बकरीद पर 'कुर्बानी' से शुरू हुई संकटमोचक की अग्नि परीक्षा, सिद्धारमैया ने जाते-जाते DK को कौन सा चुनौतीपूर्ण टास्क दे दिया?

डीके शिवकुमार की आँखें नम थीं और उन्होंने सिद्धारमैया के पैर छुए और दोनों नेता एक-दूसरे के गले लग गए। संयोग देखिए कि यह सब कुछ बकरीद के आसपास हो रहा है। एक ऐसा त्योहार जो अपनी सबसे प्रिय चीज़ की 'कुर्बानी और समर्पण' के लिए जाना जाता है। ऐसे में राजनीति के गलियारों में यह तीखी बहस छिड़ गई है कि इस मौके पर असल कुर्बानी किसने दी और किसे क्या मिला?
ईद उल अजहा जिसे भारत में आमतौर पर बकरीद के नाम से भी जानते हैं। दुनियाभर के मुसलमानों के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इस दिन खास नमाज अदा की जाती है और जानवरों की कुर्बानी भी होती है। लेकिन आज बात बकरीद की नहीं बल्कि राजनीति की करेंगे। दरअसल, कर्नाटक की सियासत में एक ऐसा अध्याय लिखा जा चुका है, जहाँ भावुकता और भारी राजनीतिक पैंतरेबाज़ी एक साथ देखने को मिली। डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, और सबसे दिलचस्प बात यह रही कि उनके नाम का प्रस्ताव खुद निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने रखा। इस फैसले के आते ही शिवकुमार के आवास के बाहर मानों कोई किला तैयार होने लगा। बैरिकेड्स लग गए और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। यह सब कुछ इडली, वड़ा और चौ-चौ बाथ से सजी एक 'ब्रेकफास्ट मीटिंग' के ठीक बाद हुआ। नाश्ते की मेज से उठते ही माहौल गहरे जज्बात में डूब गया। डीके शिवकुमार की आँखें नम थीं और उन्होंने सिद्धारमैया के पैर छुए और दोनों नेता एक-दूसरे के गले लग गए। संयोग देखिए कि यह सब कुछ बकरीद के आसपास हो रहा है। एक ऐसा त्योहार जो अपनी सबसे प्रिय चीज़ की 'कुर्बानी और समर्पण' के लिए जाना जाता है। ऐसे में राजनीति के गलियारों में यह तीखी बहस छिड़ गई है कि इस मौके पर असल कुर्बानी किसने दी और किसे क्या मिला?
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कुर्बानी किसने दी?
एक बेहद कद्दावर और जनाधार वाले नेता का खुद अपनी चलती-चलाती कुर्सी को छोड़ देना और खुद अपने हाथों से शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखना, राजनीति में एक बहुत बड़ी सियासी कुर्बानी है। कांग्रेस आलाकमान के इशारे पर तैयार किए गए इस पूरे दृश्य के जरिए ऑल इज वेल और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की गई है। राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने जिस तरह कुर्सी के लिए आलाकमान को पसीने ला दिए थे, सिद्धारमैया ने उससे बिल्कुल अलग मिसाल पेश की। उन्होंने आलाकमान के फैसले को सिर-आंखों पर रखते हुए हंसते-हंसते अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।
राहुल का बदला अंदाज
राहुल गांधी के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है वो यह है कि वह फैसले नहीं लेते मतलब स्टेटस को बनाए रखते हैं और उनका फैसला ना लेना भी एक तरीके से एक फैसला ही होता है। पर अब वे निर्णय लेने लगे हैं। फैसले का जोखिम जानते हुए भी कि पता नहीं इसके बाद क्या होगा। पार्टी का भला होगा या बुरा होगा। केरल के मुख्यमंत्री के लिए केसी वेणुगोपाल के बदले वीडी सतीशन को तरजीह देना। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय की समर्थन देने में भी उनकी अहम भूमिका रही और अब कर्नाटक में डीके शिवकुमार का पक्ष चुनकर कांग्रेस ने इन दिनों अलग तरह की राजनीतिक राह पकड़ी है। एक कहानी कांग्रेस के अंदर और बाहर भी चल पड़ी थी जिसको बीजेपी भी खूब हवा दे रही थी कि राहुल गांधी को राजनीति में बहुत दिलचस्पी नहीं है। वह फैसले नहीं लेते। खासतौर से जब बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बात फंसी तो राहुल गांधी के एक बयान की दबे-छिपे जुबान में खूब चर्चा हुई। दावा किया जाता है कि उन्होंने तेजस्वी यादव को कहा था कि टॉक टू वेणु यानी केसी वेणुगोपाल से बात कर लीजिए सीटों के शेयरिंग से मेरा क्या लेना देना है यानी जब बड़े फैसले की घड़ी होती थी तो राहुल के बारे में ये कहा जाता था कि वो कोई फैसला ही नहीं लेते थे। लेकिन इन दिनों एक नए राहुल गांधी जो ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं और सही समय पर ले रहे हैं सही समय अभी तो लग रहा है कल क्या होगा कह नहीं सकते पर राहुल ने साबित कर दिया है कि अब वह फैसले लेने वाले एक परिपक्व नेता देता है। इसे आप तीन फैसलों के जरिए समझ सकते हैं। सबसे पहले तमिलनाडु, फिर केरल और अब कर्नाटक तीनों फैसलों पर आने से पहले एक चीज जिस पर आप गौर करेंगे वो राहुल का लोकतांत्रिक तरीके से फैसले लेना।
