अब तक विरोधियों से ताकत पाते रहे प्रधानमंत्री मोदी क्या चक्रव्यूह तोड़ पाएंगें?

modi shah
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ऐसा लगता है कि सुशासन, विकास और संवाद तीन स्तरों से सत्ता ने सब कुछ साध लिया है। आलोचना हर सरकार की होती है, होनी भी चाहिए। कहीं कुछ भी पूर्ण नहीं है। किंतु दिल्ली में 2014 के बाद आई सरकार ने न सिर्फ अपनी धमक बनाई वरन बदलता हुए हिंदुस्तान भी दिखा। यह अलग ही हिंदुस्तान था।

“मोदी है तो मुमकिन है” यह सिर्फ नारा नहीं है, भरोसा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 25 सालों के सत्ताकाल में इसे अर्जित किया है। चुनावों में इस भावना को ‘मोदी की गारंटी’ कहा गया। यही विचार था जो मोदी को संगठन और विचार से बड़ा बना देता है। आज मोदी एक विचार बन चुके हैं। वह विचार है सबको साथ लेकर इस देश को विकसित भारत बनाने का सपना। इस मायने में वे सपनों के सौदागर भी हैं। “अच्छे दिन आने वाले हैं” से लेकर “सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, सबका विश्वास” तक यह सातत्य दिखता है। यह बिल्कुल नई राजनीतिक संस्कृति है और उसका सतत विकास है।

सुशासन, विकास और संवाद है मंत्र-

ऐसा लगता है कि सुशासन, विकास और संवाद तीन स्तरों से सत्ता ने सब कुछ साध लिया है। आलोचना हर सरकार की होती है, होनी भी चाहिए। कहीं कुछ भी पूर्ण नहीं है। किंतु दिल्ली में 2014 के बाद आई सरकार ने न सिर्फ अपनी धमक बनाई वरन बदलता हुए हिंदुस्तान भी दिखा। यह अलग ही हिंदुस्तान था। जो आकांक्षाओं से भरा-पूरा था। अवसाद की चादर को फेंक कर कुछ करना चाहता था। आगे बढ़ना चाहता था। मोदी ऐसे हैं जिन्होंने राजनीतिक तंत्र और नेताओं की इज्जत थोड़ी बढ़ाई ही है। इसके पूर्व का समय याद करें तो वह ‘नीतिगत जड़ता’ का समय था, घोटालों की खबरें से हलाकान देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर था। दिल्ली में एक नई बनी पार्टी (आप) सत्ता में चुकी थी। तभी मोदी उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे और लोगों ने उनमें राष्ट्रनायक की छवि देखी। उनका साधारण अतीत भरोसा दे रहा था कि उन्हें लोगों के दर्द पता हैं और वे संकटों के ठोस और वाजिब हल निकालेगें। इस भरोसे ने तीन बार उन्हें केंद्र की सत्ता पर न सिर्फ बिठाया बल्कि तमाम राज्यों में भी भाजपा और राजग की सरकारें बनीं, जिन्हें डबल इंजन की सरकार कहकर संबोधित किया गया।

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अति आत्मविश्वास से बचने की जरुरत-

गुजरात और दिल्ली के ‘सत्ता साकेत’ में लगभग ढाई दशक पूरे कर चुके नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर इस समय विपक्ष और समाज के कुछ हिस्से हमलावर हैं। कुछ मुद्दे तो खुद उनकी सरकार ने दिए तो कुछ विपक्ष प्रायोजित विवाद भी हैं। जिसमें पेपरलीक, एनटीए की नाकामी, इथेनाल और चुनाव आयोग जैसे मुद्दे हैं। नरेटिव की जंग में मोदी का मुकाबला नहीं, किंतु हर बार ऐसा नहीं होता। कई बार अतिआत्मविश्वास भी नुकसानदायक होता है। जनता सब कुछ कर सकती है, किंतु अहंकार स्वीकार नहीं करती। सच तो यह है कि विपक्ष के बिखराव और आपसी खींचतान के बाद भी सरकार न तो सदन चला पाई न सामने से उठ रहे सवालों के उत्तर दे पाई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मोदी थक गए हैं या वे घिर गए हैं?

सच्चाई तो यह है कि मोदी और उनकी पार्टी के संगठन का मुकाबला करने की स्थिति में इस समय कोई दल या राजनीतिक समूह नहीं है। भाजपा अब पुरानी पार्टी नहीं रही। इस दौर में उनका जो भौगोलिक और सामाजिक विस्तार हुआ है, वह अभूतपूर्व है। इसके भरोसे ही वह तीन बार केंद्रीय सत्ता में आ सकी, जिसमें दो बार उसे पूर्ण बहुमत मिला तो तीसरी बार भी उसने आत्मविश्वास से भरकर सहयोगियों के साथ सरकार बना ली। सत्ता विरोधी रुझान के बाद भी भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंदी दल कांग्रेस 100 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर सका। बावजूद इसके इस चुनाव परिणाम से विपक्ष में यह भरोसा तो बना कि भाजपा के अश्वमेघ के रथ को रोका जा सकता है।

