ऑस्ट्रेलिया का चुनाव: चीनी जहाज की जासूसी, जिनपिंग का पोस्टर, मोदी संग दोस्ती की दुहाई, क्या स्कॉट मॉरिसन बचा पाएंगे कुर्सी?

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Prabhasakshi
अभिनय आकाश । May 19, 2022 6:05PM
ऑस्ट्रेलिया में चुनाव है और चीन व उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चर्चा खूब तेज हैं। इसके साथी ही पीएम मोदी संग अखंड दोस्ती के चर्चे भी ऑस्ट्रेलिया के चुनाव में प्रमुखता से देखने को मिल रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया में इन दिनों चुनावी सरगर्मी तेज है। 21 मई को ऑस्ट्रेलिया के लोग अपनी नई सरकार का चयन करेंगे। प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की लिबरल पार्टी और सहयोगी दल लगातार चौथी बार चुनाव जीतने की कवायद में लगी है। स्कॉट मॉरिसन के खिलाफ लेबर पार्टी के उम्मीदवार एंथनी अल्बनेसी मैदान में हैं। ऑस्ट्रेलिया में चुनाव  है और चीन व उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चर्चा खूब तेज हैं। इसके साथी ही पीएम मोदी संग अखंड दोस्ती के चर्चे भी ऑस्ट्रेलिया के चुनाव में प्रमुखता से देखने को मिल रहे हैं। ऐसे में आज हम ऑस्ट्रेलिया में कैसे चुनाव होता है। प्रधानमंत्री चुनने का पूरा प्रोसेस क्या है। कौन-कौन प्रमुख उम्मीदवार मैदान में हैं। चीन की ऑस्ट्रेलिया के चुनाव में इतनी चर्चा क्यों हो रही है और 21 मई के बाद चुनावी नतीजों से क्या कुछ बदल जाएगा, इसकी बात करेंगे। 

ऑस्टेलिया में पीएम चुनने की प्रक्रिया

जैसे भारत में राज्यसभा और लोकसभा होती है वैसे ही ऑस्ट्रेलिया की संसद में दो सदन हैं, एक ऊपरी जिसे सेनेट कहा जाता है। इसमें 76 सदस्य होते हैं। वहीं निचले सदन को हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स के नाम से जाना जाता है। निचले सदन में 151 सदस्य हैं। प्रधानमंत्री निचले सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। बहुमत के लिए 76 सीटों की दरकरार होती है। आम स्थिति में हर तीन वर्ष में संसदीय चुनाव का चलन है। बर्शते बीच में संसद भंग ना हुई हो। 21 मई को होने वाले निचले सदन की सभी 151 सीटों और ऊपरी सदन की आधी सीटों के लिए वोटिंग होगी। ऊपरी सदन का कार्यकाल छह साल का होता है। जिसके पीछे की वजह है कि ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि 3 साल के बाद आधे सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो जाता है। जनता दोनों को चुनने के लिए वोट डालती है।

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वोटिंग अनिवार्य नहीं तो लगेगा फाइन

ऑस्ट्रेलिया में 18 से अधिक उम्र के लोग वोट डाल सकते हैं। इसमें सबसे दिलचस्प बात ये है कि ऑस्ट्रेलिया में 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को वोट डालने की अनिवार्यता है। वोटिंग रजिस्टर में नाम दर्ज नहीं कराने या वोट ना डालने पर जुर्माने का भी प्रावधान है। पहली बार की गलती के लिए 15 सौ रूपये का फाइन, इसकी अधिकतम राशि 15 हजार तक की है। 1922 के संसदीय चुनाव में 59 प्रतिशत ही वोटिंग होने के बाद सरकार इस तरह के नियम लेकर आई। जिसमें समय के साथ बदलाव भी हुए। पहले 21 साल वोटिंग की आयु हुआ करती थी जिसे बाद में घटाकर 18 कर दिया गया। 2022 के चुनाव के लिए 17.2 मिलियन से अधिक लोग पात्र मतदाता के रूप में दर्ज हैं। यानी वोटिंग प्रतिशत 96 प्रतिशत के करीब रहा।  ऑस्ट्रेलिया में राष्ट्रीय चुनावों के लिए कोई निर्धारित तिथि नहीं है, लेकिन प्रतिनिधि सभा के लिए अधिकतम कार्यकाल तीन वर्ष है।

वर्तमान में कौन सत्ता में है?

