दिल्ली के घरों में बीजेपी और दिलों में हैं केजरीवाल

दिल्ली के घरों में बीजेपी और दिलों में हैं केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल एक बार फिर आम आदमी की उम्मीदों के नायक के तौर पर अवतरित हो रहे हैं। द्वापर में हस्तिनापुर ने महाभारत का युद्ध देखा था। कलयुग में दिल्ली विधानसभा चुनाव के पिछले दौर में राजनीति का कुरूक्षेत्र ही बन गई थी।

“दिल्ली के लोगों की सेवा करनी है, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता....मैं बहुत छोटा आदमी हूं.” साधारण सी चप्पल, नीले रंग की स्वेटर, गले में मफलर, सफ़ेद कमीज और ढीला-ढाला पैंट पहने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने खुद को परिभाषित करने के लिए न जाने कितनी बार इन शब्दों का इस्तेमाल किया होगा। अपने व्यक्तित्व और बोलने कि बेचारगी भरी शैली से किसी को भी वो पहली नज़र में किसी कक्षा के आज्ञाकारी छात्र प्रतीत हो सकते हैं। 

ईमानदारी वैसे तो एक शब्द है। लेकिन इस शब्द की ताकत के सहारे ही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी एक समय दिल्ली के दिलों को जीत कर सत्ता पर काबिज हुई थी। आंदोलन वाले केजरीवाल से सत्ता वाले केजरीवाल बनने के पांच बरस बीत चुके हैं। अगले साल होने जा रहे दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी का नारा है ‘अच्छे बीते पांच साल – लगे रहो केजरीवाल’। इस नारे के साथ पार्टी ने 2020 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। 

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उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने चुनाव प्रचार अभियान का शुभारंभ कर दिया है। पार्टी मुख्यालय में दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी द्वारा तैयार की विशेष कार्ययोजना की जानकारी दी गई। 

मोदीमय देश की राजनीति में एक शख्स अकेला ही जनता से किए वादे और उसे पूरा करने के दावे के साथ एक बार फिर चुनावी मैदान में है। सर्वे पोल के नतीजे दिल्ली के सियासी वट वृक्ष में नई कोपले खिलने के संकेत दे रहे हैं। दिल्ली एक बार फिर केजरीवाल को गले लगाते दिख रही है वो भी ताकत और भरोसे के साथ। अरविंद केजरीवाल एक बार फिर आम आदमी की उम्मीदों के नायक के तौर पर अवतरित हो रहे हैं। द्वापर में हस्तिनापुर ने महाभारत का युद्ध देखा था। कलयुग में दिल्ली विधानसभा चुनाव के पिछले दौर में राजनीति का कुरूक्षेत्र ही बन गई थी। क्या-क्या नहीं हुआ आरोपों के तीर दागे गए। 

घपले घोटाले की पर्चियां फेंकी गई। नेताओं को तोड़कर अपनी सेना सजाई गई। और फिर जीत के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर दांव को इस्तेमाल किया गया। दिल्ली के इस महाभारत में अपनी-अपनी लड़ाई सबने लड़ी चाहे वो भारत बचाओ रैली के सहारे केंद्र पर निशाना साधने के लिए रामलीला मैदान का चुनाव हो या बीजेपी के अवैध कालोनियों को वैध करने के ऐलान के बाद लोगों के घर-घर दस्तक देने की कवायद हो। लेकिन जीत जिनके कदम चूमते दिख रही है उनका नाम है अरविंद केजरीवाल। सर्वे के शोर में उस पराक्रम की धुंध साफ दिखाई पड़ रही है जिसने लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने पस्त पड़ गई आप की संभावनाओं को नया आसमान दे दिया। तो आइए डालते हैं दिल्ली के नायक के सियासी सफर पर एक नजर। 

पार्टी ने शुरुआत में कई गलतियां करीं, 49 दिनों तक सत्ता में रहने के बाद अचानक सत्ता छोड़ने पर पार्टी के समर्थकों में मायूसी छा गई थी। दिल्ली की 40 फीसदी सीट जीतने वाले केजरीवाल देश जीतने निकल पड़े। खुद नरेंद्र मोदी से मोर्चा लेने के लिए केजरीवाल वाराणसी चले गए। जहां काशी के बेटे के हाथों उन्हें करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। जिसके बाद केजरीवाल को भारी आलोचना सहनी पडी, लोगों ने उन्हें भगौड़ा करार दे दिया था। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली सरकार छोड़ने के पीछे केजरीवाल का बस ये लॉजिक था कि अब केंद्र में आकर सत्ता चलाना चाहते थे, जिसके लिए पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 440 उम्मीदवार भी खड़े किए थे। इसे उनकी एक भूल भी कहा जा सकता है क्योंकि पार्टी ने केवल 4 सीटों पर जीत हासिल की थी और वो भी पंजाब से। जिसके बाद दिल्ली में एक जोरदार वापसी करते हुए केजरीवाल ने राजनीति का एक बड़ा इतिहास लिख दिया। लेकिन फिर पार्टी के अपनों का भी साथ समय-समय पर छूटता रहा। 

