रॉ का अफसर, ऑपरेशन ट्वायलाइट और मानेकशॉ की ट्रूप्स डिप्लॉय की आज़ादी, इस तरह आजादी के 28 साल बाद सिक्कम बना देश का हिस्सा

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अभिनय आकाश । May 18, 2022 6:19PM
रॉ के अधिकारी ने पीएन बनर्जी और गंगटोक में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के तहत तैनात अजीत सिंह स्याली को काम में लगाया। इस ऑपरेशन को ट्वालायट का नाम दिया गया। इसके साथ ही इस प्लान में सेना की एंट्री भी होती है।

आज का विश्लेषण शुरू करने से पहले आपको भारत का नक्शा दिखाऊंगा। आप कहेंगे कि इसमें नया क्या है। हमने तो ये नक्शा कितनी दफा देखा है। तो बता दें कि इस देश के नक्शे के स्वरूप में आने की कहानी कई किरदार और जद्दोजहद से होकर गुजरी है।  देश आजाद हुआ पंत्तियां, लाइनें, विभाजन रेखाएं खिंच गई। इधर भारत और उधर पाकिस्तान, लेकिन तब तक देश रियासतों में भी बंटा था।  इन रियासतों को भारतीय यूनियन के साथ लाने की और एक पूरा नक्शा बनाने की जरूरत थी। इस नक्शे को रूप देने का काम एक दिन में नहीं हुआ। ऐसा नहीं हुआ कि एक रोज मुल्क आजाद हुआ और हमने लाइनें खिंचनी शुरू कर दी। कुछ प्रांत तो ऐसे भी थे जिनके भारत में विलय के लिए दो से दिन दशक तक लग गए। ऐसा ही एक राज्य था सिक्कम। 16 मई 1975 को सिक्किम भारत संघ का 22वां राज्य बना। जबकि कई आधुनिक कथाओं में नामग्याल राजवंश के तहत भारतीय राज्य का दर्जा प्राप्त करने की वास्तविक कहानी 1970 के दशक के करीब शुरू होती है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल 1640 के दशक की घटनाओं का पता लगाकर ही समझी जा सकती है जब नामग्याल शासन था।

नामग्याल शासन के दौरान हमले

पहले चोग्याल (राजा) फुंटसोग नामग्याल से शुरू होकर, नामग्याल राजवंश ने 1975 तक सिक्किम पर शासन किया। एक समय पर  सिक्किम के राज्य में चुम्बी घाटी और दार्जिलिंग शामिल थे। 1700 के दशक की शुरुआत में इस क्षेत्र में सिक्किम, नेपाल, भूटान और तिब्बत के बीच संघर्षों का लंबा दौर देखने को मिला जिसके परिणामस्वरूप सिक्किम की क्षेत्रीय सीमाएं सिकुड़ गईं। जब अंग्रेज आए तो भारतीय उपमहाद्वीप में उनकी विस्तार योजनाओं में हिमालयी राज्यों को नियंत्रित करना शामिल था। इस बीच नेपाल राज्य ने अपने क्षेत्र का विस्तार करने के अपने प्रयासों को जारी रखा। इसके परिणामस्वरूप एंग्लो-नेपाली युद्ध (नवंबर, 1814 से मार्च, 1816) हुआ, जिसे गोरखा युद्ध भी कहा जाता है। ये युद्ध गोरखाली सेना और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ा गया था। भारतीय उपमहाद्वीप के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहाड़ी उत्तर के लिए दोनों पक्षों की महत्वाकांक्षी विस्तार योजनाएं थीं। 1814 में सिक्किम ने नेपाल के खिलाफ युद्ध अभियान में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ गठबंधन कर लिया। कंपनी ने नेपाल द्वारा 1780 के युद्ध में छीने गए कुछ क्षेत्रों को जीतकर सिक्किम को दे दिया। 

