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समसामयिक

सरकारें ध्यान दें- कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं बाल श्रम करवाने वाले

By दीपक गिरकर | Publish Date: May 18 2018 3:30PM

सरकारें ध्यान दें- कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं बाल श्रम करवाने वाले
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देश में लगभग 9 करोड़ से भी अधिक बाल श्रमिक हैं जिनमें से 2 करोड़ से अधिक लड़कियाँ हैं और इनमें से लगभग 43 लाख बाल श्रमिकों का जीवन काफ़ी संकट में है। विश्व में हमारा देश 14 साल से कम उम्र के सबसे ज़्यादा बाल श्रमिकों वाला देश बन गया है। बाल श्रमिक सबसे अधिक दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्य में हैं। बाल मजदूरों की संख्या में वृद्धि का कारण है जनसंख्या वृद्धि और बेरोज़गारी। बेरोज़गारी और कम मजदूरी मिलने के कारण देश के बहुत लोग ग़रीबी में जीवन-व्यापन कर रहे हैं और इनके बच्चे मजदूर बन रहे हैं। बाल श्रम में वृद्धि एक चिंता का विषय है। बच्चे देश की संपत्ति हैं। बच्चे भविष्य के निर्माता हैं। बच्चे ही हमारे देश के भविष्य हैं। बाल श्रम एक ऐसा अपराध है जो देश के समग्र विकास में बाधक है। बाल श्रमिक ही भविष्य में बड़े होकर अकुशल मजदूर बन जाते हैं और अपना संपूर्ण जीवन ग़रीबी में और बीमारी में गुज़ारते हैं। देश में बालश्रम की समस्या एक चुनौती बन गयी है। बाल श्रमिकों की संख्या कम होने की अपेक्षा बढ़ती ही जा रही है। देश में लगभग 54 फीसदी बाल मजदूर शोषण का शिकार होते हैं। यह देश के लिए बहुत ही दुखद और शर्मनाक है। करोड़ों बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित हैं। सर्वशिक्षा के दावे करने वाले हमारे देश के कर्णधार भी इन्हें शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ नहीं पाए। पैसा कमाना इन बच्चों की मजबूरी है। बालश्रम एक कड़वी सच्चाई है। बालश्रम की समस्या हमारे देश के लिए एक चुनौती है। बालश्रम की समस्या विश्वव्यापी बनती जा रही है। बाल मजदूरी समाज पर एक कलंक है। 

सरकार ने बालश्रम को अपराध घोषित किया है। सरकार ने बालश्रम (निषेध और संशोधन) अधिनियम, 2016 पारित किया जिसे 1 सितंबर 2016 से लागू किया गया। इस संशोधन के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोज़गार देना पूरी तरह से निषिद्ध है। हमारे देश में सरकार द्वारा क़ानून तो बना दिए जाते हैं लेकिन उनका पालन विधायिका और कार्यपालिका द्वारा नहीं करवाया जा रहा है इसलिए बाल श्रमिकों का शोषण करने वालों के हौसले बुलंद हैं। सरकार सिर्फ़ क़ानून बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 में बाल श्रम को प्रतिबंधित और गैर क़ानूनी कहा गया है। बाल श्रम को रोकने के लिए ढेर सारे क़ानून बना दिए गये हैं और इन क़ानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़े दंड के प्रावधान होने के बावजूद भी कई ख़तरनाक उद्योगों में देश के मासूम बच्चे काम कर रहे हैं। देश में कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसमें बाल श्रमिकों को नहीं लगाया गया हो। ये लोग कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। बच्चों की प्रगति का सपना केवल कागज पर ही पूरा हो रहा हैं। क्या न्यू इंडिया का लक्ष्य इन बच्चों के प्रति उदासीन रवैया अपना कर हासिल होगा?
 
