देश के असली दुश्मन बाहर नहीं अंदर मौजूद हैं

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इन समस्याओं से निपटने के लिए न सिर्फ दृढ़ निष्चय बल्कि संसाधनों के साथ ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत है। भ्रष्टाचार इन समस्याओं का असली दुश्मन है। इससे निपटने में देश की सभी सरकारें और राजनीतिक दल विफल रहे हैं। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल केवल प्रतीकात्मक बदलाव का दावा करते हैं।

भारत सैटेलाइट प्रक्षेपास्त विकसित करके विश्व के चुनिंदा देशों में शुमार हो गया। स्पेस वार की दृष्टि से इस प्रणाली को महत्वपूर्ण उपलब्धि करार दिया गया है। इससे पहले यह उपलब्धि केवल रूस, अमरीका और चीन के पास ही मौजूद थी। इसके बाद भारत भी इस इलिट क्लब में शामिल हो गया। इससे पहले भारत कई तरह की मिसाइलें विकसित करके सुरक्षा की दृष्टि से चाक−चौबंद इंतजाम कर चुका है। देश को बचाने के लिए सुरक्षा के इन इंतजामों में सबसे महत्वपूर्ण है, परमाणु हथियार विकसित करने की योग्यता हासिल करना है, जिसे भारत दशकों पहले ही कर चुका है। यह सारी कवायद देश के लोगों की सुरक्षा के नाम पर की गई है। सवाल यह है कि देश के लोगों को असली खतरा है किससे, जिससे लोगों को बचाने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है। युद्ध सिर्फ संभावना पर ही आधारित है। जबकि लाखों लोग शांतिकाल में विभिन्न कारणों से जान गंवा रहे हैं। सैटेलाइट प्रक्षेप्रास्त विकसित करने से भारत बेशक इलिट क्लब में शामिल हो गया। विकास की अन्य श्रेणियों की देश की हालत भयावह है। कुछ मामलों में तो भारत की हालत अल्पविकसित देशों से भी खराब है। 

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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण जनित बीमारियों के कारण भारत में करीब 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण जनित रोगों से हो जाती है। ये मौतों धू्रमपान से होने वाली मौतो से अधिक हैं। देश की करीब 77 प्रतिषत आबादी वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में वायु प्रदूषण के कारण 1 लाख 10 हजार प्रीमैच्योर बच्चों की मृत्यु हो गई। संयुक्त राष्ट्र की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधा संबंधी कारणों से वर्ष 2017 में पांच वर्ष से कम आयु के 8 लाख 2 हजार शिशु मौत के आगोश में समा गए।

इसी तरह 5 से 14 वर्ष तक की आयु के 1 लाख 52 हजार बच्चों की अकाल मृत्यु हो गई। दा इंस्टीट्यूट ऑफ हैल्थ मैटि्रक ए.ड एव्यूलेषन यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन की एक रिपोर्ट में देश में बीमारियों से होने वाली कुल मौतों में से 61 प्रतिषत मौतें गैर संक्रामक रोगों से होना माना गया। इसमें हार्ट, कैंसर, मधुमेह जैसी बीमारियों से वर्ष 2016 में कुल 58 लाख 17 हजार लोगों की मृत्यु हुई। इनमें भी सर्वाधिक मौतों फेफड़ों जनित रोगों से होती हैं, जिसका बड़ा कारण वायु प्रदूषण माना गया है। विश्व स्वास्थ्य सगंठन की 2018 ग्लोबल टी बी रिपोर्ट में कहा गया है कि विष्व में सर्वाधिक टीबी के रोगी भारत में हैं। इनकी संख्या करीब 26 प्रतिशत है। इसी तरह मल्टी ड्रग रेस्टिेंट टीबी के भी सर्वाधिक मरीजों में भारत विष्व में तालिका में शीर्ष पर है। इसी तरह आत्महत्या के मामलों भी भारत में सर्वाधिक हैं। वर्ष 2016 में 2 लाख 30 हजार 214 लोगों ने जिंदगी से हार मान ली। यह संख्या विश्व में होने वाली कुल आत्महत्या का 17 प्रतिशत है। भारत की आबादी भी विश्व में 17 प्रतिशत है। 

