ट्रंप के दौरे के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा भारत विद्रोही तत्त्वों की साजिश

ट्रंप के दौरे के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा भारत विद्रोही तत्त्वों की साजिश

मोदी की जिन शब्दों में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रशंसा की है और मोदी द्वारा ट्रंप परिवार के सदस्यों के स्वागत में जो अतिशय विनम्र और गर्मजोशी भरे आत्मीय शब्द इस्तेमाल किए गए वे आज तक किसी भी विदेशी मेहमान ने न तो हमारे लिए प्रयोग किए थे और न हमारे नेता ने उस मेहमान के लिए।

जहां तक स्मृति पीछे जाती है किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष ने अपनी भारत यात्रा के समय भारत और मेजबान प्रधानमंत्री की प्रशंसा में इस सीमा तक भाव भरे और प्रशंसा की सीमा पार करते हुए शब्दों का सेहरा नहीं बांधा था, जैसा राष्ट्रपति ट्रंप ने अहमदाबाद में अपने लम्बे भाषण में किया। किसी भी पैमाने और दृष्टि से यह एक असाधारण और अभूतपूर्व भाषण था जिसके कारण ट्रंप की यह यात्रा हमेशा अविस्मरणीय रहेगी। लेनदेन और क्या मिला क्या नहीं मिला, कितना व्यापार तथा सैन्य क्षेत्र में विनिमय हुआ, इसका खाता-बही जिन पंडि़तों को संभालना है, वे संभालते रहें और जिन मरघट के मरसिया गायकों को इस यात्रा में भी न्यूनताएं और पाकिस्तानी कोण देखना है वे अपने मरसिये के चौबारे पर जी भर रूदन करते रहें। अगले दो दिनों में ट्रंप क्या कहेंगे और लिखेंगे, वह सब आज अहमदाबाद में तय हो गया और इसके साथ ही भारत-अमेरिकी संबंधों का अगला उछाल भी पता चल गया।

कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध खाते-बही से चढ़कर आपसी विश्वास और मित्रता के रसायन शास्त्र पर निभाते हैं। चीन और जापान में यह रासायनिक समीकरण नहीं है लेकिन व्यापार ज्यादा है, अमेरिका और चीन के बीच भी ऐसा ही है संबंध ठीक नहीं है लेकिन व्यापार है। लेकिन अमेरिका और भारत के बीच व्यापार और मित्रता का रासायनिक समीकरण दोनों हैं। इसका लाभ खाते-बही से बढ़कर भारत को अपनी ताकत और ऊर्जा के बल पर विश्व में अपनी धाक और प्रभविष्णुता स्थापित करने में मिलेगा। यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी दूसरा देश किसी अन्य देश को अपने से आगे बढ़ने में कभी मदद नहीं कर सकता, न ही करना चाहेगा। अगर कोई देश आगे बढ़ता है तो अपनी भुजाओं, अपने कंधों और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर। खैरात मांगने वाले देश की सुरक्षा के लिए भी खैरात मांगते रह जाते हैं लेकिन न अपनी प्रतिष्ठा बचा पाते हैं और न अपनी सीमा।

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राष्ट्रपति ट्रंप का भारत आना और इस्लामी आतंकवाद पर चोट से लेकर स्वामी विवेकानंद और भारतीय स्वाभिमान और विजयशाली खेल परम्परा के प्रतीकों सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली का जिक्र करना भारत का मनोबल विश्वव्यापी स्तर पर बढ़ाने वाला ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिन शब्दों में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रशंसा की है और जिस व्यक्तिगत स्तर पर जाकर की है वह और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ट्रंप परिवार के सदस्यों के स्वागत में अतिशय विनम्र और गर्मजोशी भरे आत्मीय शब्द इस्तेमाल किए गए वे आज तक किसी भी विदेशी मेहमान ने न तो हमारे लिए प्रयोग किए थे और न हमारे नेता ने उस मेहमान के लिए। बात यहां तक सीमित नहीं है।

