। वहीं आम आदमी की तरफ से उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल को कुल 2,09,238 वोट मिले थे। 
 
खैर, प्रियंका यहां से चुनाव लड़ती हैं तो यह रोमांचक होगा, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या होगा। हो सकता है जीत की गारंटी नहीं होने के कारण कांग्रेस आलाकमान इतना बड़ा दांव नहीं लगाए। ऐसे में एक बार फिर बाजी भाजपा के हाथ लग जायेगी। मोदी की राह आसान हो जाएगी तो बीजेपी को यह कहने का मौका भी मिल जाएगा कि मोदी को गाली देने वाले तमाम नेता उसने चुनावी जंग में दो−दो हाथ करने का साहस नहीं जुटा पाए। इससे काफी गलत मैसेज जाएगा। न केवल राहुल गांधी बल्कि समाजवादी पार्टी पर भी उंगलिया उठेंगी। क्योंकि गठबंधन के तहत वाराणसी की सीट समाजवादी पार्टी के खाते में आई है। लब्बोलुआब यह है कि प्रियंका के एक बयान ने बीजेपी वालों के दोनों हाथों में लड्डू थमा दिया है। अगर वह लड़ती हैं तो जीत मुश्किल है और नहीं लड़ती हैं तो बीजेपी तानें देगी कि हार के डर से प्रियंका चुनाव लड़ने से डर गईं।
 
- अजय कुमार
 

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