धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ फ्रांस का नया कानून, अब डर पाला बदलेगा

  •  अभिनय आकाश
  •  फरवरी 22, 2021   19:12
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धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ फ्रांस का नया कानून, अब डर पाला बदलेगा

दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश इस समस्या से परेशान हो रहे हैं। चाहे वो भारत जैसा देश हो या फिर दूसरे ऐसे देश हो जहां लोकतंत्र इस समय चल रहा है। भारत बड़ी मुस्लिम आबादी वाला लोकतांत्रिक देश है। भारत में आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। भारत भी कमोबेश कट्टरता की समस्या से जूझ रहा है।

अगर आप किसी पर तरस खाकर उसे अपने घर में शरण दे देते हैं। शरण पाने पर फिर वो कहे कि ये घर मेरे हिसाब से चलेगा। नहीं चलने पर वो आपके परिवार के लोगों का सिर काट दे। तो फिर क्या आप ताउम्र किसी को अपने घर में शरण देने की हिम्मत कर पाएंगे। अपको इस बात का भी अफसोस रहेगा कि आखिर मैंने इसको शरण क्यों दे दी। आगे से कोई आपके घर में न घुस पाए और अगर घुस चुका है तो आपके हिसाब से ही रहे। इसको लेकर कानून भी बनाएंगे। दरअसल ये कहानी आज तमाम यूरोपीय देशों की है। जिन्होंने मानवता के आधार पर शरण दे दी। देशहित से ऊपर देश को रखा और बदले में उन्हें मिले दंगे और गला काट कट्टरता। तुम मुझे शरण दो मैं तुम्हें दंगा दूंगा। लेकिन अब फ्रांस इसी कट्टरता के खिलाफ कानून बना रहा है। जहां मस्जिदों पर ताला भी लगा, मस्जिदों पर निगरानी भी होगी। सेक्युलरिज्म की पढ़ाई होगी। ऐसे में आज हम बात करेंगे कि क्या है ये बिल और क्यों विवादों में है। इसका फ्रांस और यूरोप पर क्या असर होगा। 

फ्रांस की आबादी 6 करोड़ 70 लाख के आसपास है। फ्रांस बहुत ही नीटो पॉवर कंपनी और न्यूकिल्यर का मेंबर और यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में परमानेंट सीट। धार्मिक रुप स देखे तो फ्रांस रोमन कैथलिक और 40 प्रतिशत लोग किसी धर्म को नहीं मानते हैं वहीं। इस्लाम को मानने वाले 5 प्रतिशत लोग फ्रांस में हैं। बताया ये जा रहा है कि आने वाले सालों में फ्रांस की 12 से 13 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानने वाली होगी। कुल मिलाकर कहे तो फ्रांस में किश्चन धर्म के बाद सबसे ज्यादा इस्लाम को मानने वाले हैं। 

सपोर्टिंग रेसपेक्ट फॉर द प्रिंसिपल्स ऑफ द रिपब्लिक इस कानून का नाम है और ये कानून फ्रांस के निचले सदन में पास हो चुका है और इसे एंटी सेप्रेटिज्म लॉ भी कहा जा रहा है। 

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फ्रांस के नए कानून की 10 बड़ी बातें

अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी या बच्ची की मेडिकल जांच किसी पुरुष डॉक्टर से कराने से इंकार करता है या शादी के लिए किसी लड़की को मजबूर किया जाता है। एक से अधिक शादियां की जाती है तो करीब 13 लाख रुपये का जुर्मना लगाया जाएगा। बता दें कि शरिया कानून के अनुसार मुसलमान चार शादी कर सकता है। लेकिन फ्रांस में नए कानून  आने के बाद अब ऐसा मुमकिन नहीं है।

फ्रांस में बीते वर्ष हाई स्कूल शिक्षक सैमुएल पैटी की हत्या की गई। पैटी पर आरोप था कि उन्होंने कक्षा में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था। उसके बाद घर लौटते वक्त उनकी हत्या कर दी गई। पैटी की हत्या एक छात्र द्वारा ही किए जाने की बात सामने आई। जिसके बाद से ही स्कूली शिक्षक क्लास में ऐसी बातें कहने से डरने लगे जिससे मुस्लिम छात्र कहीं नाराज न हो जाए। लेकिन फ्रांस में सैमुएल पैटी नाम से इस कानून में प्रावधान जोड़ा गया। जिसेक तहत कोई भी व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी और अधिकारी के खिलाफ उससे जुड़ी निजी जानकारियों को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उस पर 40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और तीन साल की जेल भी होगी। 

इस कानून में तीसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि सभी नागरिकों को फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता का सम्मान करना होगा। 

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कोई व्यक्ति फ्रांस के किसी सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को डराता है और उसे फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ जाने के लिए मजबूर करता है तो उसे 5 साल तक जेल होगी और करीब 65 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। 

अपने बच्चों को घर पर ही पढ़ाने की चाह रखने वाले लोगों को फ्रांस की सरकार से इस बात की इजाजत लेनी होगी और इसके पीछे के ठोस वजह को भी बताना होगा। 

सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा ये सुनिश्चित किया जाएगा कि खेल-कूद में किसी भी तरह का लिंग भेदभाव न हो। लड़कियों के लिए अलग स्विमिंग पूल और लड़कों के लिए अलग इस बात की अनुमति फ्रांस की सरकार की तरफ से नहीं होगी। 

नए कानून के तहत फ्रांस के सभी धार्मिक संस्थानों को विदेशों से मिलने वाले चंदे की जानकारी सरकार को देनी होगी। अगर फंडिग 8 लाख से ज्यादा है तो सरकार को इसकी सूचना देनी होगी। ऐसा नहीं करने की स्थिति में फ्रांस की सरकार द्वारा ऐसे धार्मिक संस्थानों को देश से मिलने वाली आर्थिक मदद को बंद कर दिया जाएगा। 

विभिन्न समूहों और संस्थाों को सरकार से विशेष सहायता मिलती है। उन्हें एक समझौते पर हस्ताक्षर करने होंगे। इस समझौते के तहत फ्रांस के संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का सम्मान अनिवार्य होगा। 

धार्मिक संस्थानों में दो समुदायों के बीच टकराव और वैमनस्य पैदा हो इस तरह के भाषण नहीं दिए जा सकेंगे।

जिल लोगों पर फ्रांस में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप होगा, ऐसे लोगों पर धार्मिक संस्थानों में हिस्सा लेने पर 10 साल के लिए बैन लगा दिया जाएगा। 

बिल को लेकर फ्रांस का रूख

1905 से सेक्युलर विचार अपनाने वाले फ्रांस ने पिछले कुछ समय से इस्लाम के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया। फ्रांस के मुस्लिमों को 'काउंटर सोसायटी' कहा जाता है और यह भी तथ्य है कि यूरोप में फ्रांस वह देश था, जिसने 2004 में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया।