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परिवर्तन का दौर

सिक्किम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ ब्रिटिश भारत में एक सिविल सेवक जॉन क्लाउड व्हाइट की नियुक्ति के बाद आया। जिसे 1889 में सिक्किम का राजनीतिक अधिकारी नियुक्त किया गया था, जो मार्च, 1861 में हस्ताक्षरित त्युमलंग की संधि के तहत एक ब्रिटिश संरक्षक था। एसआरएम विश्वविद्यालय, अमरावती में उदार कला विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. उगेन भूटिया ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए इस घटना को लेकर कहा कि अंग्रेजों ने सिक्किम में नेपाली प्रवास को प्रोत्साहित किया और यह वास्तव में सम्राट की सहमति से नहीं हुआ। नामग्याल सम्राट अंग्रेजों द्वारा लिए गए निर्णयों की आलोचना नहीं कर सकते थे, लेकिन शासक ने नेपाली प्रवासियों के राज्य में इस आमद के बारे में शिकायत की थी। सम्राट बौद्ध था, और सिक्किम एक बौद्ध राज्य था। सिक्किम में नेपाली प्रवासी आबादी बढ़ रही थी। उनकी संख्या में वृद्धि का मतलब बौद्ध साम्राज्य में जनसांख्यिकीय बदलाव होता। इन सब के बीच अंग्रेजों द्वारा मोरांग प्रदेश में कर लागू करने के कारण सिक्किम और अंग्रेजी शासन के बीच संबंधों में कड़वाहट आ गयी। वर्ष 1849 में दो अंग्रेज़ अफसर, सर जोसेफ डाल्टन और डाक्टर अर्चिबाल्ड कैम्पबेल, जिस में से उत्तरवर्ती (डाक्टर अर्चिबाल्ड) सिक्किम और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंधों के लिए जिम्मेदार था, सिक्किम के पर्वतों में अनुमति अथवा सूचना के बिना जा पहुंचे। इन दोनों अफसरों को सिक्किम सरकार द्वारा बंधी बना लिया गया। नाराज ब्रिटिश शासन ने इस हिमालय वर्ती राज्य पर चढाई कर दी और इसे 1935 में भारत के साथ मिला लिया। इस चढाई के परिणाम वश चोग्याल ब्रिटिश गवर्नर के अधीन एक कठपुतली राजा बन कर रह गया।  

1947 के बाद का परिदृश्य

भारत की आजादी के वक्त सिक्किम एक अलग रियासत हुआ करता था। 1947 में सरदार पटेल चाहते थे कि बाकी रियासतों की तरह सिक्कम को भी भारत में विलय करा लिया जाए। लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू को उस वक्त चीन की फिक्र थी। इंदिरा गांधी द्वारा अपने सहायक पीएन धर को जिक्र किए गए वाक्या के अनुसार नेहरू चीन को लेकर रिश्तों में सावाधानी बरत रहे थे। उन्हें लगा कि अगर वो सिक्किम के मामले में रियासत देंगे तो चीन तिब्बत पर आक्रामक नहीं होगा। लेकिन उस समय के भू-राजनीतिक परिवर्तनों ने सिक्किम को नाजुक स्थिति में डाल दिया। 1949 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण और पूरे राज्य के इतिहास में सिक्किम पर नेपाल के हमलों को उन कारणों के रूप में उद्धृत किया गया, जिनकी वजह से राज्य को एक शक्तिशाली सहयोगी के समर्थन और संरक्षण की आवश्यकता थी और वो ताकतवर संरक्षक भारत से बेहतर भला कौन हो सकता था? आजादी के तीन साल बाद 1950 में भारत और सिक्किम के बीच एक ट्रीटी साइन हुई। जिसके अनुसार सिक्किम भारत का प्रोटेक्टोरेट राज्य बन गया। अब ये प्रोटेक्टोरेट राज्य क्या होता है? मतलब, राज्य तो राजा का होगा, लेकिन डिफेंस और विदेशी मामलों से जुड़े मुद्दे भारत सरकार की निगरानी में होगी। 1950 में, तत्कालीन सिक्किम सम्राट ताशी नामग्याल और सिक्किम में भारत के तत्कालीन राजनीतिक अधिकारी हरिश्वर दयाल के बीच इसको लेकर संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। 