विश्व का नक्श उठाकर देख लीजिए। भारत को आज जिन दो देशों से सबसे ज्यादा चुनौती है वह पाकिस्तान और चीन हैं। भारत की प्रगति के लिए जिस सर्वाधिक प्रभावशाली लोकतांत्रिक सामरिक गठबंधन से अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कुछ सहायता मिल सकती है उसमें अमेरिका की नेतृत्वशाली भूमिका है तथा अन्य देशों में जापान, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और इज़रायल शामिल हैं। इन सब देशों के साथ भारत की सैन्य सामग्री, नागरिक आणविक सहायता, ढांचागत सुविधाओं तथा भारत में निर्मित सामग्री के बाजार हेतु गहरे संबंध हैं। इसके अलावा विज्ञान, टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर, आईटी के क्षेत्र में इन देशों के साथ भारत के गहरे तालमेल हैं और ये देश भारत का रेल, सड़क तथा ऊर्जा क्षेत्र का नक्श क्रांतिकारी ढंग से बदलने हेतु अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। रेलगाड़ियों, मोटर वाहनों, आणविक केंद्र, ऊर्जा और तेल शोधन, विज्ञान तथा अन्य क्षेत्रीय उच्च शिक्षा में यही पांच देश भारत में सबसे ज्यादा निवेश कर रहे हैं। इन देशों के साथ भारत का सहयोगात्मक समीकरण हमारी संतुलित विदेश नीति का एक बहुत बड़ा विजय चिन्ह है क्योंकि जहां हम घोर ईरान विरोधी अमेरिका और इज़रायल से अपने सर्वश्रेष्ठ संबंध बनाए हुए हैं वहीं ईरान से भी तेल खरीदने तथा अन्य व्यापारिक संबंध कायम रखने की हमने स्वदेशी, स्वाभिमानी, स्वतंत्र नीति अपनाने का साहस दिखाया है। चीन अवश्य इन सब देशों के साथ हमारी नजदीकियों को देखकर परेशान होता है। लेकिन भारत ने पहली बार भारत प्रथम को दृढ़ता से अपनाकर चीन से अपने संबंधों को इन सब देशों के साथ अपने समीकरणों से पृथक स्वतंत्र ग्रह में स्थापित कर दिया है जहां चीन के संकट काल में हम उसकी सहायता भी करते हैं, उसके साथ व्यापार भी बढ़ाते हैं लेकिन अपनी सामरिक नीति को उस स्तर तक ले जाते हैं कि चीन और पाकिस्तान से होने वाले खतरों को हम अपनी ताकत की अभेद्य ढाल पर रोक सकें।

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राष्ट्रपति ट्रंप की यह यात्रा उस ढाल को मजबूती देती है और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भारत के समर्थक देशों की संख्या का एक अत्यंत प्रभावशाली परिदृश्य उपस्थित करती है जो हमारे कामकाज को, हमारी नीतियों को ताकत देने वाला है।

इसमें कोई शक नहीं कि यह समय चुनौतीपूर्ण है- आर्थिक दृष्टि से भी और आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से भी। जिस दिन ट्रंप भारत आए उसी दिन दिल्ली में जिस प्रकार का हिंसक उपद्रव प्रारंभ किया गया वह इस बात को बताता है कि पाकिस्तानी तत्व अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा को शाहीन बाग के उस आयाम के साथ टैग करके मीडिया में प्रस्तुत करना चाहते थे कि मोदी के भारत में सब कुछ ठीक नहीं है। यह घटना हमारे इंटेलीजेंस तथा सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी एक धक्का और चुनौती बनकर आई है जिसमें स्पष्ट हुआ है कि भारत विद्रोही तत्व यह चाहते थे कि मीडिया में जिस दिन ट्रंप की भारत यात्रा का पहला समाचार छपे उसी दिन भारत की राजधानी दिल्ली में हिंसक उपद्रवों, हेड कांस्टेबल की मौत, पेट्रोल पंप में आग का भी समाचार छपे ताकि लगे भारत भीतर ही भीतर युद्धरत है। निश्चित रूप से मोदी और अमित शाह इसे हल्के ढंग से नहीं लेंगे पर यह परिदृश्य ट्रंप की भारत यात्रा के देशभक्तों और हमारी विकास यात्रा पर सकारात्मक प्रभाव को और ज्यादा आग्रहपूर्वक सिद्ध कर देता है।

-तरूण विजय