राजा विक्रमादित्य और एचआर की महिमा (व्यंग्य)

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दीपक गिरकर । Oct 29 2019 4:26PM

इस विभाग के कर्मचारी-अधिकारी अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं। जिन व्यक्तियों की भर्ती पुलिस विभाग में होनी चाहिए उनकी भर्ती एचआर विभाग के सहयोग से या तो बैंकों में या शिक्षा विभाग में हो जाती हैं।

राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बैताल का शव पेड़ पर से उतार कर कंधे पर लादा और हमेशा की तरह अपनी राह पर चल पड़ा। कुछ समय पश्चात् बैताल ने कहा, ''राजन आज मैं तुम्हें एक किस्सा सुनाता हूँ, सुनो। एक राज्य है। उस राज्य के सरकारी और निजी सभी उपक्रमों में एक एचआर विभाग अर्थात् मानव संसाधन विभाग है। इस विभाग के मुख्य कार्य हैं- नए कर्मचारियों-अधिकारियों की भर्ती करना, उनकी पदस्थापना करना, उन्हें प्रशिक्षण दिलवाना, उनकी पदोन्नति करवाना और उनके स्थानांतरण करवाना। आप को तो मालूम है राजन, एचआर विभाग की महिमा अपरम्पार है। इस विभाग के कर्मकांडी खटरागी होते हैं। इस विभाग का काम बहुत गोपनीय होता है और हर ऐरे-गैरे की नजर इन पर और इनके महत्वपूर्ण कार्यों पर न पड़े, इसी वजह से सभी उपक्रमों में एचआर विभाग सामने की तरफ नहीं होता है बल्कि यह विभाग कार्यालय की बिल्डिंग में काफी अंदर की तरफ होता है।

इस विभाग के कर्मचारी-अधिकारी अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं। जिन व्यक्तियों की भर्ती पुलिस विभाग में होनी चाहिए उनकी भर्ती एचआर विभाग के सहयोग से या तो बैंकों में या शिक्षा विभाग में हो जाती हैं। कभी-कभी एचआर अपने विभाग का परफॉरमेंस बताने के लिए नए कर्मचारियों-अधिकारियों की थोक में भर्ती करके उन्हें सुरक्षित स्थान पर डंप करके छोड़ देता है। जिन कर्मचारियों की योग्यता बड़े बाबू के लायक भी नहीं होती है, एचआर विभाग के सहयोग से पदोन्नत होकर वे उच्च प्रबंधन में शामिल हो जाते हैं। उपक्रम में नए नियुक्त अनुभवहीन अधिकारियों की एचआर विभाग द्वारा महत्वपूर्ण पदों पर पोस्टिंग की जाती है। उपक्रम में जिनके कोई गॉड फादर नहीं होते हैं, एचआर में पदस्थ कर्मयोगियों की चरणवंदना नहीं करते हैं और रात-दिन उपक्रम की उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने में जी जान से लगे रहते हैं एचआर ऐसे कार्योन्मादी लोगों के स्थानांतरण प्रतिवर्ष करता है और जिन कर्मठ दरबारियों के गॉड फादर हैं और जो काम की अपेक्षा दिन भर चाटुकारिता में लगे रहते हैं वे ही अंगद की तरह अपने पैर जमाए कई वर्षों से एक ही सीट पर जमे रहते हैं, एचआर ऐसे स्टाफ से पंगा नहीं लेता है।

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राजन, जब किसी कर्मचारी या अधिकारी को एक ही सर्किल या जोन में कार्य करते हुए अधिक वर्ष हो जाते हैं तो एचआर विभाग ऐसे कर्मचारियों-अधिकारियों के स्थानांतरण एक सर्किल / जोन से दूसरे सर्किल / जोन में करता है तब स्थानांतरित होकर आने वाले ऐसे कर्मचारी-अधिकारी पार्किंग एरिया में एक लंबे समय तक पड़े रहते हैं। राजन, एचआर विभाग के कर्मयोगी सुबह कार्यालय में जल्दी आ जाते हैं और रात में देर तक कार्यालय में रहते हैं। दिन भर ये इतने अधिक व्यस्त रहते हैं या व्यस्त रहने का नाटक करते हैं कि अन्य विभागों के कर्मचारी-अधिकारी इनसे बातचीत नहीं कर पाते हैं। एचआर विभाग के पास तो बहुत सारे काम रहते हैं। कभी-कभी तो एचआर विभाग पार्किंग में पड़े कर्मचारियों-अधिकारियों को भूल जाता है। पार्किंग एरिया में रहने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों को प्रतिदिन सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी होती हैं। फिर कुछ महीनों पश्चात् सर्किल / जोन के पार्किंग एरिया से इन्हें अलग-अलग क्षेत्र के कार्यालयों में पार्क किया जाता हैं। क्षेत्रीय कार्यालय के एचआर विभाग के पास सर्किल / जोन के एचआर विभाग से काम का बोझ अधिक होता है, इनके पास काम की अधिकता होना स्वाभाविक है क्योंकि इनको सर्किल / जोन के एचआर विभाग से लगातार दिशा निर्देश प्राप्त होते रहते हैं और इनसे अलग-अलग फॉर्मेट में कई तरह की जानकारी मांगी जाती हैं। अपने हाथ के काम से फुर्सत मिलने के पश्चात् इन्हें पार्किंग में पड़े कर्मचारियों-अधिकारियों की याद आती है तब ये उनकी पदस्थापना करते हैं।

राजन, एचआर विभाग के अंतर्गत सारे प्रशिक्षण केंद्र और स्टाफ कॉलेज आते हैं। इन प्रशिक्षण केंद्रों और स्टाफ कॉलेजेस के टारगेट पूर्ण करने की जवाबदारी एचआर में तैनात कर्मवीरों के मजबूत कंधों पर होती है। ये एचआर के पुरुषार्थी उपक्रम में कार्यरत कर्मचारियों-अधिकारियों को ऐसे-ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में भिजवाते हैं जिनका उन कर्मचारियों-अधिकारियों के कार्य से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता है। जैसे उत्पादन में काम करने वालों को बिक्री का, एचआर विभाग में काम करने वालों को बैंक फाइनेंस का, पैकेजिंग में काम करने वालों को प्रशासनिक विभाग का प्रशिक्षण दिलवाया जाता है। बैंक और वित्तीय संस्था जैसे उपक्रमों में फॉरेन एक्सचेंज में काम करने वालों को कृषि वित्त की, गाँव की छोटी शाखा में काम करने वालों को बड़े लोन की ट्रेनिंग दिलवा दी जाती है। प्रशिक्षण केंद्रों और स्टाफ कॉलेजेस में ऐसे दक्ष अधिकारियों की फैकल्टीज के पद पर पदस्थापना की जाती है जिन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान होता है।

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राजन, एचआर विभाग में ज्वाइन किये नए रंगरूटों में भी अपार शक्ति का संचार हो जाता है। एचआर धुरंधर कर्मचारियों-अधिकारियों की लू उतार कर रख देता है अर्थात् उन्हें रोने को मजबूर कर देता है। इस विभाग की वजह से प्रमोशन होने के बाद भी कई महीनों तक पोस्टिंग नहीं हो पाती है। एचआर की कारस्तानियों की वजह से कुछ ही कर्मियों के अलावा सभी दुखी और भयभीत हैं। राजन, व्यवसाय-उद्योग के उपक्रमों के उच्च प्रबंधन सशक्त हों या न हों लेकिन एचआर में पदस्थ हुए नए कर्मचारी भी काफ़ी बोल्ड हैं। उपक्रमों के अन्य विभागों के कर्मचारी-अधिकारी एचआर विभाग के कर्मियों की चरणवंदना करते रहते हैं। 

थोड़ी देर मौन रहने के बाद बैताल ने अपना मुँह फिर से खोला राजन, ''मैं इस किस्से से संबंधित कुछ प्रश्न पूछूँगा, यदि मेरे प्रश्नों के उत्तर तुमने नहीं दिए तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। पहला प्रश्न है कि एचआर विभाग हमेशा विवादों के केंद्र में क्यों रहा है ? एचआर विभाग के कर्मशूरों को किसी को भर्ती करने का, पदोन्नत करने का, पोस्टिंग और स्थानांतरण करने का अधिकार नहीं है तो अन्य विभागों के कर्मचारी-अधिकारी इनसे इतने अधिक भयभीत क्यों रहते हैं और वे इनकी चाटुकारिता क्यों करते हैं? मेरा दूसरा प्रश्न है कि एचआर विभाग के कर्मवीर अनुचित व्यक्तियों की भर्ती, अयोग्य कर्मियों की पदोन्नति, कार्यक्षेत्र से असंबंधित प्रशिक्षण, अनुचित पोस्टिंग और स्थानांतरण जैसी हरकतें करते हैं तब प्रशासन विभाग के कर्मचारी-अधिकारी और उच्च प्रबंधन में बैठे महाज्ञानी क्या महसूस करते हैं? मेरा तीसरा प्रश्न है कि एचआर विभाग के कर्मवीर इतने अधिक व्यस्त क्यों रहते है? क्या इन पर काम का अत्यधिक बोझ है? मेरा चौथा और अंतिम प्रश्न है कि राजन, आज के समय में कर्मचारियों-अधिकारियों की कार्यकुशलता, उत्पादकता में वृद्धि के लिए क्या प्रबंधन ने मानव संसाधन विकास के लिए अधिक निवेश करना चाहिए?”