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दलाई लामा का आगमन

मार्च 1959 में 14वें दलाई लामा तिब्बत से भाग निकले। दलाई लामा के भारतीय सीमाओं पर पहुंचने के बाद वह और उनके दल अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ में बस गए। एक महीने बाद उन्होंने मसूरी की यात्रा की और वहां तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की और उनके साथ आने वाले तिब्बती शरणार्थियों के भविष्य पर चर्चा की। दलाई लामा के स्वागत और शरण देने के भारत के फैसले के नतीजों ने सिक्किम में कुछ लोगों को संदेश दिया कि चीन के विपरीत, भारत के साथ गठबंधन करने से उनकी सुरक्षा की गारंटी होगी।

राजशाही के खिलाफ असंतोष

1950 और 1970 के बीच की अवधि ने सिक्किम में बढ़ते असंतोष को जन्म दिया। मुख्य रूप से बढ़ती असमानता और सामंती नियंत्रण के कारण राजशाही के खिलाफ लोगों में गुस्सा था। दिसंबर 1947 में, राजनीतिक समूह एक साथ आए और सिक्किम राज्य कांग्रेस का गठन किया, एक राजनीतिक दल जिसने सिक्किम के भारत संघ के साथ विलय का समर्थन किया। तीन साल बाद, सिक्किम नेशनल पार्टी का गठन किया गया जिसने राजशाही और राज्य की स्वतंत्रता का समर्थन किया। 1973 में राजशाही विरोधी विरोध तेज हो गया, जिसके बाद शाही महल हजारों प्रदर्शनकारियों से घिरा हुआ था। सम्राट के पास नई दिल्ली से सहायता भेजने के लिए कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहने के बाद भारतीय सैनिक पहुंचे। अंत में, उसी वर्ष चोग्याल, भारत सरकार और तीन प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। एक साल बाद, 1974 में चुनाव हुए, जहां काजी लहेंडुप दोरजी के नेतृत्व वाली सिक्किम राज्य कांग्रेस ने स्वतंत्रता-समर्थक दलों को हराकर जीत हासिल की। लेकिन ये असंतोष भारत से मदद और चुनाव और उसमें सिक्किम राज्य कांग्रेस की जीत, जो कुछ भी घटित हो रहा था वो इतना भी सरल नहीं था। इसके पीछे छिपा था खुफिया दिमाग, प्लानिंग और सैन्य मुस्तैदी। सिक्किम का भारत में विलय में  की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

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भारत ने सिक्कम को दिया परमानेंट एशोसिएशन का ऑफर

साल 1970 में भारत सरकार ने राजा चोग्याल को सिक्किम के लिए परमानेंट एशोसिएशन का स्टेटस ऑफर किया। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में जब इसको लेकर चर्चा हुई तो सेना अध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने कहा- आपको जो करना है करो, लेकिन सिक्कम में अपने टूप्स डिप्लॉय करने की मुझे पूरी आजादी चाहिए। 1971 के युद्ध के समाप्त होने के बाद इंदिरा गांधी ने अपना पूरा ध्यान सिक्किम पर लगा दिया। इंदिरा की मंशा थी कि सिक्किम को पूरी तरह भारत में मिला लिया जाए। जिसके लिए रॉ को इस काम में लगाया गया। नितिन गोखले कि किताब आरएन काओ जेंटलमैन स्पायमास्टर के अनुसार पीएम बनर्जी और आरएन काओ ने एक योजना बनाकर इंदिरा गांधी के सामने पेश किया। इस प्लान के तहत सिक्किम की लोकल राजनीतिक पार्टियों की सहायता से राजशाही को धीरे-धीरे कमजोर करने की बात कही गई। सिक्कम कांग्रेस के लीडर काजी लेनडुप दोरजी ने उस वक्त राजशाही के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी। 

