हमला अरामको तेल संयंत्रों पर हुआ, चोट पूरी दुनिया को लग रही है

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में 1990-91 के खाड़ी युद्ध के बाद का सबसे बड़ा उछाल आया है। अगर हालात नहीं सुधरे तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। तेल कीमतों में वृद्धि का विपरीत असर भारतीय शेयर बाजारों में दिखने भी लगा है।

सऊदी अरब में अरामको के तेल संयंत्र पर शनिवार को हुए भीषण हमले के चलते भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में बड़ी वृद्धि होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि सऊदी अरब का कच्चा तेल उत्पादन घटने से भारत की आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस तरह कच्चे तेल के दाम में उछाल आ रहा है उसका असर भारत पर भी पड़ेगा और अगर ऐसा हुआ तो पेट्रोल और डीजल के दामों में पांच से छह रुपए तक की वृद्धि हो सकती है। भारत में पेट्रोलियम कीमतें चूँकि बाजार तय करता है तो कीमतों में वृद्धि की शुरुआत हो भी चुकी है।

देखा जाये तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में 1990-91 के खाड़ी युद्ध के बाद का सबसे बड़ा उछाल आया है। अगर हालात नहीं सुधरे तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। तेल कीमतों में वृद्धि का विपरीत असर भारतीय शेयर बाजारों में दिखने भी लगा है। अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए इन दिनों सरकारी प्रयास काफी तेजी से चल रहे हैं लेकिन ये तेल सारा खेल बिगाड़ भी सकता है। दरअसल सऊदी अरब के अरामको तेल संयंत्र से आपूर्ति सामान्य होने में कई हफ्तों का समय लगने की संभावना है और चूँकि इस हमले के चलते वैश्विक सप्लाई पर करीबन 5 फीसदी असर पड़ा है ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है जबकि सऊदी अरब भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है। अब जो देश सबसे ज्यादा तेल आयात करते हैं वहां तेल कीमतों को नियंत्रित रखने की चुनौती बढ़ गयी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो तेल कीमतों को अपने देश में नियंत्रित रखने के लिए स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) से तेल के इस्तेमाल को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी है। स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार है।

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अब बात करते हैं कि यह हमला क्यों हुआ, किसने किया और कैसे किया और अभी माहौल क्या है। तेल कंपनी अरामको के दो संयंत्रों पर हुए ड्रोन हमले के बाद खाड़ी देशों में जबरदस्त तनाव का माहौल बना हुआ है। हालांकि हूती विद्रोहियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ले ली है लेकिन सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव उच्च स्तर पर पहुँच चुका है। हूती विद्रोहियों का दावा है कि उन्होंने यमन की जमीन से दस ड्रोन अरामको तेल संयंत्र पर हमले के लिए भेजे थे लेकिन अब अमेरिका के एक नये दावे से इस मामले में आ गया है नया मोड़। जी हाँ, अमेरिका ने कुछ सैटेलाइट तस्वीरें जारी कर कहा है कि जिन तेल संयंत्रों पर हमला हुआ है वह सभी उत्तर-पश्चिम में स्थित हैं और इन पर यमन से निशाना लगाना कठिन है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा जा रहा है कि यह हमला इराक या ईरान की जमीन से हुआ है। सीएनएन ने भी दावा किया है कि हमले में सऊदी अरब के जिन 19 केंद्रों को नुकसान पहुँचा है वह सिर्फ 10 ड्रोनों की बदौलत नहीं किया जा सकता। मामले में एक और जो मोड़ आया है वह यह है कि यमन में लड़ रहे सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने कहा है कि तेल संयंत्रों पर हुए हमले में इस्तेमाल किये गए हथियार चिर-प्रतिद्वंद्वी ईरान से आए थे। गौरतलब है कि यमन में सऊदी अरब नीत सैन्य गठबंधन पांच साल से चल रहे संघर्ष में फंसा हुआ है।

जहाँ तक घटना का सवाल है तो सऊदी अरब में तेल की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी के दो संयंत्रों पर शनिवार को ड्रोन से हमला किया गया। यह हमला ऐसे समय में किया गया जब यह कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने को लेकर तैयारी कर रही है। पूर्वी सऊदी अरब में अरामको के दो बड़े संयंत्रों अब्कैक और खुरैस पर हमलों के बाद आसमान में धुएं के गुबार उठने लगे। ईरान के साथ चल रहे क्षेत्रीय तनावों के बीच यह हमला हुआ है। इन हमलों से पता चलता है कि ईरान से जुड़े हूती विद्रोही सऊदी अरब में तेल प्रतिष्ठानों के लिए कैसे गंभीर खतरा बन गए हैं। सऊदी अरब दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है।

