मुफ्ती सईद की राजनीति, रूबिया सईद अपहरण और महबूबा के अलगाववाद को समर्थन की पूरी कहानी

  •  अभिनय आकाश
  •  नवंबर 3, 2020   18:22
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मुफ्ती सईद की राजनीति, रूबिया सईद अपहरण और महबूबा के अलगाववाद को समर्थन की पूरी कहानी

मुफ्ती मोहम्मद सईद का राजनीतिक सफर 1950 में नेशनल कॉन्फ़्रेंस से शुरू हुआ था, लेकिन 1959 में वे नेकां से अलग होकर डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ़्रेंस और फिर कांग्रेस में चले गए। वर्ष 1987 में वे कांग्रेस से बाहर चले आए और वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री बने।

ये आज के भारत का नक्शा है और ये 15 अगस्त 1947 का भारत है। इसमें जम्मू कश्मीर राज्य दिख तो रहा है लेकिन आजादी के वक्त ये भारत का हिस्सा नहीं था। एक तरह से स्वतंत्र राज्य था। उस वक्त यहां के राजा थे हरिसिंह। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने देर कर दी इसलिए आज भी हम कश्मीर समस्या को सुलझा नहीं पाए। कुछ लोग कहते हैं कि पंडित नेहरू यूएन चले गए इसलिए आज भी ये समस्या है हमारे सामने और कुछ लोग कहते हैं कि ये समस्या पाकिस्तान ने बनाई है। आज बात कश्मीर की करेंगे। कश्मीर की राजनीतिक पार्टी की भी करेंगे। देश के गृह मंत्री की बेटी के अपहरण की करेंगे और उसके बाद सड़क पर लहराते बंदूकों के जश्न की भी करेंगे। 

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जम्मू कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (जेकेपीडीपी) की स्थापना पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और जम्मू कश्मीर के मुख्‍यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 1999 में की थी। वर्तमान में इसकी मुखिया सईद की बेटी मेहबूबा मुफ्ती हैं। क्षेत्रवादी विचारधारा में विश्वास करने वाली पीडीपी का चुनाव चिह्न कलम और दवात है। सईद का राजनीतिक सफर 1950 में नेशनल कॉन्फ़्रेंस से शुरू हुआ था, लेकिन 1959 में वे नेकां से अलग होकर डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ़्रेंस और फिर कांग्रेस में चले गए। वर्ष 1987 में वे कांग्रेस से बाहर चले आए और वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री बने। वर्ष 2002 के राज्य विधानसभा चुनाव में पीडीपी ने 16 सीटें जीतकर कांग्रेस के साथ सरकार बनाई, जबकि 2004 के लोकसभा चुनाव में इसे मात्र एक सीट मिली। 2008 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी को 21 सीटें मिलीं। 2014 में इसका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा। विधानसभा चुनाव में इसे 28 सीटें मिलीं, जबकि 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में 3 सीटें मिलीं।पीडीपी ने 2014 की जीत के बाद भाजपा के सहयोग से राज्य में सरकार बनाई, लेकिन यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल पाया और 2018 में यह सरकार गिर गई। बाद में राज्य में राज्यपाल शासन लगाया गया।

1983 में जब मुफ्ती ने कांग्रेस छोड़ी तो उस वक्त कहा था 'इंदिरा गांधी तो दिल्ली में रहती है, मैं तो कश्मीरियों के बीच रहता हूं। कश्मीर में मुफ्ती ने राजनीति तब शुरू की जब शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता चरम पर थी। ये भी अजब संयोग है कि शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता में कभी कमी तब आई जब उन्होंने इंदिरा गांधी से समझौता कर लिया और मुफ्ती मोहम्मद तब लोकप्रियता के रास्ते पर निकले जब उन्होंने इंदिरा का साथ छोड़ा, कांग्रेस का साथ छोड़ा और घाटी की उस शून्यता को भरने निकल पड़े जो सियासी बिसात पर दिल्ली का प्यादा बनकर कश्मीरित को ही खारिज हमेशा से करती रही। इसीलिए मुफ्ती ने अलगाववादियों को कभी खारिज नहीं किया। हुर्रियत नेता अब्दुल गनी बट तो उनके कालेज के सहपाठी रहे और मुफ्ती की सियासी बिसात को अक्सर नर्म अलगाववाद के तौर पर ही देखा और माना गया। मुफ्ती ने बंदूक उठाए युवा कश्मीरी को कश्मीर का खिलाड़ी मानने में कई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। मुफ्ती सईद और फारूक की पुरानी अदावत की वजह से केंद्र ने जगमोहन को राज्यपाल बनाकर कश्मीर भेजने का फैसला किया। जिसके बाद फारूक अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया। 19 जनवरी 1990 की रात एक संवैधानिक की रात थी। मुख्यमंत्री और गवर्नर कृष्णा राव दोनों के इस्तीफे हो गए थे। अगले दिन जब तक नए गवर्नर जगमोहन शपथ लेने पहुंचते पैरामिलिट्री एक्शन में कई लोगों की जाने गई, श्रीनगर के छोटा बाजार इलाके में रात भर सर्च अभियान चली। कुछ ही महीनों में कश्मीरी पंडितों पर हमले शुरू हुए और उनका पलायन शुरू हो गया। इसके बाद से कश्मीर का भविष्य क्या होगा इसका पता आने वाले कल के अलावा किसे को नहीं था। 

