आखिर किन कारणों से बंकरों का राज्य बनता जा रहा है जम्मू कश्मीर

By सुरेश डुग्गर | Publish Date: Jul 3 2019 12:37PM
आखिर किन कारणों से बंकरों का राज्य बनता जा रहा है जम्मू कश्मीर
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हालांकि पिछले 30 सालों में सैंकड़ों तथा बीते 14 सालों के दौरान सुरक्षा बलों के 150 से अधिक शिविर और बंकर कश्मीर के विभिन्न शहरों, कस्बों व गांवों से हटाने के बावजूद अभी भी कश्मीर वादी को बंकरों की वादी का नाम दिया जा रहा है।

सीआरपीएफ ने कुछ सप्ताह पहले ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के बीचोंबीच हनुमान मंदिर के पास हरी सिंह हाई स्ट्रीट के पास एक बंकर को हटा दिया था। यह बंकर करीब 30 साल पहले बनाया था। इतना जरूर था कि पिछले 14 सालों में 150 से अधिक बंकरों को हटाने के बावजूद अभी भी कश्मीर को बंकरों की घाटी कहा जाता है। सिर्फ कश्मीर घाटी ही बंकरों की घाटी नहीं है बल्कि अगर देखा जाए तो पूरा जम्मू कश्मीर ही बंकरों का राज्य है। पाकिस्तान से सटी 814 किमी लंबी एलओसी हो या फिर 264 किमी लंबा इंटरनेशनल बॉर्डर, देश की रक्षा की खातिर फौज द्वारा बनाए गए बंकरों के अतिरिक्त नागरिकों की जान-माल की क्षति रोकने की खातिर बनाए गए तथा बनने जा रहे 15000 बंकर एक अलग ही कहानी कहते हैं।
 
संबंधित अधिकारियों ने बताया कि बंकर हरी सिंह हाई स्ट्रीट की तरफ जाने वाली सड़क पर था। कई बार वहां आम लोगों को दिक्कतों का सामाना करना पड़ता था। उन्होंने इस हटाने के लिए संबंधित प्रशासन से भी कई बार आग्रह किया था। सीआरपीएफ ने स्थानीय लोगों की समस्याओं का संज्ञान लेते हुए इस बंकर को पूरी तरह हटा दिया। सीआरपीएफ के प्रवक्ता ने बताया कि बंकर हटाने का यह मतलब नहीं कि इलाके में सुरक्षा व्यवस्था से किसी प्रकार का समझौता किया गया है। यह बंकर जिस जगह था, वहां आम लोगों को कई बार असुविधा होती थी। इसलिए हटाया गया है।
अलबत्ता, इस पूरे क्षेत्र में गश्त बढ़ाई गई है और कुछ चिन्हित स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए मोबाइल बंकरों के साथ आवश्यक्तानुरूप जवान तैनात रहेंगे। यह बंकर कश्मीर घाटी में आतंकवाद के शुरू होने के साथ ही स्थापित किया गया था। बीते कुछ सालों के दौरान वादी के विभिन्न इलाकों में सैंकड़ों बंकर हटाए गए हैं। हालांकि पिछले 30 सालों में सैंकड़ों तथा बीते 14 सालों के दौरान सुरक्षा बलों के 150 से अधिक शिविर और बंकर कश्मीर के विभिन्न शहरों, कस्बों व गांवों से हटाने के बावजूद अभी भी कश्मीर वादी को बंकरों की वादी का नाम दिया जा रहा है। हटाए गए सभी बंकरों को हालात सामान्य होने के कारण नहीं हटाया गया है बल्कि कईयों को कई बार हालात थामने की खातिर भी हटाना पड़ा और फिर वहां मोबाइल बंकर स्थापित कर देने पड़े। सरकारी तौर पर फिलहाल, वादी के शहरी इलाकों में 192 सुरक्षा शिविर और बंकर मौजूद हैं। पर गैर सरकारी आंकड़ा सैंकड़ों का है।
 
राज्य विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला ने पहली जनवरी 2009 को कश्मीर में सुरक्षा बलों के शिविरों और बंकरों की स्थिति की जानकारी मांगते हुए पूछा था कि अब तक इनमें से कितने हटाए गए हैं। उनके सवालों पर राज्य गृह विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई लिखित जानकारी के अनुसार, पहली जनवरी 2009 को कश्मीर संभाग (लेह-करगिल समेत) में 258 शिविर व 18 बंकर थे। सबसे ज्यादा 117 शिविर और 11 बंकर श्रीनगर जिले में थे जबकि लेह व करगिल में न कोई सुरक्षा शिविर था और न बंकर।