मैक्रों 'इस्लाम में सुधार' संबंधी बयान दे चुके हैं, जिन पर काफी तीखी प्रतिक्रिया हो चुकी है। यह फैक्ट भी कुछ कहता है कि 2012 से फ्रांस में मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने करीब 36 हमले किए हैं।

इस्लाम के खिलाफ लामबंदी को 2022 चुनाव के मद्देनज़र मैक्रों की राजनीति भी माना जा रहा है। मैक्रों एक ऐसा कानून लाने की तैयारी में हैं, जिसके तहत विदेशी फंड से ट्रेंड इमाम फ्रांस में नहीं आ सकेंगे। यह भी प्रस्ताव है कि मस्जिदों को स्टेट फंडिंग मिले और टैक्स ब्रेक्स भी।

मैक्रों खुद 'इस्लाम के संकट' में होने संबंधी बयान देते रहे हैं, तो उनके मंत्री भी 'इस्लामी अलगाववाद' और इस्लाम को केंद्र में रखकर फ्रांस के सामने 'सिविल वॉर' के खतरे होने जैसे बयान देते रहे हैं।

बिल पर राजनीति

फ्रांस की सरकार का मानना है कि इस बिल के कानून का शक्ल लेने के बाद चरमपंथ से लड़ने की सरकार की कोशिशों को बल मिलेगा। हालांकि विरोध करने वालों की अपनी आशंकाएं हैं। उनका कहना है कि जिन उपायों की बात हो रही है वो मौजूदा कानूनों में शामिल हैं। विरोधी पक्ष बिल के पीछे राजनीतिक मंशा को तलाश रहे हैं। सरकार का मानना है कि होम स्कूल के माध्यम से बच्चों को धार्मिक विचारों की शिक्षा दी जाती है जिसे रोकने की मंशा है। किसी भी सरकारी कर्मचारी को धमकी देने वाले को जेल की सजा हो सकती है। इसे भी सैमुअल पैटी से जोड़ कर देखा जा रहा है। अगर किसी कर्मचारी को धमकी मिली है तो उसके बॉस को तुरंत इस पर कार्रवाई करनी होगी बर्शर्ते कर्मचारी इसके लिए सहमत हो। 

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फ्रांस को ऐसा करने की  नौबत क्यों आई

दूसरे देशों से आए शरमार्थी और फ्रांस में बढ़ती कट्टर इस्लामिक आतंकवाद की घटानाओं की वजह से फ्रांस ने अपनी जमीन से धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया है। फ्रांस में बॉर्डर एरिया से बड़ी संख्या में शरणार्थी अन्य देशों से आकर बस गए। 2012 में गृह युद्ध के मुहाने से सीरिया गुजर रहा था। उस दौर में फ्रांस में शरण लेने वाले मुसलमानों की गिनती एक लाख तक पहुंच गई थी।आतंकी संगठन आईएसाईएस के इराक, सीरिया और लीबिया के इलाकों को कब्जा करने के बाद यूरोप में शरण लेने वाले मुसलमानों की संख्या में बढोत्तरी हुई। 2017 में फ्रांस में रिकॉर्ड डेढ़ लाख लोगों ने शरण ली। 2019 आते-आते ये संख्या दो लाख हो चुकी थी। 13 नवंबर 2015 को फ्रांस में सुनियोजित तरीके से कई आतंकवादी हमले हुए जिसमें 130 लोग मारे गए थे। 14 जुलाई 2016 को फ्रांस के नीस शहर में एक आतंकवादी ने भीड़ पर ट्रक चढ़ा दिया था जिसमें 84 लोग मारे गए थे। 3 अक्टूबर 2019 को एक आतंकवादी ने तीन पुलिस अफसर और एक आम नागरिक को अपना निशाना बनाया। 16 अक्टूबर को सैमुएल पैटी की एक अलगाववादी द्वारा हत्या कर दी गई। 

भारत में कट्टरता की समस्या

दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश इस समस्या से परेशान हो रहे हैं। चाहे वो भारत जैसा देश हो या फिर दूसरे ऐसे देश हो जहां लोकतंत्र इस समय चल रहा है। भारत बड़ी मुस्लिम आबादी वाला लोकतांत्रिक देश है। भारत में आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। भारत भी कमोबेश कट्टरता की समस्या से जूझ रहा है। कुछ वक्त पूर्व ही गृह मंत्रालय ने भारत में कट्टरता की स्थिति पर अपनी तरह के पहले शोध अध्ययन को मंजूरी दी है, जिसके माध्यम से विधिक रूप से कट्टरता को परिभाषित करने का प्रयास किया जाएघा और उसी आधार पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम 1967 में संशोधन किया जाएगा। मंत्रालय का ये भी दावा है कि यह अध्ययन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होगा और भारत में अभी भी कट्टरता को कानूनी रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। जिसकी वजह से पुलिस और प्रशासन द्वारा इस स्थिति का दुरुपयोग किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार धार्मिक कट्टरता के संदर्भ में केरल और कर्नाटक में इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों के सदस्यों के बढ़ते गतिविधियों के बारे में आगाह किया गया है। - अभिनय आकाश







LAC पर हार, साइबर हमले से वार, भारत कितना है तैयार?

  •  अभिनय आकाश
  •  मार्च 6, 2021   16:47
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LAC पर हार, साइबर हमले से वार, भारत कितना है तैयार?

अमेरिका की एक कंपनी ने अपने हालिया अध्ययन में दावा किया है कि भारत और चीन के बीच सीमा पर जारी तनाव के दौरान चीन सरकार से जुड़े हैकरों के एक समूह ने ‘‘मालवेयर’’ के जरिए भारत के पावरग्रिड सिस्टम को निशाना बनाया। साइबर इंटेलिजेंस फर्म साइफर्मा के हवाले से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक खबर की।

साल था 2018 के अगस्त के महीने में अमेरिका के लांस वेगास में एक खास मेले का आयोजन किया गया था। जिसमें साइबर एक्सपर्ट से लेकर हर उम्र के लोग हैकिंग का हुनर दिखाने के लिए उपस्थित हुए थे। जिस वक्त हैकर्स का ये मेला लांस वेगास में लगा उसी वक्त एक हैकर ने भारतीय बैंक पर साइबर अटैक कर करीब 3 करोड़ डॉलर की रकम उड़ा ली। वैसे देखा जाए तो दुनियाभर में सरकारी वेबसाइट से लेकर हैकिंग कंपनियों और आम लोगों पर साइबर अटैक होते रहते हैं। 