ओबीसी और मुस्लिम के रुप में नए सोशल काम्बिनेशन बनाने की चाह में वीपी सिंह को एक मुस्लिम नेता की जरूरत थी जो उन्हें चुनौती न दे सके। 1950 से राजनीति में सक्रिय  नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद जिन्होंने 1975 के इंदिरा गांधी शेख अब्दुल्ला पैक्ट की वजह से  कमजोर हुई कांग्रेस को फिर से खड़ा किया था। 1987 को राजीव फारूक समझौता के बाद मुफ्ती ने जन मोर्चा ज्वाइन कर लिया। कश्मीर घाटी की तीन लोकसभा सीटों में से एक श्रीनगर पर एक उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए। बारामूला और अनंतनाग में वोटिंग प्रतिशत क्रमश: 5.48 और 5.07 रहा। इसी वजह से मुफ्ती मोहम्मद सईद मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़े और लोकसभा के सदस्य बने। लेकिन मुफ्ती का राजनीतिक सफर एलओसी खीचे जाने के वक्त से शुरू हुआ था और उनकी पुत्री का सफर 1989 के आतंक के इस खौफ के बीच शुरू हुआ था। 

रूबिया सईद अपहरण

13 दिसंबर 1989 को श्रीनगर की सड़कों पर आंतक का हुजूम जीत के लिए निकला था। आंतकी जश्न श्रीनगर की सड़कों पर बंदूर लहराते हुए निकले थे। गली गली में एक नारा गूंज रहा था। जो करे खुदा का खौफ, उठा ले कलाश्निकोव। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए आपको कुछ दिन पहले लिए चलते हैं। 

8 दिसंबर 1989, शुक्रवार का दिन था। श्रीनगर में ठंड काफी बढ़ गई थी। दोपहर के करीब साढ़े तीन बजे थे। 23 साल की मेडिकल इंटर्न अपनी ड्यूटी खत्म करके लालदेड़ मेडिकल हॉस्पिटल के बाहर निकली। इतने बड़े राजनीतिक घराने की बेटी होने के बावजूद वो बस से आना जाना करती थी। बाकी दिनों की तरह ही उस मेडिकल इंटर्न ने बस स्टाप पर थोड़ी देर इंतजार करने के बाद एक मिनी बस में सवार हो गई। कश्मीर में तब तक स्थिति बिगड़ चुकी थी। कोई भी अगर किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से संबंध रखता था तो उसे अपनी सुरक्षा के बारे में सावधानी बरतना जरूरी था। रूबिया सईद तो मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी थी। जिन्होंने करीब पांच दिन पहले ही देश के पहले मुस्लिम गृह मंत्री के रूप में शपथ ली थी। बस एक जहग रूकी और कुछ लोग चढ़े। थोड़ी देर बाद बस ने अपने रास्ते की दिशा बदली और तीन लोग रूबिया सईदको घेर कर खड़े हो गए। उनमें से एक नाम यासिन मलिक का था। उनके खिलाफ अभी भी अपहरण का केस चल रहा है। थोड़ी दूर जाने के बाद बस रूकी उन तीनों ने बंदूक निकालकर रूबिया सईद को बस से नीचे उतरने को कहा। अपहरणकर्ता की मांग थी-

  • 5 जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) नेताओं की रिहाई
  • मकबूल बट्ट को दिल्ली के तिहाड़ से श्रीनगर लाया जाए

रूबिया सईद के अपहरण के वक्त फारूक अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। फारूक की राय में अपहरणकर्ताओं की मांग नहीं माननी चाहिए। वहीं केंद्र सरकार के हिसाब से प्राथमिकता रूबिया सईद की जिंदगी और रिहाई का था। गृह मंत्री की बेटी का अपहरण और इनके नुकसान की सूरत में राजा साहब यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह की नई नवेली सरकार के लिए बड़ी हार सरीखे होती। ऐसे में इंद्र कुमार गुराल, जार्ज फर्नान्डिस, आरिफ मोहम्मद खान पर्दे के पीछे बातचीत के प्लान को अंजाम दे रहे थे। इस फैसले का समर्थन बीजेपी ने भी किया। अंतत: केंद्र सरकार और एक बेटी और उसकी सुरक्षा को ज्यादा अहमियत दी गई। फारूक ने इस प्रस्ताव की खिलाफत की। मगर सरकार को बर्खास्त किए जाने के डर से चुप हो गए। 1989 में भारत सरकार ने जेकेएलएफ के कैदियों को रिहा किया और कुछ घंटों बाद रूबिया भी अपने घर पहुंच गई। जितनी मुंह उतनी बातें लोगों ने यहां तक कहा  कि एक पिता ने जानबूढकर अपनी बेटी को किडनैप करवाया ताकि आतंकवादियों को छुड़वाया जा सके। बहरहाल, 13 दिसंबर 1989 को श्रीनगर की सड़कों पर आतंक का हुजूम जीत के जश्न के लिए सड़कों पर निकला था। रूबिया सईदसईद को जब घर लाया जा रहा था। कश्मीर की सड़कों पर लोग खुशियां मना रहे थे। नाच रहे थे, पटाखे जला रहे थे, लेकिन रूबिया सईदकी रिहाई पर नहीं बल्कि 5 जेकेएलफ के कैदियों की रिहाई पर। 122 घंटे कैद में रहने के बाद रुबैया सईद घर जा रही थी। गली गली में एक नारा गूंज रहा था- ''जो करे खुदा का खौफ उठा ले उसे कलाश्निकोव''। उस वक्त रूबिया की रिहाई के लिए दिल्ली आतंकवादियों के सामने झुकी थी। आतंक के इस जश्न में मुफ्ती मोहम्मद सईद की हार हुई थी। उस वक्त वो दिल्ली में बतौर गृह मंत्री हारे तो वादी में इम्ही कश्मीरियों के बीच हारे जिनके लिए उन्होंने भारतीय बनकर संघर्ष किया था। घाटी में कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम और उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ने का सिलसिला शुरू हो गया था।

