ब्रांडेड दवाओं जैसी ही असरकारी हैं जैनरिक दवाइयां, मोदी सरकार की योजना का लाभ उठाएं

ब्रांडेड दवाओं जैसी ही असरकारी हैं जैनरिक दवाइयां, मोदी सरकार की योजना का लाभ उठाएं

आज पूरे भारत में लगभग तहसील स्तर पर जैनरिक मेडिसिन के यह जन औषधि स्टोर खुल चुके हैं। डॉक्टरों से अधिक से अधिक जैनरिक मेडिसिन लिखने को कहें, जिससे मेडिकल खर्च की वजह से कोई परिवार बर्बाद ना हो।‬

सामान्य दवा या जैनरिक दवा (generic drug) वह दवा है जो बिना किसी पेटेंट के बनायी और वितरित की जाती है। जैनरिक दवा के फॉर्मुलेशन पर पेटेंट हो सकता है किन्तु उसके सक्रिय घटक (active ingradient) पर पेटेंट नहीं होता। जैनरिक दवाईयां गुणवत्ता में किसी भी प्रकार के ब्राण्डेड दवाईयों से कम नहीं होतीं तथा ये उतनी ही असरकारक हैं, जितनी की ब्रांडेड दवाईयाँ। यहाँ तक कि उनकी मात्रा (डोज), साइड-इफेक्ट, सक्रिय तत्व आदि सभी ब्रांडेड दवाओं के जैसे ही होते हैं। जैनरिक दवाईयों को बाजार में उतारने का लाईसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। उसके बाद ही इन्हें जनसामान्य के लिए प्रसारित किया जाता है।

किसी भी बीमारी के लिए डॉक्टर जो दवा लिखता है, ठीक उसी दवा के सॉल्ट वाली जैनरिक दवाएं उससे काफी कम कीमत पर आपको मिल सकती हैं। कीमत का यह अंतर पांच से दस गुना तक हो सकता है। बात सिर्फ आपके जागरूक होने की है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि देश में लगभग सभी नामी दवा कम्पनियां ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जैनरिक दवाएं भी बनाती हैं लेकिन ज्यादा लाभ के चक्कर में डॉक्टर और कंपनियां लोगों को इस बारे में कुछ बताते नहीं हैं और जानकारी के अभाव में गरीब भी केमिस्ट से महंगी दवाएं खरीदने को विवश हैं।

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कई बार तो ब्रांडेड और जैनरिक दवाओं की कीमतों में नब्बे प्रतिशत तक का फर्क होता है। जैसे यदि ब्रांडेड दवाई की 14 गोलियों का एक पत्ता 786 रुपये का है, तो एक गोली की कीमत करीब 55 रुपये हुई। इसी सॉल्ट की जैनरिक दवा की 10 गोलियों का पत्ता सिर्फ 59 रुपये में ही उपलब्ध है, यानी इसकी एक गोली करीब 6 रुपये में ही पड़ेगी। खास बात यह है कि किडनी, यूरिन, बर्न, दिल संबंधी रोग, न्यूरोलोजी, डायबिटीज जैसी बीमारियों में तो ब्रांडेड व जेनेरिक दवा की कीमत में बहुत ही ज्यादा अंतर देखने को मिलता है।

यह अंतर इस कारण आता है कि जैनरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं। इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियों को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता। इसलिए एक ही कंपनी की पेटेंट और जैनरिक दवाओं के मूल्य में काफी अंतर होता है। चूंकि जैनरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, अत: वे सस्ती होती हैं, जबकि पेटेंट दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं, इसलिए वे महंगी होती हैं। कंपनी के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव डॉक्टरों को अच्छा खासा कमीशन देते हैं जिससे वे अधिक से अधिक कंपनी की ब्रांडेड दवाईयां ही मरीज को लिखें।

उदाहरण के लिए यदि चिकित्सक ने रक्त कैंसर के किसी रोगी के लिए ‘ग्लाईकेव‘ ब्राण्ड की दवा लिखी है तो महीने भर के कोर्स की कीमत 1,14,400 रूपये होगी, जबकि उसी दवा के दूसरे ब्राण्ड ‘वीनेट‘ की महीने भर के कोर्स की कीमत अपेक्षाकृत काफी कम 11,400 रूपये होगी। सिप्ला इस दवा के समकक्ष जैनरिक दवा ‘इमीटिब‘ 8,000 रूपये में और ग्लेनमार्क केवल 5,720 रूपये में मुहैया करवाती है। इसी प्रकार प्रेग्नेंसी, एक्सिडेंटल, सर्जरी केस में भी मेडिकल के बहाने अंधाधुंध लूट होती है, जिसे रोका जाना जरूरी हो गया है।

इन सब के बीच कुछ अच्छे चिकित्सक भी हैं जो अनावश्यक ना तो सर्जरी करते हैं ना ही ज्यादा इलाज या खर्चीला कोर्स देते हैं, फीस भी कम से कम लेते हैं, किन्तु ऐसे डॉक्टरों के केबिन अक्सर वीरान पाए जाते हैं, डॉक्टर तो वही चलता है जिसके केबिन के बाहर मरीजों की लंबी कतार हो, इस मानसिकता को बदलना होगा।

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प्रधानमंत्री जन औषधि योजना भारत के प्रधानमंत्री ‪नरेन्द्र मोदी द्वारा 1 जुलाई 2015 को घोषित एक योजना है। इस योजना में सरकार द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली जैनरिक (Generic) दवाईयों के दाम बाजार मूल्य से कम किए जा रहे हैं। सरकार द्वारा 'जन औषधि स्टोर' बनाए गए हैं, जहां जेनरिक दवाईयां उपलब्ध करवाई जा रही हैं, यह मेडिकल क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन था जो गरीब व असहाय लोगों की जरूरतों को देखकर किया गया था, आज पूरे भारत में लगभग तहसील स्तर पर जैनरिक मेडिसिन के यह जन औषधि स्टोर खुल चुके हैं। जनता को भी इस विषय पर जाग्रत होना होगा, डॉक्टरों से अधिक से अधिक जैनरिक मेडिसिन लिखने को कहें, जिससे मेडिकल खर्च की वजह से कोई परिवार बर्बाद ना हो।‬

-मंगलेश सोनी