असभ्य हरकतों का अड्डा बनता जा रहा है सोशल मीडिया, इसे रोकना होगा

Social media
Creative Commons licenses
हम सभी लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया अपने विचारों को दुनिया तक पहुंचाने का आज सबसे सशक्त व तेज प्लेटफॉर्म बन गया है। हम लोगों को इसका सकारात्मक उपयोग करते हुए देश, समाज, परिजनों व अपने हित में सदुपयोग करना चाहिए।

भारतीय संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की पूर्ण आज़ादी प्रदान करता है, लेकिन कानून के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसके बहुत सारे अपवाद भी मौजूद हैं। आप अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की अवमानना नहीं कर सकते हैं, किसी भी दूसरे व्यक्ति के मान-सम्मान को ठेस नहीं पहुंचा सकते हैं, समाज में धार्मिक व जातिगत आधार पर किसी भी प्रकार की दुर्भावना व नफ़रत नहीं फैला सकते हैं। वैसे भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह मतलब नहीं होता है कि आप देश में सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों के बारे में सोशल मीडिया के बेहद सशक्त प्लेटफार्म पर सार्वजनिक रूप से असंसदीय व असभ्य हैशटैग तक चलवाने का असभ्यता की पराकाष्ठा वाला कृत्य करें। यहां आपको मैं याद दिला दूं कि जिस तरह से सोशल मीडिया के सशक्त माध्यम के दुरुपयोग का नमूना 24 जुलाई 2022 को भारतीय राजनीति के संदर्भ में पूरी दुनिया ने देखा है, वह बेहद शर्मनाक था। उसके संदर्भ में कहा जा सकता है कि यह दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में अंध भक्तों के भारी भीड़ के चलते एक ऐसे शर्मनाक दिन के रूप में दर्ज हो गया है, जब भारत के ही लोग अपने चुने हुए संवैधानिक पदों पर आसीन जन प्रतिनिधियों के बारे में गालियों का असभ्यता से परिपूर्ण हैशटैग बनाकर उसको खुद ही टॉप पर ट्रैंड करवाकर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे थे। हालांकि सरकार को व आईटी कंपनियों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि इस तरह के कृत्य की भविष्य में फिर कभी पुनरावृत्ति ना होने पाये। इन असभ्य हैशटैग ने ना केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि मोदी व केजरीवाल सरनेम वाले सभी लोगों की भावनाओं को आहत करने का कार्य किया है। देश की केन्द्रीय जांच एजेंसियों को तत्काल इन असभ्य हैशटैगों की शुरुआत करने वाले लोगों की पहचान करनी चाहिए और उन सभी लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करके इसके लिए जिम्मेदार सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे कि भविष्य में फिर कोई व्यक्ति इस तरह की ओछी मानसिकता के द्वारा समाज में नफ़रत फ़ैलाने का व संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बारे में ऐसे बेहूदगी भरे असभ्य शब्दों का उपयोग करने की जुर्रत ना कर सकें। 

वैसे भी जिस तरह का दौर चल रहा है उसमें आज महात्मा गांधी के देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की हर हाल में रक्षा व राजनीतिक शुचिता को बनाए रखना बेहद अहम हो गया है। इसलिए अब आवश्यक हो गया है कि देश के प्रत्येक छोटे-बड़े राजनेताओं व उनके राजनीतिक समर्थकों के द्वारा जिस तरह से एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक रूप से आये दिन बेहद बेहूदगी पूर्ण व असभ्य असंसदीय भाषा का उपयोग किया जाने लगा है वह सब तत्काल बंद होना चाहिए। इन लोगों को समझना चाहिए कि क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह की बेहद ओछी मानसिकता से परिपूर्ण विचार व राजनीतिक सोच पर अब लगाम लगनी चाहिए। क्योंकि इन चंद प्रभावशाली लोगों की एक-एक हरकतों को देश का आम जनमानस हूबहू कॉपी करके उपयोग करने का कार्य करता है, जिसके चलते सभ्य समाज में तेजी से असभ्यता बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है।