महबूबा मुफ्ती की पीडीपी

वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनावों में पीडीपी ने हिरासत में लिए गए कथित चरमपंथियों के रिहा किए जाने की बात और जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की कथित ज़्यादतियों की बात ज़ोरशोर से उठाई। इस पूरी विचारधारा पर मुफ़्ती मोहम्मद सईद से ज़्यादा उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती के व्यक्तित्व और राजनीति की छाप स्पष्ट नज़र आई। वर्ष 2008 में हो रहे चुनावों में पीडीपी ने ‘स्वशासन का नारा’ लगाया। पार्टी के मुताबिक स्वशासन के लिए भारतीय संविधान में व्यापक परिवर्तन की ज़रूरत है। इन बदलावों में प्रमुख हैं - संविधान का अनुच्छेद 356 जम्मू-कश्मीर पर लागू न हो और अनुच्छेद 249 भी लागू न हो जिससे राज्य के कार्यक्षेत्र में आने वाले विषयों पर भारतीय संसद क़ानून न बना सके। 

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बीजेपी पीडीपी गठबंधन

लंबे जद्दोजहद के बाद जम्मू कश्मीर में सरकार गठन को लेकर चल रही सियासी रस्साकशी खत्म हुई। उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पीडीपी महबूबा मुफ्ती की मुलाकात के बाद दोनों पाटियां जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने को लेकर राजी हो गई। मुफ्ती सईद प्रदेश के नए सीएम बनें, जबकि बीजेपी के निर्मल सिंह डिप्टी-सीएम। वहीं महबूबा ने कहा, ये सरकार सिर्फ पावर शेयरिंग के लिए नहीं बल्कि ये सरकार राज्य के लोगों के दिल को जीतने के लिए काम करेगी। लेकिन राज्य में तेजी से बदलते हालात के बाद दोनों पार्टियों का गठबंधन टूटा साथ ही राष्ट्रपति शासन लगने के बाद जम्मू कश्मीर से धारा 370 का भी हमेशा के लिए खात्मा हो गया। 

हाल ही में रिहा हुई महबूबा

पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती हाल ही में नज़रबंदी से रिहा की गई हैं। जिसके बाद से घाटी में राजनीतिक हलचल बढ़ी है। महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में तिरंगा पर बयान दिया था। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत कई पार्टियों ने मिलकर एक बार फिर अनुच्छेद 370 को वापस लाने की मांग की है। पार्टियों की ओर से एक गठबंधन बनाया गया है, गुपकार समझौता किया गया है। 







मुलायम सिंह को बिल क्लिंटन से जोड़ने वाले अमर सिंह, जिनके कई किस्से हैं मशहूर

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 27, 2021   15:04
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मुलायम सिंह को बिल क्लिंटन से जोड़ने वाले अमर सिंह, जिनके कई किस्से हैं मशहूर

ये अमर सिंह का ही करिश्मा था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन 2005 में लखनऊ के एक भोज में शामिल हुए थे। व्यापार जगत में भी उनके संबंध अनिल अंबानी से लेकर सुब्रत राय सहारा से अच्छे लिंक थे।

राजनीति की अमर कथा, सियासत की अमरवाणी। जब कभी ये वाक्य कहे जाते हैं तो सभी को पता होता है कि बात किसकी हो रही है। अमर सिंह राजनीति के गलियारों में ऐसा नाम जिसे दोस्तों का दोस्त और संकटमोचक कहा जाता था। कभी अखाड़ों में अपने विरोधियों को चित करने वाला एक पहलवान जो साइकिल से चढ़कर संसद तक पहुंचा। समाजवाद के आंदोलन से शुरुआत की तो समाजवादी पार्टी बना ली। समाजवाद से सियासत तक के सफर में नेताजी का यादववंश राजनीति का सबसे बड़ा कुनबा रहा। मैनपुरी से लोकसभा का चुनाव जीतकर मुलायम पहली बार संसद पहुंचे और देवगौड़ा की यूनाइटेड फ्रंट सरकार में रक्षा मंत्री बने।  यहीं से एक ऐसी दोस्ती की नींव पड़ी जिसके बाद तो राजनीति में उन दोनों की दोस्ती के कई किस्से चर्चा-ए-आम बने। दरअसल, मुलायम सिंह औ अमर सिंह के रिश्ते की नींव एचडी देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही शुरू हुई। एचडी देवगौड़ा को हिंदी नहीं आती थी और मुलायम सिंह अंग्रेजी नहीं जानते थे। उस वक्त देवगौड़ा और मुलायम के बीच संवादवाहक की भूमिका अमर सिंह की अदा करते थे। 