ऑपरेशन ट्वालायट 

रॉ के अधिकारी ने पीएन बनर्जी और गंगटोक में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के तहत तैनात अजीत सिंह स्याली को काम में लगाया। इस ऑपरेशन को ट्वालायट का नाम दिया गया। इसके साथ ही इस प्लान में सेना की एंट्री भी होती है। सेना द्वारा सिक्किम में फ्लैग मार्च कराने के बारे में तय किया गया, जिससे लोकतंत्र समर्थक लोगों को ये संदेश जाए कि भारत उनके साथ है। 4 अप्रैल 1973 को घटी घटना ने भारत में सिक्किम के विलय का रास्ता और साफ कर दिया। दरअसल, इस दिन राजा चोग्याल अपना 50वां जन्मदिन मना रहे थे। सड़कों पर राजशाही के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहा था। इसी दौरान चोग्याल राजा के बेटे टेंजिंग राजभवन के रास्ते जा रहे थे और उन्हें प्रदर्शनकारियों ने बीच में ही रोक लिया। तब राजा के बेटे के गार्ड्स ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी जिसमें दो लोगों की जान चली गई। राजशाही विरोधी पार्टी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए चक्का जाम कर दिया। अगले कुछ दिनों तक हिंसा, लूट का ताडंव राज्य में देखने को मिला। मजबूरी में चोग्याल को भारत से मदद मांगनी पड़ी। 8 अप्रैल के दिन सिक्किम और भारत के बीच समझौता हुआ और भारत ने प्रशासनिक शक्तियां अपने हाथ में ले ली। एक अन्य समझौता के बाद राजा के पास केवल गार्डस् और महल शेष रह गए। 

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1974 का चुनाव

एक साल बाद, 1974 में, चुनाव हुए, जहां काजी लेंडुप दोरजी के नेतृत्व वाली सिक्किम राज्य कांग्रेस ने स्वतंत्रता-समर्थक दलों को हराकर जीत हासिल की। उस वर्ष, एक नया संविधान अपनाया गया, जिसने सम्राट की भूमिका को एक नाममात्र के पद तक सीमित कर दिया, जिसका पाल्डेन थोंडुप नामग्याल ने कड़ा विरोध किया। उसी वर्ष, भारत ने सिक्किम की स्थिति को संरक्षित राज्य से "संबद्ध राज्य" में अपग्रेड किया, इसे लोकसभा और राज्यसभा में एक-एक सीट आवंटित की। इस कदम के विरोध में, सम्राट ने इसके तुरंत बाद इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की। 

भारत में शामिल होने का निर्णय

8 अप्रैल के दिन ब्रिगेडियर दीपेंद्र सिंह के नेतृत्व वाली सेना की तीन टुकड़ी सिक्कम के राजभवन पहुंची। महज 20 मिनट के भीतर ही राजभवन को अपने कब्जे में ले लिया। जिसके बाद सिक्किम में विधानसभा की देख रेख में एक जनमत संग्रह हुआ जिसमें भारी बहुमत ने राजशाही को खत्म करने और भारत में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया। कुल 59,637 ने राजशाही को खत्म करने और भारत में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया, जिसमें से केवल 1,496 के खिलाफ मतदान हुआ। काजी लेंडुप दोरजी के नेतृत्व में सिक्किम की नई संसद ने सिक्किम को भारतीय राज्य बनने के लिए एक विधेयक का प्रस्ताव दिया, जिसे भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया। 16 मई 1975 को सिक्किम आधिकारिक रूप से भारत का 22वां राज्य बन गया। 

- अभिनय आकाश 

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