क्या बंगाल की राजनीतिक हत्याओं पर कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता कुछ बोलेगा ?

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Jun 10 2019 4:42PM
क्या बंगाल की राजनीतिक हत्याओं पर कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता कुछ बोलेगा ?
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भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या और ‘बिगड़ती’ कानून व्यवस्था के विरोध में सोमवार को ‘काला दिवस’ मनाया और उत्तरी 24 परगना जिले के बसीरहाट उप संभाग में 12 घंटे के बंद का आह्वान किया।

लोकतंत्र में सत्ता पाने या बरकरार रखने के लिए लोगों का समर्थन चाहिए लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ता बचाये रखने के लिए जो खूनी संघर्ष चल रहा है उसने भारतीय लोकतंत्र की छवि को दागदार किया है। आज पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा का कार्यकर्ता होना गुनाह है? यह सवाल इसलिए खड़ा हो रहा है क्योंकि जिस तरह से पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं की लगातार हत्याएं हो रही हैं वह राज्य के बेहाल होते हाल को दर्शाती हैं। लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को जो झटका लगा है शायद उसे पार्टी अभी तक स्वीकार नहीं पाई है और 2021 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ही उसे अपने हाथ से बंगाल की सत्ता जाते दिख रही है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या और ‘बिगड़ती’ कानून व्यवस्था के विरोध में सोमवार को ‘काला दिवस’ मनाया और उत्तरी 24 परगना जिले के बसीरहाट उप संभाग में 12 घंटे के बंद का आह्वान किया। इसके अलावा भाजपा ने राज्य के कई हिस्सों में रैलियां निकालीं, जिसमें पार्टी कार्यकर्ताओं ने काली पट्टी बांध रखी थी। यह वही कार्यकर्ता हैं जो कुछ समय पहले तक विजय जुलूस निकाल कर अपनी खुशी जता रहे थे लेकिन इनका उत्सव शायद राज्य सरकार को भाया नहीं इसलिए विजय जुलूसों के निकालने पर रोक लगा दी गयी। अब हिंसा के बाद इन कार्यकर्ताओं के चेहरे पर दर्द और दुख के भाव हैं जबकि एक सप्ताह पहले तक इनकी मुसकुराहटें थम नहीं रही थीं।
 
हत्याओं की राजनीति बंद हो
 


राज्य के बिगड़ते हालात के बारे में राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अवगत कराया। यह दुखद है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस के राज में राजनीतिक हिंसा अपने चरम पर है। जिस बर्बरता के साथ पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को मारा जा रहा है वह सभ्य समाज के माथे पर एक बड़ा कलंक है। भाजपा कार्यकर्ता सुकांता मंडल का पार्थिव शरीर कोई देख ले तो दहल जायेगा। क्या सत्ता के लिए हमारे राजनीतिक दल कोई भी हथकंडा अपनाएंगे ? क्या किसी पार्टी के कार्यकर्ता की जान की कोई कीमत नहीं है ? इस खूनी संघर्ष से हम क्या संदेश देना चाह रहे हैं ? कहाँ गये वो लोग जो किसी भी राज्य में एक भी हत्या पर सारा आसमान सिर पर उठा लेते हैं और उन्हें देश में असहिष्णुता बढ़ती नजर आती है ? क्या पश्चिम बंगाल की घटनाओं पर कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता बोलेगा ? 
तृणमूल कांग्रेस आखिर परेशान क्यों है ?


 
पश्चिम बंगाल में मारे गये भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों को हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल किया गया था तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह कहना गलत है कि राजनीतिक रंजिश में यह लोग मारे गये। लेकिन ममता दीदी पश्चिम बंगाल से जो खबरें और तसवीरें सामने आ रही हैं वह दर्शाती हैं कि राज्य में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं अब चरम पर हैं। शायद आपकी पार्टी को यह नहीं सहन हो पा रहा कि एक एक कर तृणमूल पार्षदों के भाजपा में चले जाने से नगरपालिकाओं पर भाजपा के नियंत्रण का सिलसिला शुरू हो गया है। शायद आपकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह नहीं पसंद आ रहा कि पिछले लोकसभा चुनावों में 2 सीटें जीतने वाली भाजपा कैसे इस बार 18 सीटों पर कब्जा जमा पाने में सफल हो गयी।
 
क्या लगेगा राष्ट्रपति शासन ?


 
भाजपा कह रही है कि राज्य की स्थितियों में अगर बदलाव नहीं हुआ तो वह पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की माँग करेगी। लेकिन यह संभव इसलिए नहीं लगता क्योंकि भाजपा आलाकमान ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे ममता बनर्जी को किसी प्रकार की कोई सहानुभूति मिले। फिलहाल तृणमूल कांग्रेस में जो भगदड़ मची है, भाजपा उसके और तेज होने का इंतजार करना ही मुनासिब समझ रही है। 
इस बार मामला क्या था ?
 
दरअसल पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को तब ज्यादा उबाल आ गया जब संदेशखली में झड़पों में मारे गए तीन लोगों के शव बरामद किए गए थे, जबकि कई अन्य लापता थे। भाजपा ने दावा किया है कि उसके पांच कार्यकर्ता मारे गए थे, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने दावा किया था कि उसका एक कार्यकर्ता मारा गया। रविवार को जब भाजपा के लोग मारे गये कार्यकर्ताओं के शव कोलकाता स्थित पार्टी कार्यालय लाना चाह रहे थे तो रास्ते में पुलिस ने इन्हें रोक दिया जिसका भाजपा कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध किया। झड़प के एक दिन बाद, गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक परामर्श भेजा जिसमें राज्य में हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की गई तथा कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कहा गया था। केन्द्र के पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने दावा किया कि राज्य में स्थिति ‘नियंत्रण’ में है और उसकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों की ओर से कोई लापरवाही नहीं हुई है। यही नहीं तृणमूल कांग्रेस ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को सोमवार को लिखे एक पत्र में आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल सरकार को भेजा गया गृह मंत्रालय का परामर्श विपक्ष शासित राज्यों में सत्ता हथियाने की चाल और गहरा षड्यंत्र है।
 
बहरहाल, अब तक राजनीतिक हिंसा की खबरें वाम शासित राज्यों में ही आम रहती थीं लेकिन तृणमूल कांग्रेस शासित पश्चिम बंगाल अब राजनीतिक हिंसा के मामले में सबसे आगे बढ़ रहा है तो सभी दलों को अपने निजी लाभ को भूलकर इस हिंसा का विरोध करना चाहिए। पश्चिम बंगाल को आज जरूरत है ऐसी सरकार की जोकि सच्चे अर्थों में कानून व्यवस्था की स्थिति सुधार कर राज्य में निवेश लाये और हर मोर्चे पर पिछड़ रहे इस महत्वपूर्ण पूर्वी राज्य को विकास की मुख्यधारा से जोड़े। हमारा संघीय ढाँचा राज्य और केंद्र के बेहतर रिश्तों की बात कहता है लेकिन देश में एकमात्र पश्चिम बंगाल ही ऐसा राज्य है जोकि लगातार केंद्र के साथ टकराव ले रहा है। सबने देखा कि किस प्रकार लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच वाद-विवाद हुआ था। खैर...हत्याएं चाहे किसी की भी हों, इस तरह की राजनीति सवर्था गलत है और राजनीतिक हिंसा की हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
 
-नीरज कुमार दुबे
 

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