अमर सिंह को यूं ही संकटमोटक और दोस्तों का दोस्त नहीं कहा जाता था। उन्होंने मुश्किल वक्त में गिरती हुई सरकार और लड़खड़ाते हुए दोस्तों बखूबी संभाला था। अमर सिंह को 2008 में यूपीए की नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार बचाने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। गठबंधन की राजनीती वाले दौर में समाजवादी पार्टी जैसी 20-30 लोकसभा सीटें हासिल करने वाली पार्टियों की अहमियत को बढ़ा दिया। इसके साथ ही अमर सिंह की भूमिका में भी इजाफा हुआ। साल 1999 में सोनिया गांधी ने बहुमत के आंकड़े वाले 272 के जादुई नंबर का दावा तो कर दिया, लेकिन ऐन मौके पर सपा ने कांग्रेस को अपना सरर्थन नहीं दिया। जिसके बाद सोनिया गांधी की खूर किरकिरी भी हुई थी। साल दर साल बीता और 2008 में भारत के परमाणु करार के दौरान लेफ्ट पार्टियों ने यूपीए से अपना समर्थन वापस लेकर मनमोहन सरकार को अल्पमत में ला दिया। उ वक्त अमर सिंह संकट मोचक की भूमिका में सामने आए और समाजवादी पार्टी के सांसदों के अलावा कई निर्दलीय सांसदों को भी मनमोहन सरकार के पाले में ला कर खड़ा कर दिया। 

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जुदा हुई राहें

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले अमर सिंह ने राजनीति के दो विपरीत ध्रुव मुलायम सिंह और कल्याण सिंह को एक साथ ला दिया। लेकिन राजनीति और क्रिकेट में हर किसी का दिन एक जैसा नहीं  रहता। कल्याण सिंह की मुलायम से नजदीकी सपा को भारी पड़ी। मुलायम के कोर मुस्लिम वोट बैंक सपा से छिटकने लगे और पार्टी के 12 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव हार गए। चुनाव परिणाम के बाद पार्टी में उठते सवालों के बीच 6 जनवरी 2010 को अमर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। बाद में 2 फरवरी 2010 को मुलायम सिंह ने उन्हें पार्ची से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में अमर सिंह ने लोकमंच नाम से एक नई पार्टी का गठन किया और 14 छोटे दलों का सहयोग भी लिया। अमर सिंह अपने अंदाज में मुलायम सिंह को लगातार घेरते रहे लेकिन मुलायम ने उनके खिलाफ कुछ भी नहीं कहा। साल 2011 में अमर सिंह का वक्त न्यायिक हिरासत में बीता। साल 2012 में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 360 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। लेकिन एक भी सीट पर अमर सिंह की पार्टी को सफलता नहीं मिली। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह ने राष्ट्रीय लोक दल में शामिल होकर चुनाव लड़ा। लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।  कहा तो ये भी जाता है कि उन्होंने कांग्रेस में भी शामिल होने की खूब कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। आखिर में अमर सिंह की निगाहें वहीं आकर रूकी जिसके रंग ढंग को उन्होंने बगला था। 2016 में उनकी समाजवादी पार्टी में पुन: वापसी हुई। 

कैश फाॅर वोट कांड

2008 में संसद का मानसून सत्र चल रहा था। सदन में बीजेपी के तीन सांसद पहुंचे और नोटों की गड्डी लहराते हुए विरोध जताना शुरू किया। उस वक्त लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी हुआ करते थे। सांसदों ने अमर सिंह पर दलबदल को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। आरोप लगाने वाले सांसदों के नाम - फग्गन सिंह कुलस्ते, महावीर भगोरा और अशोक अर्गल थे। जिन्होंने दावा किया कि मनमोहन सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए उनको पैसे दिए गए। अमर सिंह पर दिल्ली पुलिस का शिकंजा कसा और उन्हें संसद कांड में मुख्य आरोपी बताकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। हालांकि बाद में अमर सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। 

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राज्यसभा के लिए चयन

16 मई 2016 को सपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में अमर सिंह के राज्यसभा जाने पर मुहर लगी। हालांकि अमर सिंह के नाम को लेकर पार्टी में विरोध की आवाजें भी उठी। लेकिन पार्टी मुलायम सिंह यादव के कड़े रुख को देखते हुए ये स्वर उस वक्त प्रखर नहीं हो सके।

अखिलेश से टकराव

मुलायम सिंह द्वारा अमर सिंह को राज्यसभा भेजे जाने के बाद कहा जाता है कि अमर सिंह ने कई बार अखिलेश से मिलने की कोशिश की। लेकिन अखिलेश ने उन्हें मिलने का वक्त तक नहीं दिया, जिसके बाद अमर सिंहृ की कुछ बयानबाजी आखिलेश को रास नहीं आई। अखिलेश को लगने लगा कि पार्टी में हो रहे विवाद के सूत्रधार अमर सिंह ही हैं। अमर सिंह उनके पिता मुलायम को भड़का रहे हैं। बाद में फिर से अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। 