कई देशों ने हैकिंग के लिए अपनी साइबर आर्मी बना रखी है और समय-समय पर अपने विरोधी देशों को निशाना बनाते रहते हैं। चीन की थ्री वाॅर फेयर स्टेटजी है।  जिसका प्रयोग वो साल में दो बार करता है। पहला- साइकोलाॅजिकल वाॅर फेयर, दूसरा मीडिया वाॅर फेयर और तीसरा-लीगल वाॅर फेयर। ये तीन तरह की लड़ाई चीन के द्वारा टैंक, सोल्जर और आर्टलर्री के अलावा लड़ी जाती है। इतिहास से लेकर वर्तमान दौर में ये कहा जाता है कि कोई भी लड़ाई दो तरीके से लड़ी जाती है। पहला- बाहुबल और दूसरा बुद्धिबल। बाहुबल के मामले में लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक एलएसी पर हर नापाक मंसूबा नाकाम होता देख चीन ने अपने दूसरे हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। चीन ने मैदाने जंग में लड़ने की बजाय पर्दे के पीछे से जंग लड़ रहा है और वो भी साइबर जंग। बाहुबल में चीन को पछाड़ने के बाद अब भारत के लिए बड़ी चुनौती चीन को साइबर जंग में पीछे धकेलने की है। ऐसे में आपको बताते हैं चाइनीज हैकर नेटवर्क के बारे में इसके साथ ही क्या भारत ऐसे हमले के लिए तैयार?

रूस की हैकर्स आर्मी

1990 के दशक में सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस में बहुत से एक्सपर्ट अचानक बेरोजगार हो गए। ये इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर्स थे। रोजी कमाने के लिए उन्होंने इंटरनेट की दुनिया खंगालनी शुरू की। उस वक्त साइबर सिक्योरिटी को लेकर ज्यादा जानकारी या जागरूकता नहीं थी। इन रूसी एक्सपर्ट ने हैकिंग के साम्राज्य की बुनियाद रखी। इन रूसी हैकरों ने बैंको, वित्तीय संस्थानों, दूसरी देशों की सरकारी वेबसाइट को निशाना बनाना शुरू किया। 

उस दौर में रूस में हैकर्स नाम की पत्रिका भी छपती थी। रूस की खुफिया एजेंसी एफएसबी को इन हैकर्स के बारे में पता था। 2007 में रूसी हैकर्स ने पड़ोसी देश आस्टोनिया पर बड़ा साइबर हमला किया। इन हैकर्स ने आस्टोनिया के सैकड़ों वेबसाइट को हैक कर लिया। अगले साल ही हैकरों ने एक और पड़ोसी देश जॉर्जिया की सरकारी वेबसाइट को साइबर अटैक से तबाह कर दिया था। 2008 में जॉर्जिया पर हुआ साइबर हमला रूस के सरकारी हैकर्स ने किया था। ये रूस की खुफिया एजेंसी के कर्मचारी थे। आज की तारीख में रूस के पास सबसे ताकतवर साइबर सेना हैं। रूसी हैकर्स पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दखलअंदाजी करने का आरोप लगा। 

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पॉवर ग्रिड को बनाया निशाना

अमेरिका की एक कंपनी ने अपने हालिया अध्ययन में दावा किया है कि भारत और चीन के बीच सीमा पर जारी तनाव के दौरान चीन सरकार से जुड़े हैकरों के एक समूह ने ‘‘मालवेयर’’ के जरिए भारत के पावरग्रिड सिस्टम को निशाना बनाया। आशंका है कि पिछले साल मुंबई में बड़े स्तर पर बिजली आपूर्ति ठप होने के पीछे शायद यही मुख्य कारण था। अमेरिका में मैसाचुसेट्स की कंपनी ‘रिकॉर्डेड फ्यूचर’ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चीन के समूह ‘रेड इको’ द्वारा भारतीय ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाए जाने का जिक्र किया है। पिछले साल 12 अक्टूबर को मुंबई में एक ग्रिड ठप होने से बिजली गुल हो गयी थी। इससे ट्रेनें भी रास्तें में ही रूक गयी और महामारी के कारण घर से काम रहे लोगों का कार्य भी प्रभावित हुआ और आर्थिक गतिविधियों पर भारी असर पड़ा। आवश्यक सेवाओं के लिए बिजली आपूर्ति बहाल में दो घंटे लग गए थे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने घटना की जांच का आदेश दिया था। ‘रिकॉर्डेड फ्यूचर’ ने ऑनलाइन सेंधमारी संबंधित रिपोर्ट के प्रकाशन के पूर्व भारत सरकार के संबंधित विभागों को इस बारे में अवगत कराया। न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक खबर में कहा कि इस खुलासे से सवाल उठा है कि मुंबई में बिजली गुल के पीछे कहीं बीजिंग यह संदेश तो नहीं देना चाहता था कि अगर भारत ने सीमा पर आक्रामक व्यवहार जारी रखा तो क्या हो सकता है। 

अमेरिका के एक वरिष्ठ सांसद ने चीनी हैकरों द्वारा भारत की पावर ग्रिड प्रणाली को निशाना बनाने संबंधी रिपोर्ट के मद्देनजर सोमवार को बाइडन प्रशासन से भारत का साथ देने का अनुरोध किया। साइबर हमले जैसी गतिविधियों की निगरानी करने वाली एक अमेरिकी कंपनी की रिपोर्ट में भारत की पावरग्रिड प्रणाली को निशाना बनाने की बात सामने आयी है। सांसद फ्रैंक पैलोन ने ट्वीट किया, ‘‘अमेरिका को निश्चित रूप से हमारे रणनीतिक साझेदारों के साथ खड़ा रहना चाहिए और भारत के पावर ग्रिड पर चीन के खतरनाक साइबर हमले की निंदा करनी चाहिए, जिसकी वजह से महामारी के दौरान अस्पतालों को जनरेटरों का सहारा लेना पड़ा’’ पैलोन ने ट्वीट किया, ‘‘हम चीन को बल प्रयोग और डर के माध्यम से क्षेत्र में प्रभुत्व कायम करने की अनुमति नहीं दे सकते।’’ माइक्रोसॉफ्ट ने भी अपने ग्राहकों को चीन के हैकरों से सतर्क रहने को कहा है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट ने भी अपने ग्राहकों को चीन समर्थित हैकरों से सावधान किया है।

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भारतीय वैक्सीन निर्माता कंपनियों के आईटी सिस्टम को टारगेट

