‘एक राष्ट्र, एक सॉफ्टवेयर’ योजना से भूमि विवादों पर लगेगी लगाम

‘एक राष्ट्र, एक सॉफ्टवेयर’ योजना से भूमि विवादों पर लगेगी लगाम

डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम को 21 अगस्त 2008 को प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी। लेकिन 1 अप्रैल 2016 को इसे पीएम नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा केंद्रीय सेक्टर की योजना के रूप में मंजूरी मिली, जिसमें केंद्र से 100 प्रतिशत फंडिंग का प्रावधान किया गया।

भारत सरकार ने भूमि व भवन जैसी स्थायी परिसम्पत्तियों से जुड़े संदिग्ध लेनदेन को कम करने, इनसे जुड़े विवादों को रोकने में मदद हासिल करने और इससे जुड़ी अदालती प्रणाली के बाधित होने की प्रक्रिया को भी कम करने के लिए डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (डीआईएलआरएमपी) को लागू करने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। इस कार्यक्रम में संपत्ति व उसे जुड़े दस्तावेजों के रजिस्ट्रेशन के लिए ‘एक राष्ट्र, एक सॉफ्टवेयर’ योजना के तहत 10 राज्यों में एनजीडीआरएस लागू की जा रही है। इसके अलावा, साल 2021-22 तक यूएलपीआईएन लागू की जाएगी। इसके तहत 2023-24 तक व्यक्तिगत आधार कार्ड को भूमि खाता बही (लैंड रिकॉर्ड) के साथ जोड़ा जाएगा।

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इसके निमित्त सरकार नेशनल कॉमन डॉक्युमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एनजीडीआरएस) और यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (यूएलपीआईएन) लागू करेगी, ताकि जमीन के रिकॉर्ड्स को एकीकृत व समन्वित (इंटीग्रेटेड) किया जा सके और रेवेन्यू एवं रजिस्ट्रेशन को जोड़ने की पारदर्शी व्यवस्था बनाई जा सके। बता दें कि अभी तक भूमि सुधार के बारे में जितने भी निर्णय लिए गए हैं, उनमें से यह निर्णय युगान्तकारी साबित होगा।

वैसे तो इस सम्बन्ध में वर्ष 2008 में केंद्र में सत्तारूढ़ डॉ मनमोहन सिंह की यूपीए वन की सरकार के मातहत गठित केंद्रीय मंत्रिमंडल से ही मिली मंजूरी मिली है, लेकिन वर्ष 2014 में केंद्र में गठित नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार ने इस कार्य में आशातीत प्रगति की। ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि, ‘डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम में काफी प्रगति हुई है और बुनियादी जरूरतों से जुड़े लक्ष्यों को हासिल किया गया है, लेकिन राज्य अभी तक इस कार्यक्रम को 100 प्रतिशत पूरा नहीं कर पाए हैं।’ 

गौरतलब है कि डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम को 21 अगस्त 2008 को प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी। लेकिन 1 अप्रैल 2016 को इसे पीएम नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा केंद्रीय सेक्टर की योजना के रूप में मंजूरी मिली, जिसमें केंद्र से 100 प्रतिशत फंडिंग का प्रावधान किया गया। क्योंकि इसका उद्देश्य देशभर में विभिन्न सभी राज्यों में खतियान जैसी भूमि खाता बही (लैंड रिकॉर्ड्स) को जोड़ते हुए उपयुक्त इंटीग्रेटेड लैंड इन्फॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम (आईएलआईएमएस) स्थापित करना है।

विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, इस कार्यक्रम को मार्च 2021 तक पूरा होना था। लेकिन कोरोना वन और टू की लहर झेलने के चलते हुए कार्यगत विलम्ब के लिहाज से अब इसे वर्ष 2023-24 तक विस्तार दिया गया है, ताकि चालू कार्यों सहित इसकी नई कार्य योजना को अगले तीन वर्षों में पूरा किया जा सके। अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से बताया है कि इस कार्यक्रम में संपत्ति और उससे सम्बद्ध दस्तावेजों के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) के लिए ‘एक राष्ट्र, एक सॉफ्टवेयर’ योजना के तहत 10 राज्यों में एनजीडीआरएस लागू की जा रही है। इसके अलावा साल 2021-22 तक यूएलपीआईएन लागू की जाएगी।

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बता दें कि केंद्र सरकार के भगीरथ प्रयासों से एनजीडीआरएस सिस्टम को 10 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों, यथा- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा और नगर हवेली, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम और पंजाब में लागू किया गया है। उन्होंने बताया कि यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर के जरिये आधार नंबर को लैंड डॉक्यूमेंट के साथ जोड़ा जाएगा। साथ ही भूमि खाता बही यानी खतियान व रजिस्टर टू जैसे महत्वपूर्ण लैंड रिकार्ड्स को रेवेन्यू कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम से भी जोड़ने का कार्यक्रम है।

बताते चलें कि यूएलपीआईएन सिस्टम में प्रत्येक प्लॉट या लैंड के लिए 14 नंबर की यूनिक आईडी होगी, जो विशिष्ट आईडी भू-संदर्भ नियामक (जिओ-रेफरेंस रेगुलेटर) पर आधारित होगी। यह अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगा। इसका उद्देश्य भूमि के रिकॉर्ड्स को हमेशा अपडेट रखना है और सभी संपत्तियों के लेन-देन के बीच एक कड़ी स्थापित करना है। 

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अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए सरकार ई-कोर्ट्स को लैंड रिकॉर्ड्स और रजिस्ट्रेशन डेटाबेस से जोड़ने की योजना बना रही है, जिससे वास्तविक खरीददारों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि जिस जमीन को खरीदने की वह योजना बना रहे हैं, उस पर कोई कानूनी विवाद तो नहीं है। इससे भूमि जैसी स्थायी परिसम्पत्तियों में निवेश करने वाले लोगों की अभिरुचि भी बढ़ेगी, क्योंकि इस प्रक्रिया के पूरी तरह से अमल में आने के पश्चात भूमि सौदों में विवाद की गुंजाइश ही बहुत कम हो जाएगी।

भारत सरकार को भी यही लगता है कि इन तकनीकी उपायों और उससे जुड़े कानूनी प्रावधान से न केवल संदिग्ध लेनदेन कम होगा, बल्कि भूमि विवादों को रोकने में भी एक हद तक मदद मिलेगी। साथ ही, अदालती प्रणाली का बाधित होना भी काफी कम हो जायेगा, जिससे न्यायालय का कीमती वक्त जाया नहीं होगा। बता दें कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा के साथ ही महाराष्ट्र में भी ई-अदालतों को भूमि के अभिलेखों और पंजीकरण से जोड़ने का पायलट प्रोजेक्ट पूरा हो गया है और जल्द ही इसे देशभर में शुरू किया जाएगा, ताकि भूमि विवादों व जमीन की खरीद बिक्री में दिखने वाली अनियमितताओं को नियंत्रित किया जा सके। यदि यह योजना अपना पूर्ण आकार पूरे देश में ले पाई तो यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार