बर्फ में मटकने के दिन आ गए (पर्यटन फीचर)

बर्फ में मटकने के दिन आ गए (पर्यटन फीचर)

लोक सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार मकर सक्रांति पर बर्फ का गिरना शुभ माना जाता है। बर्फ कभी भी गिरे, पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बेहद ज़रूरी है। बर्फ गिरकर पहले तो पौधों के लिए गोबर यानी खाद का काम करती है फिर पिघलकर नदी का हिस्सा हो जाती है।

सावधानी व सतर्कता के साथ घुमक्कड़ों के दिमाग में यात्राएं उगनी शुरू हो चुकी हैं। कितनों के दिलों में बरसों से यह देखने की तमन्ना है कि बर्फ कैसी होती, आसमान से कैसे गिरती है और तिस पर कैसे मज़े लेते, चलते और फिसलते हैं। हज़ारों किलोमीटर दूर से मनाली, शिमला, श्रीनगर, में पर्यटक आते हैं, कई कई दिन इंतज़ार करते हैं रूईनुमा फाहों को आसमान से उतरते हुए देखने का, उन्हें हाथ से छूने का, अपनों पर बर्फ के गोले दागने का, सफ़ेद गालीचे पर मटकने, फिसलने, गिरने का। कुदरत मेहरबान हो जाए तो सपने सच और जीवन सफल हो जाता है। कितनी बार ऐसा होता है वे वापिस जा रहे होते हैं और बर्फ आसमान से उतर रही होती है। हनीमून पर उमड़े जोड़ों का दिल गार्डन गार्डन हो उठता है तो दुकानदारों की आखों में नोटों की चमक झिलमिलाने लगती है। उत्कंठा के शिखर पर होता है पर्यटक मन, विशेषकर उनका जिन्होंने बर्फ का परिचय किताबों, चित्रों, विडीयोज़ या फिल्मों से पाया है। 

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स्थानीय बाशिंदों को आभास हो गया है, अब बर्फ गिर सकती है। प्रकृति ने बर्फ के स्वागत के लिए, मौसम में तापमान के सही तालमेल की आगोश तैयार कर ली है। पहाड़वासी मन ही मन पारम्परिक स्वागत गीत गा रहे हैं। कुदरत का संकेत संप्रेषित होते ही आसमान से जैसे ही पवित्र सफेद स्वर्गिक परिन्दे सहज और सौम्य अंदाज़ में धरती पर उतरते हैं, सिर के बाल, कंधों एवं हाथों पर टिकते फिसलते गिरते हुए अपनी जादुई उपस्थिति से तन और मन आनंदित कर देते हैं। पहाड़ियों के समतल हिस्सों पर लगता है जैसे कुदरत ने सफेद नरम कालीन बिछा दिए हों। बर्फ से एकाकार होने का असली मज़ा तो खुले ग्रामीण अंचल में है जहां पहाड़, खेत, वृक्ष, घर, पत्थर, घास, कहिए हर चीज़ पर बर्फ यूं ठहर जाती है मानो पिंजी हुई रूई के फाहे करीने से सजा दिए हों। बर्फ गिरते देखना प्रकृति का अनूठा, मौन संगीत सुनने व देखने जैसा ही है, किसी तरह का कोई शोर नहीं मगर गति कभी धीमी तो कभी तेज़। पहली बार यह दिव्य नज़ारा देखने वाला सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता।

बच्चे ही नहीं युवा, प्रौढ़ कहिए सभी पुराना खेल खेलने लगते हैं और निर्मल आनंद नाचने लगता है। कोई गुड़िया, गुड्डा या रोबोट बनाने लगता है तो कोई जोकर या नेता। बर्फ के गिरते इठलाते फाहों के बीच मस्ती करना सभी को भाता है। विशेषकर नवविवाहितों के लिए तो बर्फ का सामीप्य रोमांस में ग़ज़ब की गर्मजोशी भर देता है। नवविवाहितें जब अपने जीवनसाथी की आगोश में आती हैं तो उनका बर्फ पर एक साथ मादक अन्दाज़ में चलना, मटकते, गिरते हुए एक दूसरे को सम्भालना, चूमना, स्लैज या बर्फ पर घिसटने वाली गाड़ी पर बैठकर या स्नोस्कूटर पर फिसलना उनके प्यार की मस्ती उनके रोमरोम को पुलकित कर देती है। बर्फ की दीवारों व चमकते मैदानों के बीच रिश्तों की मदमाती गर्माहट में मनपसन्द आईसक्रीम का लुत्फ उठाना नया मज़ा पैदा कर देता है। कैमरा यहां बेहद सक्रिय व महत्त्वपूर्ण दोस्त की भूमिका निभाता है। बर्फ अपना  आँचल बिछाती है तो बर्फ खेल प्रेमी अपना साज़ो सामान इकठ्ठा कर गर्म पोशाकें, रंगीन टोपियां ओढ़ सोलंग नाला, कुफरी, नारकंडा, औली, गुलमर्ग जैसे प्रसिद्ध स्कीइंग प्वांइटस की तरफ रूख करते हैं। यहां वे पर्यटकों को भी स्कीइंग सीखने का अनुभव देते हैं और स्वंय भी राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मुकाबलों का हिस्सा बनते हैं।

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लोक सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार मकर सक्रांति पर बर्फ का गिरना शुभ माना जाता है। बर्फ कभी भी गिरे, पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बेहद ज़रूरी है। बर्फ गिरकर पहले तो पौधों के लिए गोबर यानी खाद का काम करती है फिर पिघलकर नदी का हिस्सा हो जाती है। जल से पहाड़ियों का ही नहीं मैदान में रहने वालों की प्यास भी बुझती है। दुखसुख एक साथ लाने वाली बर्फ में, कहते हैं सपन्न किसान लम्बी तान कर सोता है और निर्धन को दो जून की रोटी के लिए हाट घराट की चिंता सताती है। ग्लोबल टैम्परेचर बढ़ता जा रहा है फिर भी बता रहे हैं इस बार सर्दियों के मौसम में ठिठुरन खूब होने वाली है। पर्यावरण समृद्ध करने के लिए  ज्यादा पेड़ पौधे लगें ऐसा प्रयास हम कर सकें या नहीं मगर जीवन की भागदौड़ से छिटककर, मां प्रकृति की गोद में, बर्फीले क्षेत्रों के आंगन में ज़िन्दगी की खुशियों का उन्मुक्त आनंद उत्सव तो मना ही सकते हैं।

बर्फ बुला रही है। आइए बर्फ में कूदने, फुदकने व मटकने का आनंद लेने के लिए अपनी मदद आप करें। 

- संतोष उत्सुक