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राज्यसभा सांसद नहीं बनाए जाने पर पार्टी के खिलाफ बगावती तेवर दिखा चुके कुमार विश्वास को राजस्थान प्रभारी पद से हटाने की घोषणा एक सम्मेलन में हुई थी। हालांकि अभी कुमार पार्टी में हैं लेकिन वे केवल पार्टी के राजनीतिक मामलों की समिति के सदस्य रह गए हैं और लगातार अरविंद केजरीवाल के खिलाफ जुबानी हमले भी करने से चूकते नहीं है।

बात अगर केजरीवाल के पांच साल के काम की करें जिसके आधार पर ही वो जनता के बीच जा रही है।

आम लोगों से स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर इस पार्टी को तारीफ मिलती रही है। लोगों का मानना है कि पहले के मुकाबले दिल्ली के सरकारी अस्पताल और स्कूलों का काम बेहतर हुआ है। वहीं दूसरी और केजरीवाल सरकार ने अपनी पूरी कैबिनेट के साथ दिल्ली सचिवालय में डोरस्टेप डिलीवरी का शुभांरभ भी किया था, जो दिल्लीवासियों के लिए काफी फायदेमंद रही। दिल्ली में स्कूलों और मोहल्ला क्लिनिक से लेकर मुफ्त बिजली-पानी और वाई-फाई देने के चुनावी वादे पूरे कर देने की बातें करते नहीं चूक रहे केजरीवाल। दिल्ली में एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा - 'हमारी सरकार अगला चुनाव अपने काम पर ही लड़ेगी'। केजरीवाल का दावा है कि बीते पांच साल में विकास के जो काम हुए हैं उसकी सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। केजरीवाल ने बताया कि 98 फीसदी इलाकों में पानी की आपूर्ति सही तरीके से हो रही है और लोग सीधे नल से पानी पी सकते हैं।

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बिजली बिल पर राहत देने को भी अरविंद केजरीवाल ने सरकार के कामों में गिनाया।

दिल्ली के प्राथमिक स्वास्थ्य को केजरीवाल ने दुनिया में बेस्ट बताया और मोहल्ला क्लीनिक खोले जाने को लेकर हो रही तारीफ में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बॉन की मून का भी नाम लिया।

फरिश्ते योजना की बात करते हुए केजरीवाल ने बताया कि इसके तहत सड़क हादसों में घायल तीन हजार लोगों की जान बचाई गयी।

महिलाओं के लिए बसों में मुफ्त सफर, 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली और 20 हजार लीटर पानी के साथ साथ अब दिल्ली में मुफ्त वाई-फाई सेवा ने भी लोगों के मन में आप सरकार के प्रति विशेष भावना जरूर बना ली होगी - और बीजेपी के लिए इसकी काट खोजना काफी मुश्किल होगा।

इंडियन एक्सप्रेस के लिए सीएसडीएस-लोकनीति ने सर्वे किया है। इस सर्वे के नतीजे बड़े दिलचस्प इस लिहाज से हैं कि निष्कर्ष से लगता है कि दिल्ली की लड़ाई कांटे की भी हो सकती है।

यह सर्वे 22 नवंबर से 3 दिसंबर के बीच 23 विधानसभा सीटों पर 2298 लोगों से बातचीत पर आधारित है। आइए सर्वे पर भी एक नजर डालते हैं।

केजरीवाल सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं?

53 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो पूर्ण संतुष्ट हैं। 

वहीं 33 प्रतिशत लोगों ने कुछ हद तक असंतुष्ट होने की बात कही है।

केजरीवाल-मोदी में कौन बेहतर?

42 प्रतिशत लोगों ने केजरीवाल- को मोदी से बेहतर बताया है। 

वहीं 32 प्रतिशत लोगों ने केजरीवाल के मुकाबले मोदी के नाम पर हामी भरी।

16 प्रतिशत लोगों को दोनों ही नेता पसंद हैं। 

दिल्ली के 66 प्रतिशत लोग केजरीवाल को पसंद करते हैं।

अवैध कॉलोनियों को नियमित करने वाला फैसला जनहित में या वोट के लिए?

