73 साल में पहली बार मिली ये जीत क्यों है खास, ऑल इंग्लैंड गोल्ड से लेकर थॉमस कप तक, जानें भारत के बैडमिंटन का इतिहास

badminton
Prabhasakshi
अभिनय आकाश । May 16, 2022 5:01PM
वर्ष 1934 के आसपास “बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन” की नींव रखी गयी और इस खेल के कई नियम बनाये गए। इस फेडरेशन के संस्थापक सदस्यों में आयरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड प्रमुख देश थे। वर्ष 1936 में ब्रिटिश भारत भी बैडमिंटन खेल के फेडरेशन का सदस्य बन गया था।

क्रिकेट की बात हम हमेशा करते हैं लेकिन आज बात बैंडमिंटन की करेंगे। बैडमिंटन में टीम इंडिया ने इतिहास रच दिया है। पिछले साल भारत ने ओलंपिक में इतिहास रचा था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीता। अब एक और बैरियर भारतीय टीम ने तोड़ा है। भारतीय शेरों ने बैडमिंटन के थॉमस कप के 73 साल के इतिहास में पहली बार चैंपियन का तमगा हासिल किया है। थॉमस कप जिसे बैडमिंटन का वर्ल्ड कप भी कह सकते हैं। लेकिन जैसे टेनिस में डेविस कप होता है वैसे ही बैडमिंटन में थॉमस कप होता है। ये टूर्नामेंट 1949 से चला आ रहा है। लेकिन ये इतना कठिन है कि इसे आज तक केवल इंडोनेशिया, चीन, डेनमार्क और मलेशिया जैसे छह देश ही जीत पाए हैं। आज से पहले इन्हीं देशों  का इस टूर्नामेंट में दबदबा रहा है। जिसे भारत ने खत्म कर दिया है। भारत छठी टीम है जिसने ये टूर्नामेंट जीता है। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि भारतीय टीम इतना आगे जाएगी। बस बैडमिंटन प्रेमियों की ये तमन्न था कि कम से कम एक मेडल तो भारत की झोली में आ जाए। लेकिन टूर्नामेंट जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया लोगों की उम्मीदें बढ़ती गईं। ग्रुप स्टेज खत्म कर जब भारतीय टीम ने क्वार्टर फाइनल जीता और सेमिफाइनल में पहुंची तभी इतिहास की किताबों में एक नया पन्ना जुड़ गया। थॉमस कप के फाइनल मैच में भारत ने इंडोनेशिया को 3-0 से हराकर इतिहास रच दिया है। भारत ने चौदह बार की चैंपियन टीम को पराजित किया है। इस टूर्मामेंट में भारत सिर्फ एक मैच हारा था। जब ग्रुप स्टेज में चीनी ताइपे ने उसे मात दी थी। 

इसे भी पढ़ें: मोदी सरकार के 'देसी Amazon' से टॉप ई कॉमर्स की मोनोपॉली होगी खत्म, लाखों किराना दुकानों को बचाने के लिए आया ONDC प्रोग्राम

भारत के बैडमिंटन के इतिहास से लेकर वर्तमान के दौर को देखे तो  हाल के वर्षों में साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, किदांबी श्रीकांत और अन्य जैसे वैश्विक सुपरस्टारों के उभरने से भारत में बैडमिंटन लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। लेकिन बैडमिंटन के खेल से भारत का नाता बहुत पुराना है। वास्तव में भारत ने बैडमिंटन को वैश्विक ख्याति के खेल के रूप में उभरने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। बैडमिंटन का खेल टैनिस से काफी मिलता जुलता है। जैसे क्रिकेट में बॉल और बैट मुख्य होते हैं, ठीक वैसे ही रैकेट और कॉक के बिना बैडमिटन खेला ही नहीं जा सकता है। 