बाल मजदूरी हर दृष्टिकोण से बच्चों की वृद्धि और विकास में बाधक है। बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक हितों को प्रभावित करती है। यह गैर कानूनी कृत्य दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। अब सरकार को अपनी आँखें खोलनी होंगी और विधायिका एवं कार्यपालिका पर निगरानी और नियंत्रण बढ़ाना होगा। क्या सरकार वास्तव में इन बच्चों के प्रति संवेदनशील है? क्या कभी सरकार ने यह विचार किया क़ि आख़िर ये मासूम बच्चे मजदूरी करने के लिए क्यों मजबूर हो जाते हैं? सरकार के इतने अधिक कानून, योजनाएँ, कल्याणकारी कार्यक्रम, एनजीओ, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं प्रशासनिक गतिविधियों के चलते रहने के बावजूद भी देश में बाल श्रमिकों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।
 
सरकार द्वारा सन् 1988 में बाल मजदूरी को ख़त्म करने के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना प्रारंभ की गई, इसके तहत बाल श्रम से सभी बच्चों को बाहर करना, उनका पुनर्वास करना और उन्हें शिक्षा की मुख्य धारा में शामिल करना था लेकिन लेकिन सरकार की यह योजना भी अन्य कल्याणकारी योजनाओं की तरह राज्य सरकार की विधायिका और कार्यपालिका के कारण बाल मजदूरों का कोई ख़ास भला नहीँ कर सकी है। केंद्र एवं राज्य सरकारों का सर्व शिक्षा अभियान मात्र एक ढकोसला बन कर रह गया है। राज्य सरकारें बाल मजदूरों की सही संख्या नहीं बताना चाहती हैं। राज्य सरकारों ने बाल मजदूरों के लिए विशेष स्कूल खोल दिए हैं लेकिन इन स्कूलों में बाल मजदूरों की संख्या बहुत कम रहती है। राज्य सरकारों द्वारा हर बच्चे को खानपान, चिकित्सा के लिए रूपये एक सौ का मासिक वज़ीफ़ा दिया जाता है। यह मासिक वज़ीफ़ा भी सिर्फ़ 14 वर्ष तक की उम्र तक ही दिया जाता है जबकि कम से कम यह वज़ीफ़ा 18 वर्ष तक की उम्र तक तो दिया ही जाना चाहिए। वैसे भी एक सौ रूपये मासिक वज़ीफ़ा भी बहुत कम है। इस समस्या के निदान के लिए देश के हर नागरिक को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। बाल मजदूरी से बच्चों को बचाने की ज़िम्मेदारी देश के हर नागरिक की है। इस बड़ी भारी समस्या के समाधान के लिए सभी की भागीदारी आवश्यक है। जब तक मजदूरों को उचित मजदूरी और संगठित क्षेत्र के मजदूरों के समान सुविधाएँ नहीं मिलेंगी तब तक यह समस्या ऐसे ही बनी रहेगी।
 
बहुत बार सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से बाल मजदूरों को मुक्त करवाया गया है। अब समय आ गया है कि सरकारी मशीनरी के साथ स्वयं सेवी संस्थाएँ और आमिर ख़ान, नाना पाटेकर जैसे सेलिब्रिटी बाल श्रम को रोकने के लिए आगे आएं क्योंकि जिन बच्चों को स्कूल में होना चाहिए वे बच्चे श्रमिक बनकर उद्योग-धंधों में काम कर रहे हैं और ये बाल श्रमिक किसी न किसी बीमारी जैसे तपेदिक, अस्थमा, त्वचा रोग, नेत्र रोग, स्नायु रोग, विकलांगता से ग्रसित हैं। सिर्फ़ कैलाश सत्यार्थी जो कि `बचपन बचाओं आंदोलन` के संस्थापक हैं, जैसे कुछ ही लोग अपने पूरे तन, मन और धन के साथ इन बाल मजदूरों को बाल श्रम से हटाकर उन्हें शिक्षित कर उन्हें प्रगति और विकास के पथ पर आगे बढ़ा रहे हैं। देश के प्रबुद्धजनों को एक संकल्प लेना होगा कि वे इन बाल मजदूरों को बाल श्रम से हटाकर शिक्षित करेंगे तभी इस कृत्य पर लगाम लगाई जा सकती है और देश का भविष्य बर्बाद होने से बच सकेगा।
 
-दीपक गिरकर
(स्वतंत्र टिप्पणीकार) 

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