अभी पॉवर ग्रिड पर हमले की खबर चर्चा में ही थी कि साइबर इंटेलिजेंस फर्म साइफर्मा के हवाले से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक खबर की। जिसमें चीनी हैकरों द्वारा हाल के हफ्तों में दो भारतीय वैक्सीन निर्माता कंपनियों के आईटी सिस्टम को टारगेट करने की बात कही गई। बता दें कि इन दोनों कंपनियों की बनाई वैक्सीन भारत में 16 जनवरी से शुरू हुए टीकाकरण कार्यक्रम में इस्तेमाल हो रही है। सिंगापुर और टोकियो स्थित गोल्डमैन सैक्स समर्थित साइफर्मा के अनुसार चीनी हैकरों के समूह एपीटी 10 ने भारतीय वैक्सीन निर्माता कंपनियों सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक के आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन सॉफ्टवेयर में खामी और कमजोरी की पहचान की है। चीनी हैकरों का मुख्य उद्देश्य इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी चुराना और भारतीय दवा निर्माता कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करना था।

भारतीय पोर्टों को बना रहे निशाना

ऑनलाइन डिजिटल थ्रेट्स पर काम करने वाली कंपनी रिकॉर्ड फ्यूचर ने भारत स्थित पोर्ट और चीन से जुड़े ग्रुप के बीच लिंक पाया जो अभी सक्रिय है। ये बात रिकॉर्ड फ्यूचर के चीफ ऑपरेटिंग अफसर स्टूअर्ट सोलोमॉन की तरफ से कही गई है। रिकॉर्ड फ्यूचर के अनुसार चीनी हैकिंग कंपनी का नाम रेड इको है और 10 फरवरी को रिकॉर्डेड फ्यूचर ने पाया कि इसने भारत स्थित पावर ग्रिड और पोर्ट से जुड़े कम से करीब 10 ठिकानों को निशाने पर लिया। कहा जा रहे है कि इसमें से अधिकांश कनेक्शन 28 फरवरी तक सक्रिय थे। 

कितना बड़ा है चाइनीज हैकर नेटवर्क

एक अनुमान के मुताबिक चीन की हैकर कम्युनिटी में तीन लाख से भी ज्यादा लोग काम करते हैं। इनमें से 93 फीसदी चीनी सेना यानी चाइनीज रिपब्लिकन आर्मी के लिए काम करते हैं। इनकी पूरी फंडिंग चीनी सरकार करती है। ये हैकर लगातार अमेरिका, जापान, साउथ कोरिया, भारत और साउथ ईस्ट एशिया के देशों में हैकिंग करते हैं। चीन की इंटेलिजेंस ब्रांच भी है। इसे कोड 61398 के नाम से भी जाना जाता है। यही वो कोड है जो दुश्मन देशों पर साइबर हमले करता है। 

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नए जमाने का युद्ध- साइबर वॉर

साल 2007 में इजरायली एयर फोर्स ने सीमा के नजदीत स्थित सीरिया की न्यूक्लियर फैसलिटीज को बर्बाद करने के लिए ऑपरेशन ऑर्किड चलाया। इसमें इजरायल ने सीरिया के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने के लिए साइबर वॉरफेयर रा रास्ता अपनाया। इसा फायदा उठाते हुए इजरायल के फाइटर एयरक्राफ्ट ने न्यूक्लियर फैसिलिटीज पर बम गिराये।

साल 2010 में स्टूक्नेट वायरस ने ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटी का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद कर दिया। इसे इजरायल और अमेरिकी के साझा ऑपरेशन के तौर पर देखा गया। 

2014-15 में यूक्रेन के साथ विवाद के बीच रूस ने उनके मिलिट्री कम्युनिकेशन सिस्टम को ब्लैंक कर दिया थआ और इसकी वजह से यूक्रेन को सेलुलर नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ा और उनके लोकेशन रूस को आसानी से पता चल जाती थी। 

क्या भारत ऐसे हमले के लिए तैयार 

देश में एक इंटीग्रेटेड साइबर कमांड बनाने की मांग लंबे वक्त से चल रही है। दुनियाभर के देशों में सेना के पास अपनी एक साइबर सेना भी होती है जो इस तरह के मामलों से निपटती है। भारत में साइबर हमलों को रोकने के लिए दो संस्थाएं हैं। एक है सीईआरटी जिसे कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पॉन्स टीम के नाम से जाना जाता है। इलका गठन साल 2004 में किया गया था। क्रिटिकल इनफॉर्मेशन के तहत नहीं आने वाले साइबर हमलों पर सीईआरटी कार्रवाई करतीहै। दूसरी संस्था है नेशनल क्रिटिकल इनफर्मोशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर जो 2014 से काम कर रही है। ये क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले हमलों की जांच और रेस्पॉन्स का काम करती है। लेकिन अब वक्त और तकनीक में काफी बदलान समय के साथ आया है। देश के लिए नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल द्वारा साइबर सिक्योरिटी स्ट्रेटजी की जरूरत महसूस हुई और इसको लेकर तैयारी जारी है लेकिन काम अभी पूरा नहीं हुआ है।- अभिनय आकाश







करुणानिधि के मित्र पर चली गोलियां और अस्पताल में भर्ती हुए एमजी रामचंद्रन

  •  अभिनय आकाश
  •  मार्च 5, 2021   17:13
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करुणानिधि के मित्र पर चली गोलियां और अस्पताल में भर्ती हुए एमजी रामचंद्रन

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एमजीआर के कटआउट कोयंबतूर में पीएम मोदी की रैली में लगे थे।आखिर क्या है एमजीआर में ऐसा जिसके पोस्टरों का प्रयोग कर बीजेपी अपनी राजीनितक पैठ बना रही है और विरोधियों की नींदे भी उड़ा रही है।

राजनीति का वो सितारा जिसने सिनेमा की ताकत को पहचाना और उसे सियासत की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया। जिसके प्रगाढ़ मित्र उसी के परम विरोधी बन गए और दाग दी दो गोलियां। जो एक बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा तो अपने आखिरी सांस तक तमिलनाडु के सीएम के रुप में काबिज रहा। आज उसी राजनेता की कहानी सुनाऊंगा जिसने अभिनेता के तौर पर ही नहीं बल्कि राजनेता के तौर पर भी लोगों के दिलों पर राज किया। दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में पैठ बनाने के लिए बीजेपी अपनी रैलियों और प्रचार में दूसरे दलों के कद्दावर नेताओं के पोस्टर का उपयोग कर रही है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एमजीआर के कटआउट कोयंबतूर में पीएम मोदी की रैली में लगे थे। पीएम मोदी की रैली में कामराज और एमजीआर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए दोनों नायकों के बड़े कटआउट के मुकाबले मोदी के छोटे कटआउट लगाए गए। एआईएडीएमके जिसका गठबंधन बीजेपी के साथ माना जा रहा है। बीजेपी के इस कदम से उसने अपना एतराज जताया है कि बीजेपी को अपने महापुरुषों का इस्तेमाल करना चाहिए न कि हमारे। डीएमके कह रही है कि बीजेपी को कामराज और एमजीआर दोनों के नाम और चेहरे का इस्तेमाल करने का हक नहीं। उधर बीजेपी इस वजह से खुश है कि उसे लगता है कि उसका निशाना सही जगह पर लगा है। ऐसे में आखिर क्या है एमजीआर में ऐसा जिसके पोस्टरों का प्रयोग कर बीजेपी अपनी राजीनितक पैठ बना रही है और विरोधियों की नींदे भी उड़ा रही है। आज की कहानी तमिलनाडु की सियासत में लाइट, कैमरा और एक्शन के साथ एंट्री कर राजनीतिक पटल पर छा जाने वाले नेता मारुदुर गोपालन रामचंद्रन यानी एमजीआर की। 