30% लोगों ने इसे जनहित के लिए लिया फैसला बताया।

36% ने इसे वोट के लिए लिया गया फैसला करार दिया है। 

अरविंद केजरीवाल की राजनीति का एक सीधा- साधा फॉर्मूला है जो बिल्कूल आसान है लाईट, कैमरा एक्शन और आरोप। चार शब्दों के इस फॉर्मूले के सहारे अरविंद केजरीवाल ने पहले अन्ना आंदोलन के जरिए पूरे देश में अपनी पहचान बनाई। जब वो अन्ना हजारे की बगल में बैठा करते थे फिर दिल्ली में अपनी राजनीति चमकाई जब उन्होंने अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बना ली। वो लगातार लोगों पर आरोपों के तीर मारकर भागते रहे। ये केजरीवाल की राजनिति का हिट एंड रन स्टाइल था। अरविंद केजरीवाल ने कॉमन वेल्थ घोटाले में शीला दीक्षित पर तमाम आरोप लगाए। लेकिन अपनी सरकार के दौरान शीला दीक्षित के खिलाफ न तो कुछ साबित कर पाए और न ही उन पर कोई कार्रवाई की। अरविंद केजरीवाल ने गैस प्राइसिंग को लेकर मुकेश अंबानी पर आरोप लगाए लेकिन अब तक कोई ठोस सबूत नहीं मिले। उन्होंने गैस प्राइसिंग पर पूर्व पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली पर आरोप लगाए लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। अरविंद केजरीवाल ने बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके ट्रस्ट में हेराफेरी को लेकर पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद पर भी आरोप लगाए थे। ये मामला भी आगे नहीं बढ़ा और इसका कोई नतीजा नही निकला। अरविंद केजरीवाल ने 30 भ्रष्ट नेताओं की एक लिस्ट जारी की थी जिसमें उन्होंने कई नेताओं का नाम लिया था। केजरीवाल इस लिस्ट के बारे में कुछ नहीं बोलते और जिन लोगों के नाम इस लिस्ट में शामिल थे उन के बारे में भी चुप है। इस लिस्ट में केजरीवाल ने नितिन गडकरी का नाम भी लिया था जिस पर नितिन गडकरी ने केजरीवाल को मानहानि का नोटिस भेजा था जिसकी वजह से केजरीवाल को जेल भी जाना पड़ा था। क्योंकि वो कुछ साबित नही कर पाए थे। केजरीवाल ने दूसरों पर लगाए आरोपों को ईटों की तरह इस्तेमाल करके अपनी राजनीति की दीवार खड़ी कर ली। जिस राजनीतिक मुकाम पर आज केजरी ने अपनी ‘वाल’ खड़ी की है उस पर कई सारे विवादों के छीटें भी शामिल हैं। जिनके बारे में भी आपको बता देते हैं। केजरीवाल सरकार के प्रचंड बहुमत में आने के बाद ही सबसे पहले तो उनके कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर के फर्जी डिग्री से ही विवादों की शुरूआत हो गई थी। फिर उसके बाद संदीप कुमार एमएमएस कांड से लेकर मंत्री सत्येंद्र जैन और कपिल मिश्रा द्वारा सीधे-सीधे केजरीवाल पर रिश्वत लेने के इ्ल्जाम में बीत गए। 2014 में जो सत्ता परिवर्तन हुआ उसके बाद केजरीवाल के विरोध का प्वाइंट पर मोदी सरकार और दिल्ली में एलजी नजीब जंग हो गये और फिर कुर्सी पर व्यक्ति बदलने के बाद मौजूदा उप राज्यपाल अनिल बैजल। 2019 के आम चुनाव के बाद से ही अरविंद केजरीवाल के रूख में बहुद बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ये वही अरविंद केजरीवाल हैं जो प्रधानमंत्री मोदी 'कायर' और 'मनोरोगी' बताया करते रहे। वाई-फाई, मोहल्ला क्लीनिक जैसे चुनावी वादे पूरे करने की कोशिश तो वो पहले भी कर सकते थे लेकिन उनकी ज्यादातर ऊर्जा उप राज्यपाल से लड़ाई में जाया हुआ करती रही। एक बार तो वो सदल बल पहुंचे और एलजी के दफ्तर में ही धरने पर बैठ गये थे। लोकसभा के चुनाव में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठबंधन की भरपूर कोशिश में लगी थी, लेकिन आखिर में राहुल गांधी पर ठीकरा फोड़ कर आप नेता अकेले चुनाव में जुट गये। नतीजे आये तो मालूम हुआ शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने आप को पीछे तीसरी पोजीशन पर धकेल दिया है। 

अगर बात आगामी दिल्ली चुनाव की करें तो बीजेपी महाराष्ट्र और हरियाणा में झटके खाने के बावजूद झारखंड में भी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे के साथ ही चुनाव लड़ रही है। धारा 370 और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के क्रेडिट लेने के साथ ही बीजेपी दिल्ली में भी NRC का मुद्दा उठाएगी ही, यह तय मान कर चलना चाहिये। इतना ही नहीं, अब नागरिकता संशोधन बिल पर एक समुदाय विशेष के रोष और हिंसक प्रतिरोध के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव तक बीजेपी को बताने के लिए वो भी उसकी सूची का हिस्सा हो ही जाएगा। ऐसे में अरविंद केजरीवाल का 'लगे रहो केजरीवाल’' वाला चुनाव प्रचार क्या असर दिखाता है देखना होगा। इन सब के बीच गौर करने वाली बात ये भी है कि और ये याद तो केजरीवाल को भी होगा ही कि किस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी में अखिलेश यादव के 'काम बोलता है' स्लोगन को समझा दिया कि 'काम नहीं आपका कारनामा बोलता है' - और लोग मान गये। तो मामला पूरा तरह से एकतरफा होगा ये भी कहना सरासर गलत ही होगा।

- अभिनय आकाश






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