Prabhasakshi NewsRoom: Trump के टैरिफ अटैक से पहले ही Modi चल देते हैं चाल, Iran पर अमेरिकी दाँव उलटा पड़ जायेगा

Modi Trump
Image Source: X Grok

अमेरिकी घोषणा ऐसे समय आई है जब ईरान के भीतर लंबे समय से अशांति और विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। सरकार विरोधी आंदोलनों ने वहां की व्यवस्था को हिला दिया है और पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान इन आंदोलनों को बल प्रयोग से दबा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को झकझोर देने वाला ऐलान किया है। ट्रंप ने घोषणा की है कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर अमेरिका पच्चीस प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा। यह फैसला न केवल ईरान के खिलाफ है, बल्कि उन सभी देशों के लिए सीधी चेतावनी है जो किसी भी रूप में तेहरान से आर्थिक संबंध बनाए हुए हैं। ट्रंप ने इस कदम को अंतिम और निर्णायक करार दिया है और साफ कहा है कि इसमें किसी तरह की ढील या अपवाद नहीं होगा।

यह घोषणा ऐसे समय आई है जब ईरान के भीतर लंबे समय से अशांति और विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। सरकार विरोधी आंदोलनों ने वहां की व्यवस्था को हिला दिया है और पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान इन आंदोलनों को बल प्रयोग से दबा रहा है। ट्रंप प्रशासन इसी पृष्ठभूमि को आधार बनाकर ईरान पर आर्थिक शिकंजा और कसना चाहता है। ट्रंप का मानना है कि यदि ईरान को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से काट दिया गया तो वहां की सत्ता पर आंतरिक दबाव कई गुना बढ़ जाएगा।

इसे भी पढ़ें: तुरंत ईरान को छोड़ दें...अभी-अभी हमले को लेकर अमेरिका का बड़ा ऐलान

देखा जाये तो इस टैरिफ का दायरा बेहद व्यापक है। जो भी देश ईरान से तेल खरीदेगा, वस्तुएं बेचेगा या किसी भी तरह का व्यापार करेगा, उसे अमेरिका के साथ अपने व्यापार पर पच्चीस प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क चुकाना होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका अब केवल अपने बाजार की शर्तें नहीं तय कर रहा, बल्कि वह यह भी तय करना चाहता है कि बाकी दुनिया किससे व्यापार करे और किससे नहीं।

इस फैसले के बाद वैश्विक बाजारों में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है। ऊर्जा बाजार खास तौर पर दबाव में हैं क्योंकि ईरान तेल और गैस का बड़ा उत्पादक देश है। यदि व्यापार बाधित होता है या तनाव बढ़ता है तो तेल की आपूर्ति पर असर पड़ना तय है। इसका असर सिर्फ पश्चिमी देशों पर नहीं, बल्कि एशिया और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा।

ईरान की प्रतिक्रिया भी उतनी ही सख्त रही है। ईरानी नेतृत्व ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि दबाव, धमकी और छल की नीति अब काम नहीं आएगी। ईरान ने संकेत दिया है कि यदि उसके खिलाफ आर्थिक युद्ध को और तेज किया गया तो वह अपने तरीके से जवाब देगा। यह जवाब क्षेत्रीय स्तर पर भी हो सकता है और वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर भी इसका असर पड़ सकता है।

देखा जाये तो ट्रंप का यह कदम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि साफ तौर पर सामरिक है। अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि उसकी मर्जी के बिना कोई भी देश वैश्विक व्यवस्था में स्वतंत्र भूमिका नहीं निभा सकता। यह नीति सहयोग से अधिक दंड और दबाव पर आधारित है, जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को और अधिक टकराव की दिशा में ले जा सकती है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ट्रंप का नया टैरिफ ऐलान खुला शक्ति प्रदर्शन है। यह उस सोच को दर्शाता है जिसमें अमेरिका खुद को वैश्विक पंच मानता है और बाकी दुनिया को आदेश मानने वाला समूह। ईरान के बहाने यह फैसला असल में पूरी दुनिया को चेतावनी है कि जो देश अमेरिकी लाइन से हटेगा, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