बिल क्लिंटन लखनऊ भोज में हुए शामिल

समाजवादी पार्टी में फिल्म और ग्लैमर का तड़का लगाने वाले अमर सिंह ही थे। चाहे वो जया प्रदा को सांसद बनाना हो या जया बच्चन को राज्यसभा पहुंचाना। ये अमर सिंह का ही करिश्मा था। अमिताभ बच्चन के साथ तो अमर सिंह के ऐसे रिश्ते थे कि दोनों एक दूसरे को परिवार का सदस्य मानते थे। कहा तो ये भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की मुश्किल परिस्थितियों में अमर सिंह ने मदद की थी। हालांकि समाजवादी पार्टी से अमर सिंह के निकाले जाने के वक्त उनके कहने पर जया बच्चन ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया। इसके बाद से ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। व्यापार जगत में भी उनके संबंध अनिल अंबानी से लेकर सुब्रत राय सहारा से अच्छे लिंक थे। ये अमर सिंह का ही करिश्मा था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन 2005 में लखनऊ के एक भोज में शामिल हुए थे। 

पीएम मोदी को समर्पित है जीवन

योगी सरकार की ग्राउंड सेरेमनी का मौका था अमर सिंह अपने मित्र बोनी कपूर के साथ बैठे थे। प्रधान मंत्री मुस्कुराते हुए कहते हैं अमर सिंह बैठे हैं, सबकी हिस्ट्री निकाल देंगे। उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी उद्योगपतियों और राजनेताओं के संबंध की बात कर रहे थे। अमर सिंह ने सपा से मोहभंग होने के बाद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मेरा अब समाजनादी पार्टी से कोई लेना देना नहीं। मेरा जीवन नरेंद्र मोदी को समर्पित है। अमर सिंह ने योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की थी। कहा तो ये भी जाता है कि लोकसभा चुनाव 2019 के वक्त अमर सिंह के कहने पर ही जया प्रदा को रामपुर से टिकट दिया गया था। हालांकि जया प्रदा इस चुनाव में रामपुर से हार गईं थीं। 

बीच में अमर सिंह के मौत की खबर वायरल हुई जिसके बाद सिंगापुर से वीडियो जारी करते हुए अमर सिंह ने का था कि मैं अच्छा हूं या बुरा, लेकिन मैं आपका हूं। मैंने अपने तरीके से जिंदगी जी ली है मैं वापस लौटूंगा। हालांकि अमर सिंह नहीं लौट सके। अमर सिंह का 1 अगस्त 2020 को सिंगापुर के अस्पताल में निधन हो गया।  







गौरवशाली गणतंत्र के 72 साल: 26 जनवरी 1950, 10 बजकर 18 मिनट पर हमें हुई थी अस्तित्व की प्राप्ति

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 25, 2021   14:07
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गौरवशाली गणतंत्र के 72 साल: 26 जनवरी 1950, 10 बजकर 18 मिनट पर हमें हुई थी अस्तित्व की प्राप्ति

72 साल पहले घड़ी में 10 बजकर 18 मिनट हो रहे थे। जब 21 तोपों की सलामी के साथ भारतीय गणतंत्र का ऐतिहासिक ऐलान हुआ था। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले रहे थे। एक महान देश की अद्भुत यात्रा शुरू हो रही थी।

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।।

 कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।

दिल्ली सज धज कर तैयार है बलिदान समर्पण उपलब्धि के अभूतपूर्व लम्हे को मनाने के लिए। क्या क्या नज़र आएगा राजपथ पर इस परेड में वो सब हम आपके सामने। इसके साथ ही बताएंगे कि भारत गणतंत्र दिवस के लिए मुख्य अतिथि का चयन कैसे करता है? "जितने लोग देश हित के लिए कुर्बान हो गए हैं। जिन्होंने अपना अपना सबकुछ त्याग दिया है। जो जान की बाज़ी लगाकर इस संसार से उठ गए हैं। वो सब उस बीज की तरह आज भारत की स्वतंत्रता के रूप में पल्लवित और प्रफुल्लित होकर हमें फल देने लगे हैं।''