 
श्रीनगर के बाद सोपोर पुलिस जिला में 35 शिविर थे। बडगाम, गंदरबल, अनंतनाग, पुलवामा, कुलगाम, छोपियां, अवंतीपोरा, बारामुल्ला, कुपवाड़ा, बांडीपोरा व हंडवाड़ा में क्रमशः 20, एक, 13, 21, 27, 5, 2, 4, 3, 8 व दो शिविर थे। वहीं, श्रीनगर के बाद सबसे ज्यादा तीन बंकर अवंतीपोरा में थे जबकि हंडवाड़ा, बांडीपोरा, कुपवाड़ा और बडगाम में ही एक-एक बंकर था। अन्य जिलों में कोई बंकर नहीं था। गृह विभाग के अनुसार श्रीनगर से जनवरी 2009 से अब तक 41 शिविर और दस बंकर हटाए गए हैं। इनमें पांच शिविर और बंकर 2009 में हटाए गए जबकि 16 बंकर व शिविर 2010 में, 14 बंकर व शिविर 2011 में, 12 बंकर व शिविर 2012 में और दो बंकर व शिविर 2013 में हटाए गए। इसके बाद 2015 में दो बंकर व शिविर हटाए गए हैं जबकि 2014 में या फिर इस साल अभी तक कोई बंकर या शिविर श्रीनगर शहर से नहीं हटाया गया था।
पूरी वादी में सबसे ज्यादा 22 बंकर और शिविर वर्ष 2010 में हटाए गए हैं और उसके बाद 2011 में हटने वाले बंकरों और शिविरों की तादाद 19 रही। वर्ष 2016 में पूरी वादी में सिर्फ हंदवाड़ा में ही एक बंकर हटाया गया था हंदवाड़ा में हिंसा भड़कने के बाद। बंकरों को लेकर सबसे पहले कश्मीर में वर्ष 1994 में विवाद उस समय हुआ था जब हजरत बल दरगाह के बाहर बने बंकरों को हटाने के नाम पर जबरदस्त बवाल मचा था। तबसे लेकर आज तक बंकर जहां कश्मीरियों के जीवन का हिस्सा बन गए हैं वहीं विवाद का कारण बने हुए हैं। यह बात अलग है कि अगर कश्मीर के आतंकवादग्रस्त इलाकों में ये बंकर सुरक्षा बलों का आतंकी हमलों से बचाव के काम आते हैं तो सीमांत इलाकों में पाक गोलीबारी और गोलाबारी से बचने की खातिर कश्मीरी इन्हीं का इस्तेमाल करते हैं।
 
ऐसा भी नहीं है कि प्रत्येक आतंकवादग्रस्त कस्बे में सभी कश्मीरी इन बंकरों से मुक्ति चाहते हों। जब सितम्बर 1994 में बंकर विवाद ने तूल पकड़ लिया था तो आम कश्मीरी की यही चाहत थी कि इन बंकरों को न उठाया जाए क्योंकि इन बंकरों की स्थापना के उपरांत इन क्षेत्रों के लोग बहुत ही सुखी हो गए हैं। आतंकवादी दलों के सदस्य अब घरों के दरवाजे रात गये नहीं खटखटाते थे और न ही बंदूक के जोर पर लोगों की बहू बेटियों को उन्हें सौंप देने के लिए तंग करते थे। लेकिन मजबूरी में कश्मीरियों को इन बंकरों के विरूद्ध तभी आवाज बुलंद करनी पड़ी जब आतंकियों के निशाने पर ये बंकर आने लगे और उन पर किए जाने वाले हथगोलों के हमले सुरक्षाकर्मियों को कम और आम नागरिकों को सबसे अधिक क्षति पहुंचाने लगे।
 
और जब बात एलओसी तथा इंटरनेशनल बॉर्डर पर बने हुए तथा बनाए जाने वाले बंकरों की आती है तो यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होती की हिन्दुस्तान में अब बंकरों के शहर और कस्बे भी हैं जो सिर्फ जम्मू कश्मीर में ही हैं। यह सच है कि अभी तक हिन्दुस्तान में दरियाओं के शहर, मंदिरों की नगरी आदि के नाम से प्रसिद्ध शहरों तथा कस्बों से जनता परिचित थी लेकिन अब उन्हें बंकरों के शहर और बंकरों के कस्बों के नाम से भी परिचित होना होगा। यह बंकरों के शहर तथा कस्बे कहीं और नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर में हैं, वे भी उस आग उगलती एलओसी पर जहां पिछले 71 सालों से ‘लघु युद्ध’ ने कभी रूकना गवारा नहीं समझा।
वर्ष 1999 के करगिल युद्ध से पहले ऐसे कस्बों तथा शहरों की संख्या करीब एक सौ थी जहां भूमिगत बंकरों में लोग रहने लगे थे। उनके लिए यही अब दो मंजिला और उनके शानदार बंगले थे। इन एक सौ के करीब कस्बों तथा शहरों में अनुमानतः 6000 बंकर हैं जबकि अगले वर्ष तक इन बंकरों के कस्बों तथा शहरों की संख्या बढ़ कर दोगुनी हो जाएगी और बंकर भवनों की संख्या भी हजारों में हो जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद 15000 से अधिक व्यक्तिगत तथा सामूहिक बंकरों का काम चालू है।
 
