दशकों बाद देश को मजबूत प्रधानमंत्री और दमदार कैबिनेट मिली है

By ललित गर्ग | Publish Date: Jun 3 2019 10:54AM
दशकों बाद देश को मजबूत प्रधानमंत्री और दमदार कैबिनेट मिली है
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नरेन्द्र मोदी अनूठा एवं विलक्षण करने के साथ-साथ साहसिक कदम उठाने में माहिर हैं। वे नये प्रयोग करते हुए झिझकते नहीं हैं। यही कारण है कि उन्होंने एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बननाकर राजनीति में एक नया प्रयोग किया है। पूर्व राजनयिक होने से ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

नरेन्द्र मोदी ने अपनी क्षमता एवं विचारधारा के अनुरूप ही मंत्रिपरिषद का गठन करते हुए इस बात का ध्यान रखा है कि क्षमता के साथ-साथ चरित्रवान चेहरे आगे आयें। उन्होंने यह संदेश भी दिया है कि भाजपा नए और काबिल लोगों को मौके देने वाली पार्टी है। मंत्रियों के चयन और विभागों के बंटवारे से यह साफ है कि प्रधानमंत्री ने एक ओर जहां नेताओं की क्षमता को महत्व दिया है वहीं निरतंरता एवं नये भारत को निर्मित करने के संकल्प का भी ध्यान रखा है। दशकों बाद देश को प्रधानमंत्री के रूप में एक ऐसा नेता मिला है, जिसके हाथ बहुत मजबूत हैं, जो गठबंधन की मजबूरी के पार भी देख सकता है। पिछले तीन दशकों में सरकार के गठन और विभाग वितरण में जो तनाव हुआ करता था, वह इस बार नहीं के बराबर है। यही कारण है कि मंत्रालयों के अनुरूप चेहरों को चुना गया है जिनसे उम्मीदें बंधी हैं कि वे अपनी जिम्मेदारी के जीवन का एक-एक क्षण जीएंगे- अपने लिए, दूसरों के लिए। यह संकल्प सदुपयोग का संकल्प होगा, दुरुपयोग का नहीं। बस यहीं से शुरू होता है नीर-क्षीर का दृष्टिकोण। यहीं से उठता है अंधेरे से उजाले की ओर पहला कदम।


नई मोदी सरकार और उसका सशक्त मंत्रिपरिषद एक नई भोर की तरह है। वह स्वतन्त्र भारत की राजनीति में एक नये अध्याय की शुभ एवं श्रेयस्कर शुरूआत के रूप में दिखाई दे रहा है, जिस पर भाजपा की स्वतन्त्र सोच की छाप दृष्टिगोचर हो रही है। भाजपा ने जिस चरणबद्ध तरीके से भारतीय राजनीति को पूर्णरुपेण अपनी विचारधारा में ढाला है, वर्तमान मन्त्रिमंडल उसी का प्रतीक कहा जायेगा। अतः राजनैतिक स्तर पर इसे ‘नये भारत’ की संरचनात्मक पुनर्रचना के तौर पर भी देखा जा सकता है।
 
नरेन्द्र मोदी अनूठा एवं विलक्षण करने के साथ-साथ साहसिक कदम उठाने में माहिर हैं। वे नये प्रयोग करते हुए झिझकते नहीं हैं। यही कारण है कि उन्होंने एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बननाकर राजनीति में एक नया प्रयोग किया है। पूर्व राजनयिक होने से ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। निश्चित ही उनका चयन उभरते भारत का एक सूचक है। वे चीन और अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञ होने के साथ ही देश के पहले पेशेवर राजनयिक विदेश मंत्री हैं। मंत्री के रूप में जयशंकर की सफलता भविष्य में अन्य पेशेवर भारतीयों के लिए मंत्रिमंडल के दरवाजे खोलेगी। यह ऐसा प्रयोग है जिससे राजनीति में प्रतिभाशाली एवं क्षमतावान लोगों को आगे आने के अवसर मिलेंगे।
 
गृहमंत्री के रूप में देश की सुरक्षा एवं राष्ट्रीयता को मजबूती प्रदान करने वाले राजनाथ सिंह अब रक्षा मंत्रालय संभालेंगे। अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष के तौर पर जिस तरह का सफल संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया, जो ऐतिहासिक एवं सुनामी जीत दिलवाई है, वह एक मिसाल है। अब उनसे यही उम्मीद की जाती है कि गृहमंत्री के रूप में भी वह विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए राष्ट्र की सुरक्षा एवं संप्रभुता की दृष्टि से मिसाल कायम करेंगे। निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री बनने वाली पहली महिला थीं। अब वह वित्त मंत्रालय संभालने वाली पहली महिला भी बन गई हैं। चूंकि वह आर्थिक मामलों की अच्छी जानकार हैं इसलिए वित्त मंत्री के रूप में उनका चयन भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूती देगा। इसी तरह बेहतर काम कर दिखाने वाले नितिन गडकरी के पास परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तो है ही, उन्हें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई है। निश्चित ही वे इन उद्योगों की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम होंगे। चूंकि उनके कुशल प्रशासक होने में किसी को संदेह नहीं, इसलिए एक बार फिर उनसे बेहतर नतीजे देने की उम्मीद की जाती है।