72 साल पहले घड़ी में 10 बजकर 18 मिनट हो रहे थे। जब 21 तोपों की सलामी के साथ भारतीय गणतंत्र का ऐतिहासिक ऐलान हुआ था। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले रहे थे। एक महान देश की अद्भुत यात्रा शुरू हो रही थी। वैसे तो राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक जाने वाली सड़क को पूरा देश राजपथ के नाम से जानता है। इसी सड़क पर हर साल देश अपने गणतंत्र की शक्ति और साहस का प्रदर्शन परेड के आयोजन के माध्यम से करता है। आज़ादी से पहले इस मार्ग को 'किंग्स वे' कहा जाता था, जिसका अर्थ है- राजा के गुज़रने का रास्ता। आज़ादी के बाद इसका नाम राजपथ कर दिया गया। लेकिन क्या आप इस बात से अवगत हैं कि 1950 से लेकर 1954 तक परेड का आयोजन स्थल राजपथ नहीं हुआ करता था। इन सालों में 26 जनवरी की परेड का आयोजन इरविन स्टेडियम यानी वर्तमान का नेशनल स्टेडियम, किंग्सवे, लाल किला और रामलीला मैदान से कदमताल करता हुआ साल 1955 में राजपथ की ओर अग्रसर हुआ। पहली बार गणतंत्र दिवस पर अतिथि के तौर पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकुर्णों सन 1950 में भारत पधारे थे। 1954 में भूटान के राजा जिग्मे डोरजी मुख्य अतिथि बने थे। 26 जनवरी की परेड राष्ट्रपति के स्वागत के साथ शुरू होती है। साथ ही 21 तोपों की सलामी भी दी जाती है। लेकिन वास्तव में 21 तोपों से गोला नहीं दागा जाता है बल्कि भारतीय सेना के 7 तोप जिन्हें 25 पौन्डर्स कहा जाता है के द्वारा तीन-तीन राउंड की फायरिंग की जाती है। 1955 में राजपथ पहली बार गणतंत्र के परेड से रूबरू हुआ तो इसके गवाह बने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद। हर साल गणतंत्र दिवस और बीटिंग रिट्रीट परेड में बाइबल से लिया गया गीत 'अबाइड विथ मी' बजाया जाता था, जिसे महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत कहा जाता है। लेकिन साल 2020 से इसका स्थान भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम ने ले लिया। साल 1960 में सोवियत संघ के मार्शल क्लीमेंट येफ्रेमोविक वारोशिलोव गणतंत्र दिवस परेड के मेहमान बने थे। इसके अगले वर्ष ब्रिटेन की महारानी क्वीन एलिजाबेथ भारत आईं। साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला साल 1995 में गणतंत्र दिवस के मेहमान बने थे। इसके अलावा लैटिन अमेरिका, ब्राजील, यूनाइटेड किंगडम, मालद्वीव, माॅरीशस और नेपाल को गणतंत्र दिवस में शरीक होने का अवसर मिला।

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वर्ष 2007 में रूस के ब्लादिमीर पुतिन भारत के खास मेहमान बनकर सामने आए। 2015 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए। 2016 में फ्रांस के राष्ट्रपति फैंकोइस होलांद भारत के गणतंत्र दिवस में आए। फ्रांस ने पांचवीं बार शिरकत की।

भारत के गणतंत्र दिवस में विशेष सम्मान के लिए निमंत्रण क्यों भेजा जाता है

गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि की यात्रा किसी भी विदेशी उच्च गणमान्य व्यक्ति की राज्य यात्रा के समान है। यह सर्वोच्च सम्मान है जो भारतीय प्रोटोकॉल के मामले में एक अतिथि को दिया जाता है। मुख्य अतिथि को राष्ट्रपति भवन में औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। वह शाम को भारत के राष्ट्रपति द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में भाग लेते हैं। वह राजघाट पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। उनके सम्मान में प्रधानमंत्री द्वारा लंच का आयोजन किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने पूर्व भारतीय विदेश सेवा अधिकारी और 1999 से 2002 के बीच प्रोटोकाॅल के प्रमुख के रूप में काम करने वाले मनबीर सिंह के हवाले से अपनी रिपोर्ट में लिखा कि मुख्य अतिथि की यात्रा प्रतीकात्मकता से भरपूर होती है। यह मुख्य अतिथि को भारत के गौरव और खुशी में भाग लेने के रूप में चित्रित करता है। इसके साथ ही भारत के राष्ट्रपति और मुख्य अतिथि द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए दो लोगों के बीच मित्रता को भी दर्शाता है।

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भारत गणतंत्र दिवस के लिए मुख्य अतिथि का चयन कैसे करता है

सरकार सावधानी से विचार करने के बाद किसी राज्य या सरकार के प्रमुख को अपना निमंत्रण देती है। यह प्रक्रिया गणतंत्र दिवस से लगभग छह महीने पहले शुरू होती है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार विदेश मंत्रालय द्वारा कई मुद्दों पर विचार किया जाता है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है संबंधित देश के साथ भारत के संबंध। अन्य कारकों में राजनीतिक, आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध, पड़ोस, सैन्य सहयोग, क्षेत्रीय समूहों में प्रमुखता शामिल हैं। ये सभी विचार अक्सर अलग-अलग दिशाओं में इंगित करते हैं - और मुख्य अतिथि चुनना, इसलिए, अक्सर एक चुनौती बन जाता है।

अतिथि की उपलब्धता के बाद विदेश मंत्रालय को चाहिए होती है मंजूरी

एमईए को विचार-विमर्श के बाद प्रधानमंत्री की स्वीकृति चाहिए होती है। जिसके बाद राष्ट्रपति भवन की मंजूरी मांगी जाती है। इसके बाद, संबंधित देशों में भारत के राजदूत संभावित मुख्य अतिथियों की उपलब्धता और कार्यक्रम का पता लगाने की कोशिश करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, संसद का सत्र या महत्वपूर्ण राज्य यात्रा जैसे कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्य उच्च गणमान्य व्यक्ति के पास उस समय हो। एक बार यह सारी प्रक्रिया पूरी हो गई उसके बाद विदेश मंत्रालय का प्रादेशनिक विभाग सार्थक वार्ता की दिशा में काम करते हैं। जबकि प्रोटोकॉल के प्रमुख कार्यक्रम के विवरण पर काम करते हैं। प्रोटोकॉल चीफ आगंतुक के विस्तृत कार्यक्रम के बारे में समकक्ष को समझाते हैं। गणतंत्र दिवस समारोह के बारे में इसके साथ ही सैन्य परिशुद्धता के साथ मिनट-दर-मिनट का पालन किया जाता है।

यदि परामर्श प्रक्रिया के दौरान असहमति हो तो क्या होगा?