यह नीति अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला है। किसी देश को उसके तीसरे देश से व्यापार करने पर सजा देना न तो नैतिक है और न ही कानूनी। यह कदम वैश्विक व्यापार व्यवस्था को कमजोर करता है और नियम आधारित व्यवस्था की जगह डर आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देता है। ट्रंप पहले भी टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं और अब एक बार फिर वही रास्ता चुना गया है।

भारत के लिए यह फैसला विशेष रूप से चिंता का विषय है। भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार भले ही बहुत बड़ा न हो, लेकिन उसका महत्व गहरा है। भारत ईरान को दवाएं, खाद्य सामग्री और औद्योगिक सामान भेजता रहा है, जबकि ईरान भारत के लिए ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से अहम रहा है।

यदि भारत ईरान के साथ व्यापार जारी रखता है तो उसे अमेरिका के साथ अपने निर्यात पर भारी टैरिफ झेलना पड़ सकता है। इससे भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे और उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता घटेगी। दूसरी ओर यदि भारत दबाव में आकर ईरान से दूरी बनाता है तो उसकी दीर्घकालिक सामरिक योजनाओं को झटका लगेगा। यह दोतरफा दबाव भारत के लिए आसान नहीं है।

इसके अलावा, चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं भारत की क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा हैं। यह परियोजना भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देती है और उसे वैकल्पिक व्यापार मार्ग प्रदान करती है। ईरान पर बढ़ता दबाव और अनिश्चितता इन परियोजनाओं को भी खतरे में डाल सकती है। इसके अलावा यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतें उछल सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर पड़ेगा।

हम आपको बता दें कि ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में भारत, चीन, तुर्किये, यूएई, पाकिस्तान और आर्मेनिया शामिल हैं। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, ईरान को भारत के प्रमुख निर्यातों में चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, कृत्रिम फाइबर, विद्युत मशीनरी और कृत्रिम आभूषण शामिल हैं जबकि ईरान से भारत के प्रमुख आयातों में सूखे मेवे, अकार्बनिक/कार्बनिक रसायन और कांच के बर्तन शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 में भारत से ईरान को निर्यात कुल 1.19 अरब डॉलर था जबकि भारत में आयात कुल 1.02 अरब डॉलर का हुआ था।

अब सवाल उठता है कि भारत को क्या करना चाहिए? भारत ईरान के पांच सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। अमेरिका ने पहले ही भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क लगा दिया है, जो दुनिया के किसी भी देश पर लगाए गए सबसे अधिक शुल्क में से एक है। इसमें भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल है। अब सवाल उठ रहा है कि अगर ईरान से व्यापारिक संबंध जारी रखने पर 25 प्रतिशत शुल्क और लगा तब क्या होगा? ऐसे में हम आपको बता दें कि ट्रंप का यह फैसला भारत के लिए पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी रणनीतिक टीम को इस बात का अंदाजा पहले से था कि ट्रंप किसी भी समय ईरान को लेकर ऐसा कठोर आर्थिक कदम उठा सकते हैं। इसी कारण भारत ने बीते महीनों में चुपचाप लेकिन सुनियोजित तरीके से वैकल्पिक तैयारियां शुरू कर दी थीं। ऊर्जा आपूर्ति के मोर्चे पर विविधीकरण किया गया, व्यापारिक जोखिम को सीमित करने के उपाय अपनाए गए और कूटनीतिक स्तर पर संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई। मोदी की विदेश नीति का मूल आधार यही रहा है कि किसी एक शक्ति केंद्र पर पूरी तरह निर्भर न रहा जाए। ट्रंप के इस ऐलान ने भले ही दबाव बढ़ाया हो, लेकिन भारत इस स्थिति में पूरी तरह खाली हाथ नहीं है। यह तैयारी दर्शाती है कि भारत अब प्रतिक्रियावादी नहीं, बल्कि पूर्वानुमान आधारित रणनीति के साथ वैश्विक राजनीति में कदम रख रहा है।

बहरहाल, यह स्पष्ट है कि ट्रंप का यह टैरिफ युद्ध केवल ईरान के खिलाफ नहीं है। यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चेतावनी है कि वैश्विक व्यवस्था अब और अधिक कठोर होने जा रही है। भारत के लिए यह समय सजग रहने का है, ताकि वह बदलते शक्ति संतुलन में अपने हितों की रक्षा कर सके और किसी भी एक ध्रुव की राजनीति का शिकार न बने।

All the updates here:

अन्य न्यूज़