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केरल के बाद अब कर्नाटक
ताजा मामला कर्नाटक का है। कर्नाटक पर फैसला लेने से पहले राहुल गांधी ने सबसे बात की। उन्होंने सिद्धारमैया और डीके शिव कुमार उन दोनों को दिल्ली बुलाया। उनसे बात करने से पहले उन्होंने संगठन में महामंत्री केसी वेणुगोपाल सेबातचीत की उसके बाद वहां के जो प्रभारी हैं जो राज्यसभा सांसद हैं रणदीप सुरजेवाला उनसे बात की। उसके बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे राय मशवरा करने के बाद ये निर्णय लिया। इसमें सबसे खास बात ये है कि उन्होंने कोई आदेश नहीं जारी किया। उन्होंने एक फार्मूला बनाया। केरल में सब जानते थे जो विधायकों की संख्या है मतलब मेजॉरिटी माना यही जाता है कि जो जितने विधायकों का समर्थन जिस नेता के पास होगा वही मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन उन्होंने बीडी सतीशन को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना क्योंकि वो जानते थे कि केरल में एक ऐसा मुख्यमंत्री हो जिसको चुना जाए और जिससे किसी तरीके से राहुल गांधी पर आरोप ना लगे। पूरे डेमोक्रेटिक तरीके से उन्होंने रमेश सैनीथल्ला से भी बात की।
बीजेपी वाली स्ट्रैटर्जी कांग्रेस ने अपनाई?
कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है और वहां इस वक्त जो हो रहा है, वह उसकी बदली हुई रणनीति का संकेत है। पार्टी अब जिस राजनीतिक मॉडल पर काम कर रही है, उसमें जहां कांग्रेस संगठन मजबूत है, वहां वह सीधा मुकाबला करेगी। लेकिन जहां स्थिति गठबंधन और क्षेत्रीय दलों की मदद लेगी। साथ ही, वह क्षेत्रीय नेतृत्व को भी मजबूत करेगी। कांग्रेस पिछले वर्षो में कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। इससे उसका आत्मविश्वास कमजोर हुआ है। पार्टी की चुनावी रणनीति बेअसर रही है। ऐसे में लगता है कि वह बीजेपी के रास्ते पर चलने जा रही है। बीजेपी देश में विस्तार के लिए कई तरीकों पर काम करती है। मसलन, जहां वह मजबूत है, वहां अकेले सरकार बनाना, कमजोर राज्यों में गठबंधन करना और फिर उस राज्य में पार्टी को मजबूत करके छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आना। जहां पार्टी मजबूत नहीं है, वहां विपक्ष के कद्दावर नेता को बीजेपी में शामिल करवाना और फिर उसे आगे करके चुनाव लड़ना। असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार में यही देखा गया और हिमंता बिस्वा सरमा, शुभेदु अधिकारी और सम्राट चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया। फिर बीच-बीच में नेतृत्व को बदलना ताकि हर कार्यकर्ता और नेता को मौका मिल सके और पार्टी को फायदा हो। अब कांग्रेस भी उसी पथ पर चलने की कोशिश कर रही है।
कास्ट सर्वे रिपोर्ट की टाइमिंग
कर्नाटक में बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के ठीक बीच, पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को बहुप्रतीक्षित कास्ट सर्वे रिपोर्ट सौंप दी। हालांकि, इस रिपोर्ट की टाइमिंग और इसका बैकग्राउंड बेहद पेचीदा है। यह रिपोर्ट काफी पुरानी है और दो साल पहले भी इसे लेकर राज्य में खासा विवाद हो चुका है। कर्नाटक के दो सबसे प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से मजबूत समुदायों वोक्कालिगा और लिंगायत ने इस रिपोर्ट पर ठीक वैसे ही सवाल उठाए हैं, जैसे बिहार की जातिगत गणना को लेकर अदालतों और राजनीतिक गलियारों में कठघरे में खड़ा किया गया था। दोनों ही प्रभावशाली समुदायों के नेताओं का साफ आरोप है कि यह सर्वे पुराना हो चुका है और इसे वैज्ञानिक तरीके से तैयार नहीं किया गया है। खुद वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए इस विवादित रिपोर्ट को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी। हंसते हुए विदा होने वाले सिद्धारमैया ने इस एक फैसले से शिवकुमार के सामने एक बेहद चुनौतीपूर्ण टास्क खड़ा कर दिया है।
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