ऐसी ही उम्मीद अन्य मंत्रियों से भी की जाती है क्योंकि मोदी सरकार से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ी हुई हैं, अतः उन अपेक्षाओं को पूरा करने का दायित्व सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद का है। अनुभवी नेताओं को महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए जाने और नए चेहरों को मंत्री बनाए जाने से मंत्रिपरिषद को जरूरी ऊर्जा और गति मिलनी चाहिए। मंत्रिपरिषद को सुषमा स्वराज की तरह ही अरुण जेटली की भी कमी महसूस होगी, जिन्होंने सेहत के चलते सरकार से दूर रहने का फैसला लिया, फिर भी नयी शासन व्यवस्था में उनकी स्वास्थ्य विषयक अनुकूलताओं को देखते हुए सम्मानजनक सेवाएं लेने की कोई व्यवस्था बने, तो यह भी मोदी सरकार का एक नया प्रयोग होगा।


 
अपने जन्म से लेकर आज तक भाजपा का मुख्य उद्देश्य प्रखर राष्ट्रवाद एवं भारतीयता ही रहा है। उसने अपनी प्रगति यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव देखे, वह इस प्रकार चली है कि राजनीति के उदार और कट्टरपंथी तत्वों के बीच अपना अलग रास्ता बना सके। स्वयं का भी विकास और समाज का भी विकास, यही समष्टिवाद है और यही भाजपा दर्शन है। निजीवाद कभी धर्म और दर्शन नहीं रहा। जीवन वही सार्थक है, जो समष्टिवाद से प्रेरित है। केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह भाजपा का दायित्व भी है और ऋण भी, जो उसे अपने समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना है। परशुराम ने यही बात भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र देते हुए कही थी कि वासुदेव कृष्ण, तुम बहुत माखन खा चुके, बहुत लीलाएं कर चुके, बहुत बांसुरी बजा चुके, अब वह करो जिसके लिए तुम धरती पर आये हो। परशुराम के ये शब्द जीवन की अपेक्षा को न केवल उद्घाटित करते हैं, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को परत-दर-परत खोलकर रख देते हैं। हम चिन्तन के हर मोड़ पर कई भ्रम पाल लेते हैं। कभी नजदीक तथा कभी दूर के बीच सच को खोजते रहते हैं। इस असमंजस में सदैव सबसे अधिक जो प्रभावित होती है, वह है हमारी युग के साथ आगे बढ़ने की गति। राजनीति में यह स्वीकृत तथ्य है कि पैर का कांटा निकालने तक ठहरने से ही पिछड़ जाते हैं। प्रतिक्षण और प्रति अवसर का यह महत्व जिसने भी नजर अन्दाज किया, उसने उपलब्धि को दूर कर दिया। नियति एक बार एक ही क्षण देती है और दूसरा क्षण देने से पहले उसे वापिस ले लेती है। वर्तमान भविष्य से नहीं अतीत से बनता है। मोदी सरकार एवं उनका मंत्रिमंडल इस तथ्य की रोशनी में अपनी जिम्मेदारियों का पालन करेगा, तभी नये भारत का, सशक्त भारत का सपना आकार लेगा।
कदम-कदम पर यह एहसास होने लगा है कि यह भारत में नए दौर की नई सरकार है। लेकिन इस सरकार की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। हारा हुआ विपक्ष बौखलाहट दिखायेगा। सत्ताविहीन असंतुष्टों की तरह आदर्शविहीन असंतुष्टों की भी एक लम्बी पंक्ति है जो दिखाई नहीं देती पर खतरे उतने ही उत्पन्न करती रहेगी। ऐसे वर्ग चाहते हैं कि हम आलोचना करें पर काम नहीं करें और न करने दें। हम गलतियां निकालें पर दायित्व स्वीकार नहीं करें। ऐसे वर्ग वर्तमान सरकार के सम्मुख अवरोध खड़े करेगा, लेकिन ऐसे नकारात्मक लोगों के सम्मुख डट कर खड़े होने की एक नई संस्कृति जन्म ले रही है। प्रसिद्ध होने का अर्थ है निरन्तर उन्नतिशील बने रहना है। प्रसिद्धि श्वेत वस्त्र के समान है, जिस पर एक भी धब्बा छिप नहीं सकता। मुकाबला होता है उसका ”पोल्का डॉट'' वाले वस्त्रधारी से, जिस पर एक और ''डॉट'' लग जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछ ऐसे व्यक्ति सभी जगह होते हैं जिनसे हम असहमत हो सकते हैं, पर जिन्हें नजरअन्दाज करना मुश्किल होता है। चलते व्यक्ति के साथ कदम मिलाकर नहीं चलने की अपेक्षा उसे अडंगी लगाते हैं। सांप तो काल आने पर काटता है पर दुर्जन तो पग-पग पर काटता है। यह निश्चित है कि सार्वजनिक जीवन में सभी एक विचारधारा, एक शैली व एक स्वभाव के व्यक्ति नहीं होते। अतः आवश्यकता है दायित्व के प्रति ईमानदारी के साथ-साथ आपसी तालमेल व एक-दूसरे के प्रति गहरी समझ की। अगर मोदी नये मंत्रिपरिषद में आदर्श स्थापित करने के लिए उसकी जुझारू चेतना को विकसित कर सकें तो निश्चय ही आदर्शविहिन असंतुष्टों की पंक्ति को छोटा कर सकेंगे।
 
-ललित गर्ग
 

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