इसे भी पढ़ें: सोशल मीडिया की वजह से खड़ा हो रहा है बेवजह का हंगामा, इस मंच पर जरूरी है अंकुश

वैसे तो भारतीय कानून सोशल मीडिया पर लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार, केजरीवाल व अन्य किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा हक भी प्रदान करता है। क्योंकि कोई भी सरकार जब जनता से किये गये अपने वादों को पूरे नहीं करेगी या जनता उसके कार्यों से संतुष्ट नहीं होगी, तो आम जनमानस के पास उस सरकार पर जमकर हमला बोलने का कार्य करने का सबसे सरल माध्यम सोशल मीडिया ही है। लेकिन सभ्य समाज में हमेशा शब्दों की गरिमा का ध्यान रखना हम सभी लोगों का नैतिक कर्तव्य व दायित्व है, सभ्य समाज में किसी भी व्यक्ति को असभ्यता करके उद्दंडता पूर्ण व्यवहार करने का अधिकार नहीं है, किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं है।

हम सभी लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया अपने विचारों को दुनिया तक पहुंचाने का आज सबसे सशक्त व तेज प्लेटफॉर्म बन गया है। हम लोगों को इसका सकारात्मक उपयोग करते हुए देश, समाज, परिजनों व अपने हित में सदुपयोग करना चाहिए, ना कि सोशल मीडिया के द्वारा हम लोग समाज में असभ्य व नफ़रती जहरीली सोच को फ़ैलाने के लिए प्रयोग करें। आज के व्यवसायिक दौर में यह हम सभी लोगों की व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली सभी कंपनियों की बेहद अहम जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया पर ऐसा तालमेल बनाएं कि लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव की व्यवस्था भी पूर्णतः बरक़रार रहे।

इसे भी पढ़ें: कितना जरूरी है सोशल मीडिया पर अंकुश? क्या है इसकी 'लक्ष्मण रेखा' जिसका जिक्र SC के जज ने किया, दूसरे देश कैसे रेगुलेट करते हैं

वैसे भी हम लोगों को सोशल मीडिया पर वायरल हो रही बातों को लेकर सचेत रहना होगा, उस पर आंख बंद करके विश्वास करने से बचना होगा, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया की तरह कोई एडिटर नाम की चीज़ नहीं होती है, जिससे कि गलत, भ्रामक, असभ्य व अश्लील तथ्यों को प्रकाशित होने से रोका जा सके या उसके लिए कंपनी के किसी व्यक्ति विशेष की जवाबदेही तय की जा सके। वैसे भी दुनिया में सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को आईटी एक्ट के तहत बहुत सारी ज़िम्मेदारियों से छूट मिली हुई है, जिसके चलते वह केवल अपनी कंपनी का लाभ बढ़ाने में लगे रहते हैं और खर्च से बचने के लिए सोशल मीडिया के इस बड़े प्लेटफॉर्म को अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में फ्री छोड़ देते हैं। जिसके चलते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का ग़लत कार्यों के लिए धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है, षड्यंत्रकारी लोग विभिन्न फ़र्ज़ी नामों से आईडी बना कर सोशल मीडिया के माध्यम से अपना ग़लत अनैतिक मकसद पूरा करते हैं और बड़े पैमाने पर लोग पोस्ट को लाईक, कमेंट व शेयर करके अंजाने में उनका सहयोगी बन जाते हैं। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाने वाली आईटी कंपनियों को यह समझना होगा कि अगर इस तरह से ही उनके प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता, नफ़रती व जहरीली सोच और असभ्यता का प्रचार-प्रसार होता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब सभ्य समाज के अधिकांश सभ्य लोग सोशल मीडिया से पूरी तरह से किनारा करने लगेंगे।

-दीपक कुमार त्यागी

(वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक)

अन्य न्यूज़