चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों पर मोदी सरकार के तर्कपूर्ण जवाब

Supreme Court
ANI

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस तर्क का जोरदार प्रतिवाद किया। उन्होंने अदालत से कहा कि बहस की शुरुआत इस धारणा से नहीं हो सकती कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत आचरण करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर ऐसी बहस छिड़ी, मानो लोकतंत्र की सबसे अहम संस्थाओं में से एक का भविष्य न्यायालय के कटघरे में खड़ा हो। एक ओर संविधान की आत्मा और निष्पक्ष चुनाव की कसौटी पर सवाल उठाते न्यायाधीश थे तो दूसरी ओर संसद की सर्वोच्चता और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का पक्ष मजबूती से रखती केंद्र सरकार। सवालों और जवाबों का यह सिलसिला कई बार अदालत की बहस से आगे बढ़कर लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणाओं पर गहन विमर्श में बदल गया।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान सबसे पहले यही सवाल उछाला कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) का पद लोकतंत्र के लिए इतना महत्वपूर्ण है, तो फिर उनके चयन की प्रक्रिया ऐसी क्यों न हो, जिस पर किसी भी प्रकार का संदेह न रहे? अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होकर काम करे, इतना पर्याप्त नहीं है; उसे स्वतंत्र दिखाई भी देना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: क्या CJP प्रदर्शन के उपद्रवियों की FIR सरकार वापस ले सकती है? कानून का चौंकाने वाला जवाब!

इसी संदर्भ में अदालत ने सरकार से सीधा प्रश्न किया कि संसद ने 2023 का कानून बनाते समय चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखने का निर्णय आखिर किस आधार पर लिया? पीठ ने याद दिलाया कि सीबीआई निदेशक और लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण पदों के चयन में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका स्वीकार की गई है, फिर चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के मामले में यह व्यवस्था क्यों बदली गई?

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस तर्क का जोरदार प्रतिवाद किया। उन्होंने अदालत से कहा कि बहस की शुरुआत इस धारणा से नहीं हो सकती कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत आचरण करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के पद की अपनी गरिमा और पवित्रता है तथा जनता को उनके निर्णयों पर विश्वास होना चाहिए। तुषार मेहता ने सवालिया अंदाज में कहा, "यदि प्रधानमंत्री के फैसलों पर भरोसा ही नहीं किया जाएगा, तो क्या फिर मंत्रिमंडल के गठन के समय भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेना अनिवार्य कर दिया जाए?"

उन्होंने यह भी दलील दी कि केवल इसलिए कि कार्यपालिका के पास संख्यात्मक बहुमत है, यह मान लेना उचित नहीं कि वह संविधान विरोधी या दुर्भावनापूर्ण निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि राज्य के तीनों अंग यानि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र हैं और एक संस्था दूसरी की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

लेकिन अदालत ने तुरंत स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य प्रधानमंत्री पर अविश्वास जताना नहीं है। पीठ ने कहा कि प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जो जनता के विश्वास की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। न्यायाधीशों ने कहा, "हम यह नहीं कह रहे कि वर्तमान समिति ने निष्पक्षता नहीं बरती है। लेकिन जैसे न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए, उसी प्रकार चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भी निष्पक्षता दिखाई देनी चाहिए।"

इसी दौरान अदालत ने सरकार से एक और तीखा सवाल पूछा। पीठ ने याद दिलाया कि पहले भी अदालत ने निर्वाचित सरकार पर भरोसा जताते हुए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री न बनाने की अपेक्षा की थी। ऐसे में आज सरकार में कितने मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं? इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने संकेत दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास से भी तय होती है।

हम आपको बता दें कि यह पूरा विवाद 2023 के उस कानून को लेकर है, जिसके तहत राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री वाली चयन समिति की सिफारिश पर करते हैं। इससे पहले मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के रूप में निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बना देती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। बाद में संसद ने कानून बनाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी अदालत से कहा कि संसद की विधायी बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं होगा। उनका कहना था कि केवल इसलिए कि कोई दूसरा मॉडल बेहतर हो सकता है, संसद द्वारा चुनी गई व्यवस्था को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "संसद को इस प्रकार बाधित नहीं किया जा सकता।"

सरकार ने अपने हलफनामे में भी यही रुख दोहराया। केंद्र ने कहा कि यह आशंका पूरी तरह काल्पनिक है कि चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका की प्रमुख भूमिका होने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता स्वतः प्रभावित हो जाएगी। सरकार ने याद दिलाया कि सात दशक से अधिक समय तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह कार्यपालिका द्वारा होती रही, लेकिन इस दौरान देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कभी बाधित नहीं हुए। इसलिए केवल आशंकाओं के आधार पर कानून को दोषपूर्ण नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान केंद्र ने यह आग्रह भी किया कि मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न जुड़े हैं, इसलिए इसे बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाए। हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता डी. शेषाद्रि नायडू, गोपाल शंकरनारायणन, प्रशांत भूषण और संजय पारिख ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि लगभग 20 दिन तक विस्तृत सुनवाई चलने के बाद अब इस आधार पर मामला बड़ी पीठ को भेजने की मांग करना केवल सुनवाई को टालने का प्रयास है।

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की गई है। अब निगाहें अदालत के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह निर्णय केवल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, संसद की विधायी शक्ति और जनता के भरोसे के बीच संतुलन की नई संवैधानिक रेखा भी खींच सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
All the updates here:

अन्य न्यूज़