ये बंकरों के कस्बे और शहर 814 किमी लंबी उस एलओसी पर हैं जो भारत को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से अलग करती है तथा जो भारत-पाक बंटवारे के उपरांत से ही आग उगले जा रही है। अर्थात् इस 814 किमी लंबी एलओसी पर कभी पाक सेना ने गोलीबारी रोकी ही नहीं है। नतीजतन अब इस सीमा के साथ सटे कस्बों, गांवों तथा शहरों के लोगों को उस समय अपने खूबसूरत घरों को छोड़ जमीन के भीतर बनाए जाने वाले बंकरों में रहना पड़ता है जब पाकिस्तानी सेना अपनी तोपों के मुंह खेलती है। इन कस्बों में चाहे कोई अमीर है या गरीब, चाहे किसी का एक कमरे का मकान है या फिर चार मंजिला इमारत लेकिन अब उन्हें सात फुट चौड़े, सात फुट लंबे और 11 फुट ऊंचाई वाले भूमिगत बंकर में ही रहना पड़ता है।
 
करनाह, तंगधार, कुपवाड़ा, उड़ी, केरण समेत ऐसे सैंकड़ों कस्बे हैं जम्मू कश्मीर की सीमा के गांवों के जहां इन भूमिगत बंकरों का निर्माण किया गया है। कई और कस्बों में ऐसे बंकरों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। माना कि कश्मीर सीमा पर पाक गोलाबारी में कमी आई है मगर कोई भी किसी प्रकार का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं है। असल में एलओसी तथा इंटरनेशनल बॉर्डर के सीमावर्ती क्षेत्रों में पाक गोलाबारी से बचाव का कोई और साधन नहीं है। वैसे भी इन बंकरों की अनुपस्थिति में सैंकड़ों लोग मौत का ग्रास बन चुके हैं। इससे अधिक चौंकाने वाली बात क्या हो सकती है कि करगिल युद्ध के बाद एक छोटी सी करनाह तहसील में एक साल के भीतर कम से कम तीन सौ जानें ली गई थीं। यह आंकड़े अन्य कस्बों में और भी अधिक हैं।
 
फिलहाल बंकरों के कस्बों, गांवों तथा शहरों की स्थापना तो की गई है बावजूद इसके लोग अपने आपको सुरक्षित नहीं मानते। ऐसा इसलिए है क्योंकि कंक्रीट, लोहा, लकड़ी तथा बुलेट प्रूफ शीटों से बनाए जाने वाले यह बंकर सुरक्षित नहीं माने जा सकते। कारण पूरी तरह से स्पष्ट है कि कम से कम 120 किग्रा के वजन का तोप का गोला अगर उसके ऊपर आकर गिरता है तो वह कम से कम एक मीटर गहरा तथा इससे कई गुणा अधिक चौड़ा खड्डा बनाता है और ऐसे में यह बंकर सिर्फ सांत्वना देने के लिए तथा गोलों के छर्रों से बचाव के लिए अच्छे माने जा रहे हैं। ‘फिर भी हमें इनसे कुछ आस अवश्य बंधती है,’ टंगधार का अब्दुल राऊफ कहता है। लेकिन सेनाधिकारियों के अनुसार, कोई भी बंकर तोप के गोलों के सीधे निशाना बनने की सूरत में किसी का बचाव नहीं कर सकता। उनके अनुसर, सैनिकों को भी यही कठिनाई आ रही है।
हालांकि पाक गोलाबारी से बचाव का एक रास्ता संवेदनशील समझे जाने वाले गांवों के स्थानांतरण के रूप में निकाला जा रहा है मगर इसके पूरा होने की उम्मीद क्षीण है क्योंकि इस पर करोड़ों की धनराशि खर्च होगी और यह व्यावहारिक नहीं माना जा रहा।
 
-सुरेश डुग्गर
 

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