यह एक महत्वपूर्ण पहलु है क्योंकि समय और बैठकों पर कुछ चर्चाएँ हो सकती हैं। गणतंत्र दिवस समारोह और उनके कार्यक्रम के संबंध में कोई लचीलापन नहीं होता है। कोई मुख्य अतिथि नहीं रहा है जिन्होंने भारत की प्रोटोकॉल आवश्यकताओं या कार्यक्रम के समय का पालन न किया हो। यह गौर करने वाली बात है कि दुनिया के ताकतवर मुल्क अमेरिक के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा जब मुख्य अतिथि के रूप में गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में शामिल हुए तो आवश्यकता अनुरूप वो भी पूरे कार्यक्रम में मौजूद रहे।

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अबकी बार 26 जनवरी को क्या-क्या दिखेगा?

हर साल 26 जनवरी के मौके पर भव्य परेड की तस्वीरों से देश तो अक्सर दो-चार होता है। परेड में अलग-अलग प्रदेशों की कला-संस्कृति की झांकियां दिखती हैं। परेड में भारतीय सेना के सभी कैटगरी की मार्च फास्ट भी देखने को मिलती है। लेकिन इस बार की 26 जनवरी की परेड और भी खास होने वाली है। हवा को चिड़ते जब राफेल की रफ्तार देखकर दुश्मन दहल जाएगा। सुखोई की उड़ान देखकर पाकिस्तान थर-थर कांपेगा। तेजस की उड़ान हिंदुस्तान की ताकत का अहसास कराएगी। शौर्य पराक्रम और साहस का प्रदर्शन होगा राजपथ पर जिसे देख कर हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। एयर फोर्स की झांकी में महिला पायलट शामिल होंगी। इस बार गणतंत्र दिवस पर राफेल गरजने के लिए तैयार है। राजपथ पर होने वाली परेड में वायुसेना के 42 एयरक्राफ्ट शामिल होंगे। लेकिन सबकी नज़र राफेल पर ही होगी। क्योंकि पहली बार होगा जब पूरा देश राफेल की ताकत राजपथ पर देखेगा। राफेल ही वर्टिकल चार्ली फॉर्मेशन के साथ फ्लाईपास्ट का समापन करेगा। वर्टिकल चार्ली फॉर्मेशन में विमान कम ऊंचाई पर उड़ान भरता है। सीधे ऊपर जाता है और फिर कलाबाज़ी खाते हुए एक ऊंचाई पर स्थिर हो जाता है। एक राफेल, दो जगुआर और दो मिग-29 विमान होंगे, इनके ठीक पीछे त्रिनेत्र फॉर्मेशन होगा। त्रिनेत्र के पीछे सांरग हेलीकाॅप्टर होंगे जो विजय फॉर्मेशन में फ्लाई पास्ट करेंगे। लास्ट में एक राफेल फाइटर आएगा जो कि आकर ठीक सामने वर्टिकल चार्ली फॉर्मेशन के साथ समापन करेगा। गणतंत्र दिवस पर सिर्फ राफेल ही अपना दम नहीं दिखाएगा बल्कि उसका साथ सुखोई भी देगा। हिन्दुस्तान की वायुसेना के वीर जगुआर और तेजस जब करतब दिखाएंगे तो देखने वाले बस देखते रह जाएंगे। भारतीय वायुसेना की पहली महिला फाइटर पायलट्स में से एक भावना कांत गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय वायुसेना की झांकी का हिस्सा होंगी। वो भावना कांत गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने वाली पहली महिला फायटर पायलट होंगी।

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अयोध्या का राम मंदिर

9 नवंबर 2019 को भक्तों की आस पर कार्तिक के मास में आखिरकार रामलला का वनवास खत्म हुआ था। 5 अगस्त 2020 को क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी अपने भगवान अपने इमामे हिन्द के अद्भूत मंदिर के नींव रखे जाने के साक्षी बने। अयोध्या में भगवान राम के दिव्य और भव्य मंदिर के लिए भूमि पूजन किया गया। लेकिन इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में अयोध्या पर बन रहे राम मंदिर की झांकी भी दिखाई जाएगी। यूपी सरकार ने केंद्र सरकार को इसके लिए प्रस्ताव भेजा था। केंद्र सरकार ने योगी सरकार के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। जिसके बाद गणतंत्र दिवस के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा कि उत्तर प्रदेश से राम मंदिर से जुड़ी झांकी पेश की जाएगी। इसे दो आर्किटेक्ट समेत 25 कारीगरों ने तैयार किया है। पर्यटन विभाग की झांकी में अयोध्या, प्रयागराज और वाराणसी के तीर्थ स्थल को दर्शाया जाएगा।