इतना ही नहीं भारत विश्व मे सर्वाधिक सड़क दुर्घटनाओं के लिए भी बदनाम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रोड सेफ्टी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में करीब डेढ़ लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है। यह आंकड़ा विश्व में होने वाली कुल मौतों का 12 प्रतिशत है। रोड सेफ्टी सारिणी में विश्व में भारत की रैंक 67 वी है। भारत में स्वास्थ्य की बेहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व के 169 देशों की स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट में भारत का स्थान 120 वां है। पड़ौसी देश श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल स्वास्थ्य के मामले में भारत से बेहतर है। चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इससे खराब हालत ओर क्या हो सकती है।

स्वास्थ्य और रोगों से होने वाली मौतों के मामले में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भारत की तस्वीर उजली नहीं है। विश्व बैंक द्वारा जारी वर्ष 2018 की लॉजिस्टिक पर्फोमेंस इंडेक्स रैंकिंग में भारत का 44 स्थान रहा। यह रिपोर्ट बुनियादी आधारभूत ढांचे, व्यापार, कस्टम, बंदरगाहों, सड़क और रेल की सुविधाओं की हालत पर तैयार की जाती है। यदि शिक्षा के क्षेत्र मे भारत की तुलना विश्व के अन्य देशों से करें तो इसमें भी हालत नौ दिन चले अढाई कोस जैसी नजर आती है। भारत में साक्षरता प्रतिशत 69 है, विश्व में इस मामले में भारत का 159 वां स्थान है। 

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इन तमाम रिपोर्टों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की वास्तविक जरूरत क्या है। भारत के सामने प्रत्यक्ष चुनौतियां और खतरे कौनसे हैं। किन क्षेत्रों में सर्वाधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत है। सुरक्षा का आधार केवल भौगोलिक सीमाओं से तय नहीं किया जा सकता। यदि देश की अन्दरूनी हालत बेहद खराब हैं तो यह बाह्य सुरक्षा व्यवस्था भी मजबूती देने में कारगर साबित नहीं हो सकती। इस सुरक्षा से बाहर के दुश्मनों से निपटा जा सकता है। लेकिन देश अन्दरूनी दुश्मनों से निपटना इतना आसान नहीं है। 

दरअसल यह दिखाने के लिए कि भारत की तरफ कोई अब आंख उठाकर भी नहीं देख सकता, शतुरमुर्ग के उस खतरे की तरह है जोकि सामने खड़ी मौत को देखकर रेत में सिर छिपा लेता है कि इससे खतरा टल जाएगा। हकीकत यह है कि देश को खोखला करने वाली स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे संबंधी समस्याओं से निपटना उतना आसान नहीं है, जितना सुरक्षा के नाम पर तरह−तरह के हथियार विकसित करके सुरक्षा का आभास कराना। इन समस्याओं से निपटने के लिए न सिर्फ दृढ़ निष्चय बल्कि संसाधनों के साथ ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत है। भ्रष्टाचार इन समस्याओं का असली दुश्मन है। इससे निपटने में देश की सभी सरकारें और राजनीतिक दल विफल रहे हैं। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल केवल प्रतीकात्मक बदलाव का दावा करते हैं। केवल अज्ञात भय से सुरक्षा के लिए संसाधनों को झौंकना सिर्फ बर्बादी ही मानी जाएगी, जबकि वास्तविक खतरे मुंह बाएं खड़े हों। इनसे निपटने के लिए राजनीतिक दलों और सरकारों को दृढ़ निष्चय दिखाना होगा, अन्यथा देश के लोगों को बरगला कर सत्ता प्राप्त करने का खेल यूं ही चलता रहेगा।

- योगेंद्र योगी

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