राहुल गांधी की बड़ी जीत के कारणों की समीक्षा... सीधे वायनाड से

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Jun 18 2019 12:19PM
राहुल गांधी की बड़ी जीत के कारणों की समीक्षा... सीधे वायनाड से
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वायनाड लोकसभा सीट का कुछ हिस्सा तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा को भी छूता है साथ ही केरल में अगले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस खुद को मजबूत करना चाहती है इसलिए भी केरल से राहुल गांधी को चुनाव लड़ाया गया।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार चौथी बार लोकसभा पहुँचे हैं लेकिन इस बार वह अपने परम्परागत संसदीय क्षेत्र अमेठी नहीं बल्कि केरल के वायनाड संसदीय क्षेत्र से चार लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीत कर 17वीं लोकसभा पहुंचे। राहुल गांधी जब संसद के लिए निर्वाचित होने के बाद जनता का धन्यवाद करने अपने नये संसदीय क्षेत्र वायनाड आये तो सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव के लिए उनका प्रचार अभियान ‘झूठ, जहर और घृणा’ से भरा हुआ था जबकि कांग्रेस सच्चाई, प्यार और लगाव के साथ खड़ी थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि वायनाड से कांग्रेस की जीत निश्चित थी इसीलिए राहुल गांधी ने यहां से पर्चा भरा। वायनाड लोकसभा सीट का कुछ हिस्सा तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा को भी छूता है साथ ही केरल में अगले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस खुद को मजबूत करना चाहती है इसलिए भी केरल से राहुल गांधी को चुनाव लड़ाया गया। देखा जाये तो कांग्रेस का यह दांव बिलकुल सही बैठा भी। केरल में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गठबंधन बनाकर 17 सीटें जीतीं और लेफ्ट गठबंधन को मात्र 3 पर समेट दिया। यही नहीं तमिलनाडु में जहां कांग्रेस का द्रमुक के साथ गठबंधन था, वहां भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा। हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस की उम्मीदों पर जरूर पानी फिर गया।


वायनाड के समीकरण
 
आइए सबसे पहले समझते हैं कि वायनाड की आबादी का असल आंकड़ा क्या है क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान यह बात खूब कही गयी कि राहुल गांधी ने मुस्लिम बहुल सीट का चयन इसलिए किया है ताकि वह चुनाव जीत सकें। अगर आप चुनाव आयोग के आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि निर्वाचन आयोग के पास पंजीकृत वोटरों के नाम और संख्या होती है उनके धर्म का हिसाब नहीं रखा जाता। फिर भी यदि आप इस लोकसभा क्षेत्र में लोगों से बात करेंगे और यहां घूमेंगे, जनगणना के आंकड़ों को देखेंगे तो एक बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि इस लोकसभा क्षेत्र में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर, जी हाँ लगभग बराबर है और ईसाई समुदाय की आबादी 15 प्रतिशत के करीब है। जो लोग वायनाड के मुस्लिम बहुल होने की बात कहते हैं दरअसल वह पूरे जिले के आंकड़े दे रहे हैं ना कि लोकसभा क्षेत्र के। यह बात अलग है कि राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से पूरे वायनाड जिले के मुस्लिम खुश हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि जो पार्टी उनसे दूर होती चली जा रही थी वह फिर उनके करीब आई है। कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलने से मुस्लिमों को लग रहा था कि कांग्रेस ने दूसरी राह पकड़ ली है लेकिन राहुल गांधी जब वायनाड चुनाव लड़ने आये तो उन्हें ऐसा जबरदस्त जनसमर्थन दिया गया कि वह यहीं के होकर रह जाएं।
लोकसभा क्षेत्र पर एक नजर
 
वायनाड एक खूबसूरत हिल स्टेशन भी है और केरल के 20 संसदीय क्षेत्रों में से एक वायनाड की 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ग्रामीण मानी जाती है। जिले के तौर पर देखें तो यह सबसे अधिक जनजातीय आबादी वाला जिला है। इस लोकसभा क्षेत्र में 80 से ज्यादा गांव और मात्र 4 कस्बे हैं। पिछले चुनाव परिणामों की बात करें तो वायनाड में 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार एम.आई. शनावास ने जीत हासिल की थी। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार को हराया था। नवंबर 2018 में जब शनावास की मृत्यु हो गयी तो यह सीट खाली हो गयी थी। केरल कांग्रेस ने एकमत से राहुल गांधी से आग्रह किया था कि वह इस सीट से चुनाव लड़ें। हालांकि कांग्रेस की और भी प्रदेश इकाइयां अपने अपने राज्यों की किसी सीट से राहुल गांधी से चुनाव लड़ने का आग्रह कर रही थीं लेकिन राहुल गांधी ने वायनाड का चयन किया।


 
भाजपा क्यों पिछड़ गयी ?
 
जहां तक भाजपा के यहां से चुनाव हारने की बात है तो यह देखना जरूरी हो जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में वायनाड में 80 हजार से ज्यादा वोट पाने वाली भाजपा क्यों इस बार 78590 वोट पाकर छठे स्थान पर खिसक गयी जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा पूरे पांच साल से मेहनत कर रही थी। दरअसल इस सीट के सामाजिक और जातिगत समीकरणों को देखते हुए भाजपा को शुरू से ही अंदेशा लग रहा था कि यहां से जीत पाना मुश्किल है और जब राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने का ऐलान हो गया और चूँकि यह सीट कांग्रेस की ही है ऐसे में भाजपा ने खुद का उम्मीदवार नहीं उतार कर अपने सहयोगी दल भारत धर्म जन सेना के अध्यक्ष तुषार वेलापल्ली को मैदान में उतार दिया। तुषार की उम्मीदवारी होते ही ऐसा लगा कि यहां साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो जायेगा लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि एक पार्टी के तौर पर भारत धर्म जन सेना काफी कमजोर है और तुषार वेलापल्ली दुबई में कारोबार करने वाले एक बिजनेसमैन हैं जिनका स्थानीय जनता से कोई सीधा संवाद नहीं है।
क्या है भारत धर्म जन सेना
 
भारत धर्म जन सेना का गठन दिसंबर 2015 में हुआ था और केरल विधानसभा चुनावों में भी इस पार्टी का कुछ खास प्रदर्शन नहीं रहा था। यह पार्टी केरल के पिछड़े सुदाय इझावा के लिए काम करने वाले सामाजिक संगठन से जुड़ी हुई है। केरल में इझावा समुदाय हालांकि राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन भी इझावा समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं।
 
-नीरज कुमार दुबे
 

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