लिबरल-नेशनल गठबंधन के पास प्रतिनिधि सभा में 76 सीटें हैं और वो वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में सरकार चला रही है। लेबर पार्टी के पास 68 हैं और सात अन्य सीटों पर छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों का कब्जा है। संसद के ऊपरी सदन सीनेट में, गठबंधन के पास 35 सीटें हैं और लेबर के पास 26 हैं।

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प्रधानमंत्री की रेस में कौन-कौन?

स्कॉट मॉरिसन: मैल्कम टर्नबुल से पदभार संभालने के बाद स्कॉट मॉरिसन 2018 से प्रधान मंत्री हैं। अगस्त 2018 में ऑस्ट्रेलिया की लिबरल पार्टी के नेता के रूप में  पदभार ग्रहण किया था। 2019 में स्कॉट मॉरिसन ने तमाम एग्जिट पोलों और विश्लेषकों के अनुमानों को धता बताते हुए जीत हासिल की थी।  मॉरिस के कार्यकाल में कोविड पर ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रिया के कारण यह विश्व स्तर पर सबसे कम मृत्यु दर वाले देशों में से एक रहा। लेकिन अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों और अन्य लोगों द्वारा अपने चरित्र की आलोचना के बाद, प्रधानमंत्री को जनता की धारणा की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उप प्रधान मंत्री बरनबी जॉयस ने लीक हुए एक मेसेज में कहा था कि मॉरिसन पर कभी भरोसा नहीं किया। वह ढोंगी और झूठा है और यह मैंने लंबे वक्त से गौर किया है।

एंथोनी अल्बानीज:  मॉरिसन को लेबर लीडर एंथोनी अल्बानीज द्वारा चुनौती दी जा रही है। अल्बानीज ऑस्ट्रेलिया के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले राजनेताओं में से एक हैं और 2013 में केविन रुड के तहत कुछ समय के लिए उप प्रधान मंत्री थे। उन्होंने मुफ्त स्वास्थ्य सेवा के रक्षक, एलजीबीटी अधिकारों के पैरोकार, रिपबल्किन और डाईहार्ड रग्बी लीग फैन के रूप में ख्याति अर्जित की है। महज 33 साल की उम्र में वो साल 1996 में लेबर पार्टी की टिकट पर सिडनी सीट से जीतकर संसद पहुंचे। साल 2007 में जब केविन रूड की लेबर पार्टी सत्ता में आई तो अल्बनीज इंफ्रास्ट्रक्टर और ट्रांसपोर्ट मंत्री बनाए गए। पार्टी में अंदरुनी कलह की वजह से प्रधानमंत्री बदला गया और एंथनी अल्बानीज उप प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन उनका ये डिप्टी पीएम वाला कार्यकाल महज 10 हफ्ते का रहा। उनकी पार्टी अगले चुनाव में हार गई।

अन्य कई छोटे दल भी मैदान में: इसके अलावा भी कई नेता हैं जो अपनी छोटी पार्टियों का नेतृत्व कर रहे हैं। हालांकि इनमें किसी के भी प्रधानमंत्री बनने की संभावना न के बराबर है। इसमें ग्रीन पार्टी के नेता एडम बैंड्ट, वन नेशन पार्टी की नेता पॉलीन हैनसन और यूनाइटेड ऑस्ट्रेलिया पार्टी के हेड क्लाइव पामर का नाम शामिल है।

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ऑस्ट्रेलिया चुनाव के मुख्य मुद्दे क्या है?

महामारी के दौरान ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में मजबूती से वृद्धि हुई, और इस वर्ष इसके और 4.25% बढ़ने का अनुमान है। बेरोजगारी दर गिरकर 2008 के बाद सबसे निचला स्तर 4% हो गई। हालांकि, कई लोग ईंधन, बिजली और अन्य सामानों की बढ़ती कीमतों से चिंतित हैं। इसके साथ ही, ऑस्ट्रेलिया ने एक दशक में पहली बार ब्याज दरें बढ़ाई हैं। जलवायु परिवर्तन एक बढ़ती हुई चिंता है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने मार्च में ही में तेज बारिश, तूफान और बाढ़ के खराब अनुभव का सामना किया है। दोनों प्रमुख दलों ने 2050 तक निवल शून्य (नेट जीरो) कार्बन उत्सर्जन के राष्ट्रीय लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि, दोनों ने ऑस्ट्रेलिया के कोयला खनन उद्योग को समर्थन देने का भी वादा किया है। यह पर्यावरण के प्रति जागरूक मतदाताओं को ग्रीन्स जैसी पार्टियों की ओर धकेल सकता है।

कैसे डाले जाते हैं वोट?