राजा विक्रमादित्य कुछ समय तक तो अपने सिर को खुजलाते रहे और कुछ ही समय में उनके ज्ञान चक्षु खुल चुके थे। उन्होंने पहले प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया। ''यह सत्य है कि नए कर्मचरियों-अधिकारियों की भर्ती, कर्मचारियों-अधिकारियों की पदोन्नति, पोस्टिंग और उनके स्थानांतरण करने के अधिकार एचआर विभाग के पास नहीं है, इस विभाग को तो सिर्फ अपने सुझाव और अनुशंसाएं प्रशासन और उच्च प्रबंधन को देने होते हैं। इतना ही इनका कार्यक्षेत्र है। निर्णय लेने का अधिकार प्रशासन विभाग और उच्च प्रबंधन का है। लेकिन प्रशासन विभाग और उच्च प्रबंधन अपनी व्यस्तताओं के कारण या इन बड़े अधिकारियों को इतना अधिक ज्ञान प्राप्त हो जाता हैं कि वे इन छोटे-छोटे कार्यों से ऊपर उठ चुके होते हैं। उपक्रम में ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारी एचआर विभाग पर ही पूरी तरह से निर्भर हो जाते हैं और यदि ये ऊँचे पदों पर बैठे प्राधिकारी कभी भर्ती, पदोन्नति, पदस्थापना और स्थानांतरण सूचियों में कुछ परिवर्तन या फेरबदल करवाने की इच्छा रखते हों तब एचआर विभाग के पुराने घाघ इन सूचियों को काफी समय तक लटकाए रखते हैं और सूचियों में बिना फेरबदल किये ऐसे समय में अपने विभाग के बॉस और प्रशासन विभाग के अधिकारियों की चिड़ियाएँ बिठवा कर सक्षम प्राधिकारी के हस्ताक्षर करवाते हैं जब ये अधिकारी अपनी ब्रीफ़केस उठाकर कार्यालय से घर की ओर या अपने बड़े बॉस के कार्यालय की तरफ कूच कर रहे होते हैं। एचआर विभाग को सामान्य बोलचाल की भाषा में टांग-खेंचू विभाग कहा जाता है। उपक्रम के अन्य विभागों में कार्यरत कर्मचारियों-अधिकारियों को अच्छी तरह से मालूम है कि यदि पदोन्नति पानी है और अच्छी जगह या अपनी मनपसंद जगह पर स्थानांतरण करवाना है तो परफॉरमेंस और योग्यता का कोई मतलब नहीं है, सिर्फ एचआर विभाग में पदस्थ कर्मवीरों की चरणवंदना से ही मनमाफिक फल की प्राप्ति संभव है।

राजा ने दूसरे प्रश्न का उत्तर इस तरह दिया ''प्रशासन विभाग के कर्मचारी-अधिकारी और उच्च प्रबंधन में बैठे महाज्ञानियों का समय कीमती है। उन्हें वास्तव में ज्ञान प्राप्त हो चुका है। उनकी सोच है कि सभी को अपनी-अपनी किस्मत और भाग्य का मिलता है। किसी को भी मेहनत का फल समय से पूर्व नहीं और किस्मत से अधिक नहीं मिलता है। इसलिए ये महाज्ञानी एचआर विभाग के कार्य में दखलंदाजी नहीं करते हैं।”

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राजा विक्रमादित्य ने तीसरे प्रश्न का उत्तर दिया- “शादी जैसे मांगलिक कार्यों में आपने देखा होगा कि दूल्हे के फूफाजी सबसे अधिक व्यस्त दिखते हैं। ऐसे व्यक्तियों को बिजी विदाऊट वर्क कहते हैं। इसी प्रकार इस एचआर विभाग में कार्यरत स्टाफ काम के बोझ से लदे होने का और व्यस्त रहने का नाटक करते हैं। इस विभाग के पुराने चावल काफी चतुर सुजान होते हैं। उन्हें मालूम है कि कार्यालय कब आना है, कार्यालय से घर कब जाना है, कब कौन-सा काम करना है और कब सक्षम प्राधिकारी अधिकारी के हस्ताक्षर लेने हैं। इस विभाग में कर्मचारियों-अधिकारियों की प्रोफाइल अपडेट का कार्य सालभर चलता रहता है। एचआर विभाग उपक्रम में कार्यरत स्टाफ की परफॉरमेंस रिपोर्ट के फॉर्मेट में प्रतिवर्ष बदलाव कर देता है। राजा ने चौथे और अंतिम प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया ''वैसे तो राजन, अभी तक जितने भी सर्वे हुए हैं उनका यही निष्कर्ष निकला है कि एचआर में अधिक निवेश से एचआर के चक्रव्यूह में उलझे कुशल बंधुआ मजदूरों की कार्यकुशलता, उत्पादकता में कमी हुई है और उपक्रमों को घाटा हुआ है क्योंकि निवेश मानव संसाधन विकास में होने की जगह एचआर विभाग को उन्नत बनाने में हुआ है जिससे एचआर विभाग पंच-सितारा सुविधाओं से सुसज्जित हो गया है और इस विभाग के कर्मचारी-अधिकारी ऐशो-आराम से कार्यालय में अपना समय व्यतीत करते हैं। इसलिए प्रबंधन को मानव संसाधन विकास में निवेश कम कर देना चाहिए जिससे उपक्रमों का घाटा कुछ हद तक तो कम होगा और स्टाफ को तनख्वाह समय पर मिलती रहेगी।'' राजा विक्रमादित्य का उत्तर सुनते ही बैताल का शव फिर से उसी पेड़ पर लटक गया। राजा वापस गया और बेताल को लेकर चल दिया। बेताल बोला, ''राजन तुम बहुत चतुर हो लेकिन एचआर विभाग के स्टाफ से अधिक नहीं।”

-दीपक गिरकर

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