बैडमिंटन का इतिहास

बैडमिंटन की सटीक उत्पत्ति कहां और कैसे हुई इस पर आज तक अस्पष्टता बनी हुई है। लेकिन प्राचीन भारत, चीन और ग्रीस के ऐतिहासिक अभिलेखों में शटलकॉक और रैकेट से जुड़े खेलों के संदर्भ मिलते हैं। ये उल्लेख लगभग 2000 साल पहले के हैं। मध्ययुगीन यूरोप में बैटलडोर और शटलकॉक नामक बच्चों का खेल, जिसमें खिलाड़ी यथासंभव लंबे समय तक हवा में एक छोटे पंख वाले शटलकॉक को रखने के लिए पैडल (बैटलडोर) का इस्तेमाल करते थे, काफी लोकप्रिय था। 17 वीं शताब्दी में यूरोपीय अभिजात वर्ग द्वारा खेला जाने वाला एक और समान खेल ज्यू डी वोलेंट था। 1870 के आसपास का समय ब्रिटिश अफसर बैडमिंटन से मिलते जुलते खेल को खेला करते थे जिसे शटलकॉक कहा जाता था। ब्रिटिश सेना के अधिकारियों ने खेल को अपने अनुकूल बनाने के लिए सबसे पहले नेट को जोड़ा और इसे पूना का नाम दिया। खेल के लिए बैडमिंटन नियमों का पहला अनौपचारिक सेट ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा भारत में बनाया गया था। इस खेल में कॉक की जगह ऊन से बनी गेंद का उपयोग किया जाता था। पहले इस खेल को अधिकतम 4 – 4 लोग खेला करते थे लेकिन बाद में इसे सिंगल्स और डबल्स में कर दिया गया। हालांकि, विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त खेल बनने के लिए रैकेट खेल का दशा-दिशा भारत से शुरू हुई थी।भारत में ब्रिटिश सैनिकों ने भी उससे प्रेरणा ली और हवा या गीली परिस्थितियों में खेल खेलते समय शटलकॉक के बजाय गेंदों का इस्तेमाल किया। बाथ बैडमिंटन क्लब, पहला समर्पित बैडमिंटन क्लब, 1877 में बनाया गया था और दस साल बाद क्लब ने भारत में गढ़े गए अनौपचारिक नियमों को फिर से लिखा। बाथ बैडमिंटन क्लब के नियमों ने आधुनिक बैडमिंटन के लिए रूपरेखा स्थापित की। बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंग्लैंड (बीएई) के छह साल बाद 1899 में भारतीय बैडमिंटन संघ (BAI) की स्थापना की गई थी। यह दुनिया के सबसे पुराने बैडमिंटन शासी निकायों में से एक है।

इसे भी पढ़ें: बदल गया पॉलिटिकल मैप और चुनाव का रास्ता हुआ साफ, हिंदुओं वाला जम्मू अब मुस्लिम बहुल कश्मीर पर भारी पड़ेगा?

 1936 में भारत बना बैडमिंटन खेल के फेडरेशन का सदस्य

 वर्ष 1934 के आसपास “बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन” की नींव रखी गयी और इस खेल के कई नियम बनाये गए। इस फेडरेशन के संस्थापक सदस्यों में आयरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड प्रमुख देश थे। वर्ष 1936 में ब्रिटिश भारत भी बैडमिंटन खेल के फेडरेशन का सदस्य बन गया था। बैडमिंटन 1992 के बार्सिलोना खेलों में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक का हिस्सा बन गया, जिसमें पुरुष एकल, पुरुष युगल, महिला एकल और महिला युगल स्पर्धाओं को रोस्टर में जोड़ा गया। 1996 में, मिश्रित युगल को सूची में जोड़ा गया था। दीपांकर भट्टाचार्य और यू विमल कुमार 1992 में बार्सिलोना में ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले पुरुष शटलर थे। मधुमिता बिष्ट इस आयोजन में भारत की एकमात्र महिला प्रतिनिधि थीं। भारत में 2016 में शुरू हुए बैडमिंटन ने प्रीमियर बैडमिंटन लीग (पीबीएल) के साथ फ्रेंचाइजी-आधारित खेल लीग का  चलन भी आगे बढ़ा।  

 क्या है थॉमस कप

जानकारी के लिए बता दें कि थॉमस कप एक टीम गेम होता है। जहां पूरी टीम को एकजुट होकर खेलना होता है। इसमें फिलहाल 16 टीमें पार्टिसिपेट करती हैं। बैडमिंटन खिलाड़ियों के लिए थॉमस कप टूर्नामेंट आयोजित करने का आइडिया सबसे पहले इंग्लिश बैडमिंटन प्लेयर सर जॉर्ज एलन थॉमस के दिमाग में आया था। वे खुद भी एक बेहतरीन बैडमिंटन खिलाड़ी थे। जॉर्ज एलन थामस की ख्वाहिश थी कि फुटबॉल वर्ल्ड कप और टेनिस के डेविस कप की तरह ही बैडमिंटन टूर्नामेंट भी होना चाहिए। इसके बाद पहली बार 1948-49 में थॉमस कप आयोजित किया गया। पहले यह टूर्नामेंट हर 3 साल में होता था, लेकिन 1982 के बाद से इसे 2 साल में आयोजित किया जाता है। भारतीय दल में शामिल खिलाड़ियों ने पूरी लगन औऱ मेहनत के बदौलत टीम को इस कामयाबी तक पहुंचाया। ऐसे में आपको बताते हैं कि कौन हैं वो सितारें जिन्होंने भारत को गौरवान्वित किया है। लक्ष्य सेन ने मेन्स सिंगल कैटेगरी में, सात्विक साइराज, रंकित रेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने मेन्स डबल वर्ग में और किडंबी श्रीकांत ने मेन्स सिंगल वर्ग में अपने-अपने मैच जीते हैं। 