1981 में एक फिल्म आई थी नसीब जिसका गाना है जिंगदी इम्तिहान लेती है... लेकिन मरूदुर गोपालन रामचंद्रन ने अपने जिंदगी के सफर में एक नहीं बल्कि दो इम्तिहान दिए। पहले तो फिल्मी दुनिया से सियासत में कदम रखने के बाद मित्र के दुश्मन बन जाने और दोस्त से ही गोली खाने का फिर तमाम झंझावतों से जूझते हुए तमिलनाडु की सीएम की कुर्सी पर पहुंचने के साथ ही भारत रत्न तक से नवाजा जाना। 

एमजीआर के नाम से फेमस मरुदुर गोपालन रामचंद्रन ने एक अभिनेता के तौर पर ही नहीं बल्कि राजनेता के तौर पर भी लोगों के दिलों पर छाए रहे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फिल्मों से की थी। गांधीवादी आदर्शों से प्रभावित होकर एमजीआर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। करुणानिधि के शब्द और एमजीआर के एक्शन ने एक-दूसरे को मंजिल तक पहुंचाने में मदद की। 1950 का दौर था और करुणानिधि की स्क्रिप्ट मंतिरी कुमारी ने एमजीआर को बड़ी सफलता दी। युवा लेखक करुणानिधि को अपनी योग्यता से नाम, मिश्रित विचारधारा और व्यावसायिक सफलता मिली और एमजीआर एक बड़े एक्टर हो गए। साल1953 में एमजीआर सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व वाले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके पार्टी) में आ गए। उन्होंने राज्य में चल रहे द्रविड़ अभियान में ग्लैमर जोड़ दिया। वर्ष 1967 में एमजीआर विधायक बने। अन्नादुरई की मृत्यु के बाद वह डीएमके के कोषाध्यक्ष बने और उस वक्त करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। एमजीआर के मित्र करुणानिधि ने एमजीआर के करियर को नया मोड़ देने वाली फिल्म मंतिरी कुमारी के अलावा एमजीआर के लिए खासतौर से ऐसी पटकथाएं तैयार की जिनसे वे गरीबों के मसीहा के तौर पर सामने आए। उन फिल्माों की सफलता ने डीएमके को मजबूत बनाने का काम किया। सामाजिक विसंगति, गरीबी, तमिल-द्रविड़ और भाषाई आंदोलन की जिन बातों को तमिल समाज पिछवे डेढ़ दशक से सुनता आ रहा था, एमजी रामचंद्रन ने जमीनी स्तर पर उसके लिए संघर्ष किया। 

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दोस्त ने चलाई दो गोलियां

12 जनवरी 1967 को एमजीआर की पहली फिल्म के हीरे एमआर राधा निर्माता केएन वासु के साथ एमजीआर से मिलने गए। लेकिन बातचीत के बीच अचानक राधा ने उठकर एमजीआर पर दाग दी गो गोलियां। गोलियां एमजीआर के कान छूती हुई उनके गर्दन में लगी। एमजीआर को अस्पलात में दाखिल करवाया गया। एमजीआर को अस्पताल में भर्ती करायागया। उन्हें गोली लगने की बात जब लोगों को पता चली तो प्रशंकर सड़कों पर उतर आए। अस्पताल में भीड़ उमड़ने लगी। ऑपरेशन के बाद एमजीआर ठीक तो हो गए लेकिन उन्होंने एक कान से सुनने की क्षमता खो दी और उनकी आवाज में भी बदलाव आ गया। 

करुणानिधि से अलग होकर बनाई नई पार्टी

एक बार विधानसभा चुनाव के दौरान करुणानिधि ने एमजीआर को याद करते हुए कहा कि उनको मुख्यमंत्री बनाने में एमजीआर की भूमिका अहम थी। करुणानिधि ने एमजीआर के लिए कृतज्ञता व्यक्त की लेकिन फिर वापस एमजीआर की लोगों को आकर्षित करने की क्षमता करुणानिधि के लिए चिंता का विषय हो गई। करुणानिधि ने एमजीआर का मुकाबला करने के लिए अपने बेटे एमके मुत्तु को कॉलीवुड में लॉन्च किया। यहीं से करुणानिधि और एमजीआर के बीच मतभेद गहरा गए। एमजीआर ने डीएमके पर भ्रष्टाचार और अन्नादुराई के उसूलों से दूर जाने का आरोप लगाया तो करुणानिधि ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। जिसके बाद एमजीआर ने अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम बनाई जो बाद में ऑल इंडिया अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कझगम कहलाई। यह राज्य की एक बड़ी पार्टी बनकर उभरी और डीएमके और एआईएडीएमके के बीच जोरदार टक्कर हुई। साल 1977 के चुनाव में एआईएडीएमके को सफलता मिली और एमजीआर पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उस दौर में एमजीआर की जीत की राह इतनी आसान नहीं थी और डीएमके, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व जनता पार्टी के साथ हुए मुकाबले में एमजीआर ने बाजी मार ली। वो भी ऐसा कि एक बार मुख्यमंत्री बने तो अपनी आखिरी सांस 1987 तक तमिलनाडु के सीएम रहे। 

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जब तपते रेगिस्तान में एमजीआर ने जयललिता को गोद में उठाया