बंगाल की जीत ने दिया भरोसा-

अल्पमत की सरकार होने के बाद भी केंद्र की सरकार भरोसे से भरी है। बड़े फैसले हो रहे हैं। बंगाल के चुनावों की असंभव सी दिख रही जीत ने भाजपा के काडर में आत्मविश्वास भरा है। इस भरोसे में असम की जीत तो संयुक्त है ही। अब पंजाब और उत्तर प्रदेश के मैदान में डटी भाजपा को यह साबित करना है कि अभी वह चुकी और थकी नहीं है। पंजाब में बहुत कमजोर खिलाड़ी होकर भी वह मैदान को जीतने के लिए जिस तरह उतरी है, वह बात साबित करती है कि उसका यह भरोसा अकारण तो बिल्कुल नहीं है। नई नवेली आम आदमी पार्टी की सरकार वहां (पंजाब में) दूसरे संघर्ष में बन सकती है तो कोई कारण नहीं भाजपा भी ऐसे स्वप्न देखे। वहीं उत्तर प्रदेश में तो उसके पास योगी आदित्यनाथ जैसा फायर ब्रांड लीडर है, जिसके पास 10 सालों का सुनहरा अतीत है। सरकार के नेता पर कोई दाग नहीं है, गुंडों पर लगाम है, सरप्लस एकोनामी है। यानी उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ बदल गया है।

सामाजिक समरसता पर संकट-

फिर क्या कारण हैं कि नरेंद्र मोदी को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। कई जातीय समूह उन पर हमलावर हैं। जबकि इन समूहों द्वारा उठाए जा रहे आरक्षण जैसे विषयों पर राजनीतिक दलों की आम सहमति है। कोई दल इस विषय को छू नहीं सकता। ‘समीक्षा’ जैसे शब्द पर भी राजनीतिक दल कांप उठते हैं। इस विषय पर मोदी निशाने पर हैं। हालांकि यह ज्यादातर जंग आनलाईन माध्यमों पर ही लड़ी जा रही है किंतु समाज में इसका जहर नहीं फैल रहा है, यह कहना गलत होगा। इस बीच यूजीसी गाइडलाइंस ने अलग कबाड़ा किया। इससे मोदी विरोधियों को आग उगलने का मौका मिला। यह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि उसने इन प्रावधानों को रोककर सरकार की लाज बचा ली। सामाजिक समरसता के लिए यह सारे विवाद घातक हैं, किंतु राजनीति का लक्ष्य संधान अगर समाज को बांटकर ही  होता हो तो क्या किया जा सकता है? इसके साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लंबे समय तक झेलते रहना भी सरकार के विरुद्ध गया, अंततः प्रधान तिलचट्टों की अनावश्यक सस्ती राजनीति के शिकार होकर विदा हो गए। इससे गुमनाम और जनाधारहीन नई नवेली ‘काक्रोच जनता पार्टी’ अनावश्यक चर्चा में आ गयी।

इस सबके बाद भी मोदी और भाजपा की शक्ति को कम आंकना गलत होगा। योगी आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा, शुभेंदु अधिकारी, मोहन यादव, विष्णुदेव साय, नायब सिंह सैनी, मोहन मांझी, देवेंद्र फड़नवीस, सम्राट चौधरी जैसी मुख्यमंत्रियों की टीम को कम आंकना नासमझी होगी। नरेंद्र मोदी ने देश के हर क्षेत्र में सभी सामाजिक समूह के नेताओं की पूरी मलिका खड़ी कर दी है। भाजपा के इस सामाजिक विस्तार को समझे बिना आप मोदी की ताकत को नहीं भांप सकते। इसी तरह भाजपा का भौगोलिक विस्तार अप्रतिम है।

उत्तर प्रदेश में होगा देश का फैसला-

भाजपा ‘मोदी समय’ में जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की लोकसभा सीटें जीत चुकी है। भुवनेश्वर से लेकर मुंबई तक भाजपा की तूती बोल रही है। कांग्रेस और विपक्षी दलों के भरसक प्रयासों के बाद भी मोदी देश की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं। सरकार के विरुद्ध असंतोष को वे कैसे समाप्त करते हैं, इसकी पहली बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में होनी है। वहां के परिणाम देश की राजनीति को प्रभावित करेंगे। कई विश्वेषक और ज्योतिष गुरु नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति भवन भेजने और किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनाने में लगे हैं, किंतु ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा स्वयं को ज्यादा आश्वस्त पाती है। प्रधानमंत्री की सक्रियता और दिनचर्या को देखते हुए यह कहना कठिन है कि वे अभी आसानी से हथियार डाल देगें। संगठन और सरकार पर उनकी पकड़ मजबूत है। आज तक विपक्षियों के द्वारा हुए व्यापक विरोध से ही वे शक्ति अर्जित करते रहे हैं। नए समय में हो रहा विरोध क्या उन्हें फिर से शक्तिमान बनाएगा, इसके लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के परिणामों का इंतजार करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक संदेश देश की भावी दिशा तय करेगा, इसमें दो राय नहीं है।

- प्रो. संजय द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं।)

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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