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हाल के महीनों में हूती विद्रोहियों ने सीमा पार सऊदी अरब के अड्डों और अन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं जिसे वह यमन में विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों में सऊदी अरब के नेतृत्व में लंबे समय से की जा रही बमबारी का बदला बताते हैं। अरामको के धहरान मुख्यालय से 60 किलोमीटर दक्षिणपश्चिम में स्थित अब्कैक संयंत्र कंपनी के सबसे बड़े तेल प्रसंस्करण संयंत्र का गढ़ है। पहले भी आतंकवादी इसे निशाना बनाते रहे हैं। अल-कायदा के आत्मघाती विस्फोटकों ने फरवरी 2006 में इस तेल कंपनी पर हमला करने की कोशिश की थी लेकिन वे नाकाम रहे थे। धहरान से 250 किलोमीटर दूर स्थित खुरैस अरामको का प्रमुख ऑयल फील्ड है। अमेरिका और सऊदी अरब खाड़ी में टैंकरों पर हमलों के लिए ईरान को भी जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। अमेरिका का मुख्य सहयोगी सऊदी अरब लगातार ईरान पर हुती विद्रोहियों को हथियार मुहैया कराने का आरोप लगाता आया है। वहीं ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है। 

हमले के बाद सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री शहजादा अब्दुलअजीज ने बताया कि अरामको कंपनी के दो संयंत्रों में उत्पादन का काम अस्थायी तौर पर रोक दिया गया है। हमले के बाद कंपनी का कम से कम आधा उत्पादन प्रभावित हुआ है। वहीं सरकारी तेल कंपनी अरामको ने एक बयान में कहा, 'इन हमलों के कारण प्रति दिन 57 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन बंद रहेगा।’’ 

यमन में ईरान समर्थक हुती विद्रोहियों ने भले ड्रोन हमलों की जिम्मेदारी ले ली लेकिन अमेरिका ने हमले के लिए सबसे पहला नाम ईरान का ही लिया। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने इन हमलों के लिए बिना कोई साक्ष्य दिये सीधे ईरान को जिम्मेदार ठहरा दिया। यही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब की तेल कंपनी पर किए गए ड्रोन हमले का जवाब देने के लिए उनका देश पूरी तरह से तैयार है। अपने ट्वीट में हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर सीधे-सीधे आरोप नहीं लगाया लेकिन कहा कि हमले के लिए जो भी जिम्मेदार है उसका पता लगते ही उनका प्रशासन उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है। ट्रंप के ट्वीट से सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ गयी है और इस कारण पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे संबंधों में और खिंचाव आ गया है। तनाव के माहौल को भाँपते हुए चीन ईरान के समर्थन में आ खड़ा हुआ है और बीजिंग ने साफ कहा है कि किसी जांच में निष्कर्ष पर पहुंचे बगैर इन हमलों के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों ने सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर हुए ड्रोन हमले की निंदा की लेकिन अपने सदस्य ईरान को लेकर अमेरिकी रुख पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया।

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खुद ईरान ने अमेरिका के सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि वह सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर हुए हमले के मामले में उसके साथ है। साथ ही ईरान ने यह भी कहा है कि अमेरिका इस इस्लामी गणराज्य के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने के लिए कोई बहाना ढूंढ़ रहा है। ईरान जहाँ आरोपों को निराधार बता रहा है वहीं उसने अपने खिलाफ संभावित कार्रवाई का जवाब देने की तैयारी भी शुरू कर दी है। इस्लामिक रेवोल्युशनरी गार्ड कोर की हवाई शाखा के कमांडर ने कहा है कि ईरान की मिसाइलें 2,000 किलोमीटर की दूरी तक अमेरिकी ठिकानों और जहाजों को निशाना बना सकती हैं। ईरान की तस्नीम संवाद समिति ने ब्रिगेडियर जनरल अमीरअली हाजीजदेह के हवाले से कहा, “हमने एक पूर्ण युद्ध के लिए हमेशा से खुद को तैयार रखा है।'

दरअसल, ईरान और अमेरिका के बीच पिछले साल मई से तनाव बढ़ा हुआ है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2015 में हुए एक सौदे से अमेरिका को बाहर कर लिया था। इस सौदे के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के बदले उस पर लगे प्रतिबंधों में कुछ ढील देने का वादा किया गया था। सौदे से बाहर होने के बाद से अमेरिका ने “अधिकतम दबाव’’ बनाने के अपने अभियान के तहत ईरान पर बेहद सख्त प्रतिबंध लगाए हैं और इस्लामी गणराज्य ने इसका जवाब देने के लिए परमाणु समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धताएं कम की हैं। इन धुर विरोधियों (अमेरिका और ईरान) के बीच जून में युद्ध होने की स्थिति पैदा हो गई थी जब ईरान ने एक अमेरिकी ड्रोन विमान को मार गिराया था और ट्रंप ने जवाबी हमले करने का आदेश दे दिया था। हालांकि अंतिम क्षण में उन्होंने इसे रोक लिया था।

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मामला जल्द ठंडा पड़ जायेगा इसके आसार कम ही नजर आ रहे हैं क्योंकि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर और हमले करने की धमकी दी और विदेशियों से कहा कि वे वहां से दूर रहें। हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर याह्या सारी ने एक बयान में कहा है कि हम सऊदी प्रशासन को बताना दिलाते हैं कि अगर हम चाहें तो हमारे लंबे हाथ किसी भी जगह पर और किसी भी समय पहुंच सकते हैं। जहाँ तक इराक की बात है तो उसने भी अमेरिका को स्पष्ट कर दिया है कि यह हमला उसकी जमीन से नहीं हुआ।

-नीरज कुमार दुबे

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