एमजीआर के बाद एआईएडीएमके को आगे बढ़ाने वाली जे जयललिता न नेता बनना चाहती थीं, न अभिनेता। वो एक धाकड़ वकील बनना चाहती थीं। लेकिन महज दो साल की उम्र में पिता का देहांत होने के बाद उनकी मां ने बैंगलोर में उन्हें दादा-दादी के पास छोड़दिया। जिसके बाद वो संध्या नाम से तमिल फिल्मों में एक्टिंग करने लगी। जयललिता और एमजी रामचंद्रन की जोड़ी तमिल फिल्मों की सबसे हिट जोड़ी रही। दोनों की उम्र में 31 साल का फर्क था। लेकिन एमजीआर जयललिता के लिए सबकुछ थे। एक बार राजस्थान के रेगिस्तान में एमजीआर और जयललिता की फिल्म की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के एक गाने में जयललिता को नंगे पांव डांस करना था। उस गर्म रेत पर जयललिता के लिए चलना भी मुश्किल हो रहा था। यह देखकर एमजीआर ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया था। उस जमाने में जयललिता और एमजीआर को लेकर अखबारों में कई तरह के खबर छपते थे। लेकिन एक इंटरव्यू में जयललिता ने कहा कि उनके बीच वहीं रिश्ता था जो एक गुरु और शिष्य में होता है। 1987 में जब एमजी रामचंद्रन का निधन हुआ था तो उस वक्त उनके परिवार वालों ने जयललिता को घर में घुसने से रोक दिया था। एमजीआर के निधन की खबर सुनकर जब जयललिता उनके घर पहुंची तो किसी ने दरवाजा नहीं खोला। जयललिता ने जोर-जोर से दरवाजा खटखटाया। काफी देर के बाद जब दरवाजा खुला तो किसी ने उन्हें ये नहीं बताया कि एमजीआर का शव कहां रखा है। बाद में उन्हें पता चला कि एमजीआर के शव को राजाजी हॉल ले जाया गया है। जयललिता एमजीआर के शव के पास पहुंच कर उनके सिराहने के पास खड़ी हो गई। उनकी आंखों से आंसू तक नहीं निकले। कहा जाता है कि वो दो दिनों में करीब 21 घंटे तक एमजीआर के शव के पास खड़ी रहीं। इस दौरान एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन की समर्थक जानबूझकर चलते-फिरते उनके पैरों को कुचलती रही ताकि जयललिता घायल होकर वहां से चलीं जाएं। लेकिन जयललिता वहीं दो दिन तक खड़ी रहीं। जब एमजीआर के पार्थिव शरीर को शव वाहन पर ले जाया जा रहा था। जयललिता भी दौड़कर उस वाहन पर चढ़ने लगीं लेकिन तभी एमजीआर की पत्नी के भतीजे ने उन्हें धक्का देकर गिरा दिया। और जययलिता वहां से वापस लौट आई। निधन के एक साल बाद एमजीआर को भारत रत्न सम्मान से भी नवाजा गया। तमिलनाडु की सियासत और रुपहले पर्दे का कनेक्शन हमेशा से रहा है। वर्तमान दौर में अभिनेता से नेता बने कमल हासन चुनाव में उतर रहे हैं और कहा जा रहा है कि वो इस बार दो विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। जिसमें से एक सीट वो है जहां से एमजीआर 9 साल तक विधायक रहे। एमजीआर तो अब नहीं रहे लेकिन उनकी चर्चा के बिना तमिल सियासत अधूरी सी है। इसका ताजा प्रमाण ये है कि बीजेपी ने अपने नेताओं को यह हिदायत दी है कि वे चुनावी सभाओँ में अपनी बात शुरू करने से पहले कामराज और एमजीआर को याद करते हुए उनके प्रति श्रद्धा सुमन जरूर अर्पित करे। बीजेपी को इससे फायदा हो या ना हो लेकिन इतना तय है कि पूरे चुनाव वह एआईएडीएमके और डीएमके नेताओं का बीपी बढ़ाए रहेगाी। - अभिनय आकाश







शास्त्री और इंदिरा को PM की कुर्सी तक पहुंचाने वाला राजनेता, जिसके कटआउट का यूज तमिलनाडु में BJP कर रही

  •  अभिनय आकाश
  •  मार्च 4, 2021   17:34
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शास्त्री और इंदिरा को PM की कुर्सी तक पहुंचाने वाला राजनेता, जिसके कटआउट का यूज तमिलनाडु में BJP कर रही

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिसने किसी दौर में कहा- मैं कामराज हूं, बिस्तर पर लेट कर भी चुनाव जीत सकता हूं। फिर क्या हुआ ऐसा कि इस दिग्गज कांग्रेसी नेता ने इंदिरा गांधी को ही कांग्रेस से बाहर कर दिया।

एक नेता जिसने सीएम की कुर्सी छोड़ दी सिर्फ और सिर्फ संगठन को मजबूत करने की चाह में, वर्तमान दौर में देखें तो पद और सत्ता का लोभ राजनेताओं को फेविकॉल की तरह कुर्सी से चिपका कर रखता है। आज बात ऐसे शख्स की करेंगे जिसने शास्त्री को भी प्रधानमंत्री बनाया और इंदिरा को भी कुर्सी तक पहुंचाया। आज की कहानी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिसने किसी दौर में कहा- मैं कामराज हूं, बिस्तर पर लेट कर भी चुनाव जीत सकता हूं। फिर क्या हुआ ऐसा कि इस दिग्गज कांग्रेसी नेता ने इंदिरा गांधी को ही कांग्रेस से बाहर कर दिया। कामराज को मात देने के लिए इंदिरा ने आखिर क्यों अपने प्रतिद्ववंदी डीएमके से गठजोड़ कर लिया। 

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पांच राज्यों के तारीखों का ऐलान हो चुका है। सभी पार्टियां बहुमत पाने के लिए चुनावी जद्दोजहद में लगी है। भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी जिसे प्रतीकों की राजनीति करना बखूबी आता है। याहे वो सरदार पटेल हो या आंबेडकर या फिर बीते दिनों नेताजी सुभाष चंद्र बोस का पराक्रम दिवस। बीजेपी आए दिन इन देश के ऐतिहासिक धरोहरों के लिए एक तरह का इवेंट टाइम कार्यक्रम बना लाइमलाइट बटोर लेती है और यही विपक्षी दलों के लिए मुसीबत का सबब भी बन जाता है। तमिलनाडु में बीजेपी अब कामराज और एमजीआरप पर अपना हक जताने के मूड में आ गई है। जिससे तमिल सियासत करने वाली पार्टियां डीएमके और एआईडीएमके कि भौहें तन गई। दरअसल, तमिलनाडु के चुनाव के मौके पर बीजेपी अपनी रैलियों में कामराज और एमजीआर के कट आउट लगा रही है। वैसे तो वैचारिक तौर पर देखा जाए तो इन दोनों नेताओं का बीजेपी या संघ से कोई नाता नहीं रहा है। लेकिन बीजेपी तमिलनाडु में इनकी अहमियत को भली-भांति समझती है। इसलिए वह अपने को इनके साथ दिखाना चाहती है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे नेता कि कहानी सुनाएंगे जिसके बड़े-बड़े कट आउट की जरूरत बीजेपी को भी चुनावों में महसूस हो गई। तमिलनाडु के तीन बार के मुख्यमंत्री के कामराज की।  

कामराज प्लान जिसने 6 मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे दिलवा दिये 

