'आसान जीत का जो सपना दिखाया था वो हकीकत क्यों नहीं बना'? फोन पर Netanyahu पर बुरी तरह भड़के JD Vance

हम आपको बता दें कि वेंस की भूमिका अब तेजी से बदल रही है। वह केवल उपराष्ट्रपति नहीं रह गए हैं, बल्कि ईरान के साथ संभावित वार्ता के मुख्य सूत्रधार बनते जा रहे हैं। वाशिंगटन के अंदरूनी हलकों में यह साफ संकेत है कि यदि कोई समझौता होगा तो वह वेंस के नेतृत्व में ही होगा।
अमेरिका और इजराइल के बीच तेजी से गहराता तनाव अब खुलकर सामने आ चुका है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हाल ही में फोन पर हुई तीखी बातचीत ने ईरान युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच की दरार को उजागर कर दिया है। यह ऐसा विस्फोटक संकेत है जो आने वाले समय में वैश्विक सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। सूत्रों के मुताबिक जेडी वेंस ने सीधे तौर पर नेतन्याहू को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि आखिर युद्ध से पहले जो आसान जीत का सपना दिखाया गया था, वह अब तक हकीकत क्यों नहीं बना? देखा जाये तो नेतन्याहू ने जिस तेजी से ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई थी, वह अब पूरी तरह हवा साबित होती दिख रही है। कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी ईरान की सत्ता पूरी मजबूती के साथ खड़ी है और वहां के कठोर रुख वाले गुट और अधिक संगठित हो चुके हैं।
यही वह बिंदु है जहां से इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व सामने आता है। अमेरिका को अब यह महसूस होने लगा है कि उसे एक ऐसे युद्ध में धकेला गया, जिसकी जमीन हकीकत से ज्यादा भ्रम पर आधारित थी। वेंस ने बातचीत के दौरान साफ कर दिया कि युद्ध के आकलन और वास्तविक स्थिति के बीच भारी अंतर है, और यह अंतर भविष्य में अमेरिका की वैश्विक साख को गहरा नुकसान पहुंचा सकता है।
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हम आपको बता दें कि वेंस की भूमिका अब तेजी से बदल रही है। वह केवल उपराष्ट्रपति नहीं रह गए हैं, बल्कि ईरान के साथ संभावित वार्ता के मुख्य सूत्रधार बनते जा रहे हैं। वाशिंगटन के अंदरूनी हलकों में यह साफ संकेत है कि यदि कोई समझौता होगा तो वह वेंस के नेतृत्व में ही होगा। यहां तक कहा जा रहा है कि अगर ईरान वेंस के साथ समझौता नहीं करता, तो फिर कोई समझौता संभव ही नहीं होगा।
यह स्थिति इजराइल के लिए भी असहज करने वाली है। एक ओर वह युद्ध को निर्णायक मोड़ तक ले जाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका अब पीछे हटने की रणनीति तलाश रहा है। यही रणनीतिक टकराव दोनों देशों के रिश्तों में दरार डाल रहा है। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि इजराइल के भीतर से ही वेंस को कमजोर दिखाने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनकी साख पर चोट पहुंचे और वार्ता प्रक्रिया प्रभावित हो।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और अहम पहलू है मध्यस्थ देशों की भूमिका। पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश इस संकट में सेतु बनने की कोशिश कर रहे हैं। इस्लामाबाद को संभावित वार्ता स्थल के रूप में भी देखा जा रहा है। यह संकेत देता है कि अब यह संघर्ष केवल दो देशों का नहीं रह गया, बल्कि एक बहुपक्षीय कूटनीतिक शतरंज में बदल चुका है।
रणनीतिक दृष्टि से सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर वार्ता विफल होती है तो आगे क्या होगा? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर कूटनीतिक रास्ता बंद हुआ तो ईरान के ऊर्जा ढांचे पर बड़े हमले किए जा सकते हैं। इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा, खासकर होरमुज जलडमरूमध्य पर, जहां से दुनिया की एक बड़ी तेल आपूर्ति गुजरती है। तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव इसी आशंका का संकेत है।
यह पूरा घटनाक्रम एक गहरी रणनीतिक सच्चाई को भी उजागर करता है। वह यह है कि आधुनिक युद्ध केवल मैदान में नहीं लड़े जाते, बल्कि उनकी असली लड़ाई आकलन, सूचना और कूटनीति के स्तर पर होती है। इजराइल का प्रारंभिक आकलन अगर गलत साबित हुआ है, तो यह उसकी खुफिया और रणनीतिक सोच पर भी सवाल खड़े करता है। वहीं अमेरिका के लिए यह एक चेतावनी है कि बिना ठोस आधार के किसी भी सैन्य अभियान में उतरना कितना महंगा पड़ सकता है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि जेडी वेंस और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई यह टकराहट महज एक बातचीत नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में उभरते नए समीकरणों की शुरुआत है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह तनाव एक बड़े समझौते का रास्ता खोलेगा या फिर दुनिया एक और भीषण टकराव की ओर बढ़ेगी?
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