ऑस्ट्रेलिया में चुनाव कराने की जिम्मेदारी ऑस्ट्रेलियन इलेक्टोरल कमीशन (एईसी) कमीशन के पास है। ऑस्ट्रेलिया में चुनाव पोस्टल बैलेट के माध्यम से होती है। जनता द्वारा सीधे प्रधानमंत्री को नहीं बल्कि सांसदों को चुना जाता है। बहुमत के 76 वाले आंकड़े को जो भी दल या गठबंधन छू ले वो अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना सकता है। अगर कोई व्यक्ति वोटिंग वाले दिन सेंटर पर नहीं जा सकता तो उसके लिए अर्ली वोटिंग की व्यवस्था है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसके लिए अलग से सेंटर बनाए जाते हैं। वहां तय तारीख पर जाकर वोट डाला जा सकता है। अगर आप फिर भी उपलब्ध न हो तो उनके लिए पोस्टल वोटिंग की भी व्यवस्था है। चुनाव आयोग मतदाताओं के घर तक भी पहुंच जाती है। मोबाइल पोलिंग पूरे चुनाव के दौरान चलती है। 

कब तक परिणाम का पता चलेगा?

परिणामों के चुनाव के दिन ही देर तक आने की संभावना है, लेकिन अगर मुकाबला करीब हुआ तो इसमें अधिक समय लग सकता है। अगर किसी बड़ी पार्टी को छोटे दलों या निर्दलीय सांसदों के साथ समझौता करना है तो बातचीत में कई दिन लग सकते हैं। 2010 में, जूलिया गिलार्ड को लेबर को सत्ता में लाने के लिए समर्थन प्राप्त करने में दो सप्ताह का समय लगा।जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लेबर इस बार नैरो बहुमत से जीतेगी। हालांकि, पिछले चुनाव में ये पोल्स गलत साबित हुए थे। 

चीन के जासूसी युद्धपोत

ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट के नजदीक चीनी जासूसी युद्धपोत को देखा गया है। यह युद्धपोत ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी समुद्री तट के नजदीक गश्त लगा रहा। ऑस्ट्रेलिया में 21 मई को आम चुनाव होने हैं। ऐसे में चीनी जासूसी जहाज का ऑस्ट्रेलियाई समुद्री तट के नजदीक गश्त लगाना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चीन ने पहले भी अपने एजेंट्स के जरिए ऑस्ट्रेलियाई चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की थी, लेकिन खुफिया एजेंसियों ने इस रैकेट का भंडाफोड़ कर दिया था। 

जिनपिंग के पोस्टर

ऑस्ट्रेलिया के आम चुनाव में राजनीतिक दलों के पोस्टरों पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का फोटो छाया हुआ है। विश्लेषकों के मुताबिक यह इस बात का संकेत है कि इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है। इस बहस के दौरान चीन को ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया गया है। विपक्षी लेबर पार्टी के नेता एंथनी अल्बानीज ने एक चुनावी भाषण मे कहा- ‘शी जिनपिंग ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के स्वरूप को बदल दिया है। अब ये पार्टी अधिक आक्रामक हो गई है। इसका ऑस्ट्रेलिया पर निश्चित प्रभाव पड़ेगा। इसलिए ऑस्ट्रेलिया को इसका जवाब अवश्य देना चाहिए।’

मोदी की दोस्ती के चर्चे

ऑस्ट्रेलिया में सात लाख भारतीय किंग मेकर भी भूमिका में हैं। मॉरिसन और अल्बानीज इन दिनों मंदिर-गुरुद्वारों में जाकर वोट मांग रहे हैं। अन्य पार्टियों के उम्मीदवार भी भारतीय समुदाय के बीच घूम-घूमकर वोट मांग रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के दो बड़े राज्य न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया में भारतीय समुदाय की सबसे अधिक आबादी है, जहां दो लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं। स्कॉट मॉरिसन ने कुछ दिन पहले भगवा स्कार्फ पहनकर हिन्दू कॉउन्सिल के कार्यक्रम में शिरकत की थी। प्रवासियों में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को देखते हुए मोदी के साथ अपनी अखंड दोस्ती की बात की।

 -अभिनय आकाश

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