इसे भी पढ़ें: यूपी-बिहार तो यूं ही है बदनाम, पूरे भारत में सबसे ज्यादा इस प्रदेश में है जातिवाद की राजनीति का बोलबाला

वर्षों से प्रतिष्ठित भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी

भारत में हर खेल के अपने नायक हैं और बैडमिंटन इससे अछूता नहीं है। इन शटलरों ने अपने देश को वैश्विक बैडमिंटन मानचित्र पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। 

प्रकाश पादुकोण

प्रकाश पादुकोण शायद भारत में बैडमिंटन के इतिहास में पहले सुपरस्टार थे। पादुकोण 1980 में प्रतिष्ठित ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने वाली पहली भारतीय थीं और पुरुषों की विश्व रैंकिंग में नंबर 1 पर पहुंचे थे। वो बैडमिंटन में भारत के पहले राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता भी रहे, जिन्होंने 1978 में पुरुष एकल स्पर्धा जीती थी। दिग्गज शटलर ने कई अन्य पुरस्कार भी जीते हैं, जिनमें, जिनमें 1983 विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य और सिंगापुर में 1981 के विश्व कप में एक स्वर्ण पदक शामिल है।

पुलेला गोपीचंद

प्रकाश पादुकोण के मार्गदर्शन में पुलेला गोपीचंद ने 90 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में उनके कदम पर चले। गोपीचंद ने 2001 में ऑल इंग्लैंड जीता और बैडमिंटन के भारतीय इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। गोपीचंद ने आज से 21 साल पहले ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट जीता था। वे प्रकाश पादुकोण के बाद 102 साल के इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट (1899-2001) जीतने वाले देश के दूसरे खिलाड़ी बने थे। जैसे प्रकाश पादुकोण ने उनके लिए किया, वैसे ही पुलेला गोपीचंद ने भी भारतीय बैडमिंटन की अगली पीढ़ी को ढालने के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

साइना नेहवाल

पुलेला गोपीचंद की स्टार शिष्यों में से एक, साइना नेहवाल बैडमिंटन में भारत की पहली ओलंपिक पदक विजेता हैं। नेहवाल ने लंदन 2012 ओलंपिक महिला एकल स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। वह 2015 में शिखर पर पहुंचने वाली दुनिया की नंबर 1 रैंक पाने वाली एकमात्र भारतीय महिला भी हैं।

पीवी सिंधु

साइना नेहवाल से पांच साल छोटी, पीवी सिंधु ने तूफान की तरह विश्व बैडमिंटन जगत में कदम रखा और  रियो 2016 खेलों में महिला एकल रजत के साथ नेहवाल के कांस्य के बाद पोडियम पर एक कदम आगे बढ़ गया है। 2019 में, वह बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनीं और वर्तमान में महिला विश्व चैंपियन हैं। पीवी सिंधु विश्व चैंपियनशिप में लगातार अच्छा प्रदर्शन करती रही हैं और उन्होंने गोल्ड के अलावा टूर्नामेंट में दो सिल्वर और दो कांस्य पदक भी जीते हैं। साइना नेहवाल की तरह पीवी सिंधु को भी पुलेला गोपीचंद ने मेंटर किया है।

किदांबी श्रीकांत

पुलेला गोपीचंद के संन्यास लेने के बाद से किदांबी श्रीकांत भारत में शीर्ष पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं। श्रीकांत की झोली में  छह बीडब्ल्यूएफ सुपरसीरीज और तीन बीडब्ल्यूएफ ग्रां प्री हैं और उन्हें 2018 में दुनिया में नंबर 1 पुरुष खिलाड़ी का दर्जा दिया गया था। वह प्रकाश पादुकोण के बाद शीर्ष स्थान पाने वाले एकमात्र भारतीय पुरुष शटलर हैं।

 -अभिनय आकाश

अन्य न्यूज़