साल 1962 का आम चुनाव जिसमें कांग्रेस ने एक बार फिर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की और देश की बागडोर एक बार फिर पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथों में थी। लेकिन कुछ वक्त बीते की भारत और चीन के बीच युद्ध हो गया। एक महीने तक चले इस युद्ध में भारत बहुत कुछ गंवा चुका था। भारतीय सेना के 1383 सैनिक शहीद हुए थे। 1696 सैनिकों का कुछ पता ही नहीं चला और चार हजार सैनिकों को युद्ध बंदी बनने की यातना झेलनी पड़ी। पंडित नेहरू और कांग्रेस पार्टी की लोकप्रियता में काफी गिरावट आई और नतीजा ये हुआ कि 62 में ऐतिहासिक दर्ज करने वाली कांग्रेस एक साल बाद 3 लोकसभा उपचुनावों में हार गई। कामराज ने वो किया था जिसके बारे में आज सोचना भी मुश्किल है। कामराज ने खुद ही तमिलनाडु राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था और उनके इस्तीफे के बाद छह केंद्रीय मंत्री और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कुर्सी छोड़ कर पार्टी में काम करना पड़ा था। पद छोड़कर पार्टी में काम करने की इस योजना को ही 'कामराज प्लान' कहा जाता है। भारत चीन युद्ध के बाद कमजोर हो रही कांग्रेस को संकटपूर्ण स्थिति से बाहर निकालने के लिए कामराज ने पंडित नेहरू को सुझाव दिया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को मंत्री पद से इस्तीफा देकर संगठन को मजबूत करने में जुट जाना चाहिए। कामराज प्लान का मकसद मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी के लोगों के मन के भीतर से सत्ता के लालच को दूर करना था और इसके स्थान पर संगठन के उद्देश्यों और नीतियों के लिए एक समर्पित लगाव पैदा करना। उनका ये सुझाव नेहरू को काफी पसंद आया। नेहरू ने इस प्लान का प्रस्ताव कार्यसमिति के पास भेजने को कहा। सीडब्ल्यूसी ने इस प्रस्ताव को पास किया और इसके अमल में आते ही 6 मुख्यमंत्री और 6 केंद्रीय मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। उस वक्त के मद्रास और वर्तमान के तमिलनाडु राज्य के सीएम पद से कामराज ने इस्तीफा दिया, इसके साथ ही उत्तर प्रदेश से चंद्रभानु गुप्ता, ओडिशा के बीजू पटनायक और मध्य प्रदेश के सीएम भगवंत राव मंडलोई ने भी इस्तीफा दिया। कामराज प्लान के तहत 6 केंद्रीय मंत्रियों को भी इस्तीफा देना पड़ा जिसमें लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई और बाबू जगजीवन राम जैसे दिग्गज नाम शामिल थे। कुछ ही दिनों बाद कामराज को 9 अक्टबर 1963 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। 

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 नेहरू के बाद कौन? 

हिन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के देहांत के बाद सवाल उठा नेहरू के बाद कौन? जवाहर लाल नेहरू के देहांत के महज दो घंटे बाद कांग्रेस के जाने-माने नेता गुलजारी लाल नंदा को केयर टेकर प्रधानमंत्री बना दिया गया। लेकिन नेहरू के बाद उनका असली उत्तराधिकारी कौन था? इस सवाल का जवाब सिर्फ और सिर्फ एक आदमी के पास था- के कामराज। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के कामराज उस वक्त तक देशभर में लोकप्रिय हो चुके थे। 27 मई 1964 को कामराज के सामने कांग्रेस पार्टी के अंदर से एक ऐसे व्यक्ति को चुनने की चुनौती थी जिसे सब अपना नेता मान ले। दिल्ली के त्यागराज मार्ग के बंगले में माहौल कुछ अलग था। मोरारजी देसाई यहां रहा करते थे। मोरारजी देसाई कांग्रेस के बड़े नेता थे और पंडित नेहरू की सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे। उस वक्त गुजरात और महाराष्ट्र एक राज्य हुआ करता था। लाल बहादुर शास्त्री जब से नेहरू की कैबिनेट में मिनिस्टर विथआउट पोर्टफोलियो थे तब से ही उन्हें नेहरू के बाद उत्तराधिकारी माना जा रहा था। प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई की दावेदारी जल्द ही अखबारों की सुर्खियां बन गई। जैसे ही मोरारजी देसाई की दावेदारी पब्लिक हुई कांग्रस अध्यक्ष कामराज का काम आसान हो गया। क्योंकि कामराज मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनने से रोकने का फैसला पंडित नेहरू के निधन से पहले ही कर चुके थे। 1963 के सितंबर महीने में कामराज तिरूपति पहुंचे थे। उस वक्त वो कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं थे और उनके साथ गैर हिंदी भाषी राज्यों के कई नेता भी थे। नीलम संजीव रेड्डी, निजालिंगप्पा, एसके पाटिल और अतुल्य घोष के साथ बैठक में मोररार जी देसाई के उम्मीदवारी को लेकर खिलाफत के बीज पड़ चुके थे। मोरारजी देसाई चाहते थे कि प्रधानमंत्री चुनने का काम संसदीय दल करेन कि पार्टी। लेकिन कामराज ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी का वर्चस्व जारी रखा। कामराज ने कांग्रेस में आम राय बनाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली और तीन दिन तक देशभर के कांग्रेस नेताओं से मुलाकत की। 1 जून 1964 को कामराज और मोरारजी से मुलाकात के बाद लाल बहादुर शास्त्री के रूप में कांग्रेस की राय का ऐलान हो गया। कहा जाता है कि कामराज इंदिरा गांधी के लिए राजनीतिक पिच तैयार कर रहे थे। नेहरू के निधन के बाद इंदिरा ने शोक में होने की बात कहते हुए पीएम पद को लेकर दावेदारी से स्वयं की अलग हो गईं थी। कामराज को लगता था कि मोरारजी देसाई से मुकाबिल शास्त्री जी कम महत्वकांक्षा रखने वाले राजनेता हैं। जिससे आगे चलकर इंदिरा की राह खुद ब खुद आसान हो जाएगी। लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उनके कैबिनेट में बतौर आईबी मिनिस्टर इंदिरा गांधी को जगह मिली। लेकिन ताशकंद में 11 जनवरी 1966 में शास्त्री जी का निधन हो गया। हिन्दुस्तान खबर पहुंची तो लोग हैरान हुए परेशान हुए। ताशकंद समझौते के बाद लाल बहादुर शास्त्री खुद नहीं बल्कि उनका पार्थिव शरीर हिन्दुस्तान पहुंचा। 

इंदिरा गांधी को ऐसे मिली पीएम की कुर्सी

दिल्ली में एक बार फिर कुर्सी की खींचतान तेज हो गई और इस बार इंदिरा गांधी पूरी तरह से सक्रिय हो गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज के मन में क्या चल रहा है ये जानने के लिए इंदिरा गांधी उनसे मिलने पहुंची। केयर टेकर प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा का जिक्र कर इंदिरा कामराज की मंशा भांपने की कोशिश में थीं। लेकिन वो उसमें नाकाम साबित हुई। कामराज का अगला कदम क्या होगा इसपर सभी की नजर थी। इंदिरा गांधी के समर्थक और सलाहकार डीपी मिश्रा की किताब के अनुसार अतुल्य घोष और कांग्रेस सिंडीकेट के कई नेता कामराज पर प्रधानमंत्री बनने के लिए दवाब डाल रहे थे। कामराज के समर्थक उन पर फैसला लेने के लिए दबाव डाल रहे थे। कामराज ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि मैं प्रधानमंत्री बन सकता क्योंकि मैं न हिंदी जानता हूं न अग्रेजी। जिसके बाद ये तय हुआ कि कामराज प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। इस बैठक से बेपरवाह इंदिरा के सामने ये सवाल कायम था कि क्या कामराज किंग की जगह किंगमेकर बनने के लिए तैयार थे?कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोरारजी देसाई सर्वसम्मति की बात इस बार नहीं माने और वो वोटिंग पर अड़ गए। इंदिरा गांधी को कामराज का समर्थन मिला। उस वक्त इंदिरा गांधी को मोरारजी देसाई के मुकाबले कमजोर माना जाता था लेकिन ये किंगमेकर कामराज का ही कमाल था कि कांग्रेस संसदीय दल में 355 सांसदों का समर्थन पाकर इंदिरा प्रधानमंत्री बन गई। कहा जाता है कि ये कामराज का आखिरी सफल दांव था। 

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1967 का चुनाव और कामराज की हार 

इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद रूपये के अवमूल्यन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इससे देश में महंगाई बढ़ गई। कामराज इंदिरा के इस फैसले से नाराज भी हुए लेकिन फिर वो कांग्रेस में नेहरू का सबसे अच्छा विकल्प इंदिरा को ही मानते थे। 1967 का चुनाव आता है जो कांग्रेस के लिए बड़ा झटका सरीखा होता है। उन दिनों कामराज का पैर टूट गया था और उन्होंने बिस्तर पर से ही कहा था- मैं कामराज हूं, बिस्तर पर लेट कर भी चुनाव जीत सकता हूं। कांग्रेस यूपी, बिहार, पंजाब जैसे कई राज्यों में बुरी तरह से हारी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष कामराज खुद तमिलनाडु की एक विधानसभा से डीएमके की पार्टी के बैनर चले चुनाव लड़ रहे छात्र नेता से चुनाव हार जाते हैं। 

दो भागों में विभाजित हुई कांग्रेस 

मई 1967 में सर्वपल्ली राधा कृष्णन का कार्यकाल खत्म हो गया था। कांग्रेस की ओर से आंध्र प्रदेश के नीलम संजीव रेड्डी को प्रत्याशी बनाया गया। लेकिन इंदिरा गांधी ने उपराष्ट्रपति वीवी गिरी को पर्चा दाखिल करने के लिए बोला और चुनाव से ठीक एक दिन पहले कांग्रेसियों से अंतरआत्मा की आवाज पर वोट डालने की अपील की। कांग्रेस उम्मीदवार रेड्डी चुनाव हार जाते हैं और वीवी गिरी राष्ट्रपति बन जाते हैं। इंदिरा की इस हरकत से कांग्रेस के नेता निजीलिगप्पा, अतुल्य घोष, एसके पाटिल और कामराज नाराज होकर नवंबर 1969 में एक मीटिंग बुलाई और इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा के इस्तीफा नहीं देने के बाद बहुमत साबित करने की नौबत आई और 229 सांसदों का इंदिरा को समर्थन मिला। जबकि कामराज के धुर विरोधी करुणानिधि की पार्टी डीएमके और वाम दलों ने भी इंदिरा का साथ दिया। कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेताओं के सिंडिकेट ने इंदिरा पर शिकंजा कसना चाहा तो उन्होंने 1969 में पार्टी ही तोड़ दी। कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेताओं के सिंडिकेट ने इंदिरा पर शिकंजा कसना चाहा तो उन्होंने 1969 में पार्टी ही तोड़ दी. इंदिरा की कांग्रेस को कांग्रेस रूलिंग यानी कांग्रेस आर कहा जाता था जबकि कामराज की कांग्रेस को कांग्रेस आर्गनाइजेशन यानी कांग्रेस ओ कहलाती थी। तमिलनाडु में ही कामराज कमजोर पड़े गए। उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव में हार मिलने लगी। कामराज की सेहत खराब रहने लगी। 2 अक्टूबर 1975 को कामराज का हार्ट अटैक के चलते निधन हो गया। कामराज के निधन के अगले साल ही इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।

 मिड डे मील के जनक 

बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आज जिस मिड डे मील को लेकर चर्चा होती है। भारत में पहली मिड डे मील योजना कुमार स्वामी कामराज यानी के कामपाज ने मद्रास के मुख्यमंत्री रहते हुए शुरू की थी। खुद गरीबी के चलते स्कूल नहीं जा पाने वाले कामराज ने ये संकल्प लिया कि मुझे हर बच्चे को स्कूली शिक्षा मुहैया करवानी है, उसे खाना देना और यूनिफार्म देनी है। मिड डे मील, फ्री यूनीफॉर्म जैसी कई योजनाओं के जरिये स्कूली व्यवस्था में कामराज ने इतने जबरदस्त सुधार किए की जो साक्षरता ब्रिटिश राज में महज 7 फीसदी थी वो 37 फीसदी तक पहुंच गई। चेन्नई के मरीना बीच पर कामराज का स्टेत्यू लगा है। वो उनके अकेले का नहीं बल्कि उनके बगल में दो बच्चों का स्टेच्यू भी है, जो कामराज के शिक्षा के क्षेत्र में किए गए काम को एक श्रद्धांजलि है। 

ये तो थी तमिलनाडु के दिग्गज नेता के कामराज की कहानी। अब अगर वर्तमान परिस्थिती की बात करे तो पीएम मोदी की रैली में कामराज और एमजीआर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए दोनों नायकों के बड़े कटआउट के मुकाबले मोदी के छोटे कट आउट लगाए गए। तर्क दिया गया कि हम राष्ट्र नायकों को राजनीतिक पाले में बांट कर नहीं देखना चाहेत। जो राष्ट्र का है वह सबका है। एआईडीएमके और डीएमके दोनों पार्टियां इसके दूरगामी नतीजों को बखूबी जानती है। - अभिनय आकाश







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