क्या गायब है

दुनिया में फैला डर, सन्नाटें में शहर, अल्लाह का घर, भगवान का दर, न किसी का आना न किसी का जाना। बच्चों ने पार्क में जाना छोड़ दिया, स्कूलों ने क्लास लगाना छोड़ दिया। छोड़ दिया लोगों ने सिनेमा में जाना, पिकनिक मनाना। सभाएं, आंदोलन, धरना-प्रदर्शन टल गए। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को चुनौती दी, एक-एक दिन में सैकड़ों जाने ली। वैसे तो कोरोवा वैक्सीन के आने से कोरोना का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। लेकिन इस बार के कोरोना काल के बाद इसकी वजह से बदलाव की कुछ झलक गणतंत्र दिवस के परेड कार्यक्रम में भी देखने को मिलेगी।

26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस जब दूसरे देशों के राष्ट्रप्रमुख, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया जाता रहा है। इसी तरह इस बार गणतंत्र दिवस पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जाॅनसन को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था। लेकिन ब्रिटेन में कोरोना के नए स्ट्रेन के मद्देनजर बोरिस जाॅनसन ने अपना भारत दौरा रद्द कर दिया है। 1966 के बाद पहली बार ऐसा होगा कि कोई विदेशी अतिथि गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल नहीं होगा। 1952 और 1953 में भी गणतंत्र दिवस परेड में कोई मुख्य अतिथि शामिल नहीं हो सका था।

पिछले वर्ष डेढ़ लाख दर्शक गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में थे लेकिन अब इस वर्ष इसे कम करके 25 हजार कर दिया गया है। इसके अलावा मीडियाकर्मियों की संख्या में भी कटौती करके 300 से 200 कर दी गई है।

इस बार की परेड इंडिया गेट के सी हेक्सागाॅन में नेशनल स्टेडियम तक ही जाएगी। हां, झाकियां लाल किले तक जाएगी।

इस बार पूर्व सैनिकों और महिलाओं द्वारा परेड और सेना व केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के सैनिकों का मोटरसाइकिल स्टंट को रद्द कर दिया गया है।

15 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को इंडिया गेट लाॅन में अनुमति नहीं दी जाएगी और इस बार स्कूली बच्चों के लिए भी कोई परिक्षेत्र नहीं होगा।

बहरहाल, बदलते हिन्दुस्तान का हर पहलु दुनिया के सामने जाने की होड़ में होगा। आत्म निर्भर भारत की झलक, राम मंदिर की झांकी। राफेल की गर्जना के साथ ही राज्यों की झांकियां भी होंगी। वीरता भी होगी और वीर भी रहेंगे। 15 अगस्त को अगर हिन्दुस्तान ने आजादी के रूप में अपनी नियति से मिलन किया था तो 26 जनवरी को हमे अस्तित्व की प्राप्ति हुई थी। - अभिनय आकाश







आजादी लेकिन पाकिस्तान के बिना और हिन्दुस्तान के साथ, कुछ ऐसी रही है लोन परिवार की कश्मीर को लेकर सोच

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 21, 2021   18:34
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आजादी लेकिन पाकिस्तान के बिना और हिन्दुस्तान के साथ, कुछ ऐसी रही है लोन परिवार की कश्मीर को लेकर सोच

कश्मीर के नेता सज्जाद लोन जिन्हें पीएम मोदी का करीबी भी माना रहा है। कभी फारूक अब्दुल्ला द्वारा उनके पिता पर कश्मीर में बंदूक लाने का जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। तो कभी सूबे के राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा लोन को बीजेपी की तरफ से सीएम बनाने की तैयारी की बात भी कह दी जाती है।

पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन जिसमें जम्मू कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं वो अब धीरे-धीरे बिखरने लगी हैं। पीपुल्स कांफ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद लोन ने गुपकार गठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया है। गुपकार घोषणापत्र गठबंधन के घटक दलों में जारी वर्चस्व और कलह के बारे में उल्लेखित करते हुए कहा कि कोई दल एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते। जिसके बाद सज्जाद लोन ने गुपकार गठबंधन से अलग होने का फैसला किया। बता दें कि डीडीसी चुनावों के परिणाम आने के बाद महबूबा मुफ्ती भी गुपकार गठबंध से किनारा कर रही हैं। वो गुपकार की किसी बैठक में भी शामिल नहीं हुईं। जिसके बाद सज्जाद लोन का ये बड़ा फैसला आया। ऐसे में आज के विश्वेषण में बात करेंगे जम्मू कश्मीर की और कश्मीर के नेता सज्जाद लोन की। जिन्हें पीएम मोदी का करीबी भी माना रहा है। कभी फारूक अब्दुल्ला द्वारा उनके पिता पर कश्मीर में बंदूक लाने का जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। तो कभी सूबे के राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा लोन को बीजेपी की तरफ से सीएम बनाने की तैयारी की बात भी कह दी जाती है। कौन हैं कश्मीर का लोन परिवार जो मुफ्ती का भी करीबी रहा और मोदी का भी। 

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सज्जाद लोन को जानने से पहले उनके पिता अब्दुल गनी लोन को जानना बहुत जरूरी है। एक गरीब परिवार में जन्में अब्दुल गनी लोन की चाह शुरू से ही वकील बनने की थी। अपने मकसद में उन्हें कामयाबी भी मिलती है। लेकिन ये उन्हें तो राजनीति में आना था और यही चाह अब्दुल गनी लोन को कांग्रेस के दरवाजे पर लेकर आती है। वो साल 1967 में कांग्रेस से जुड़ते हैं और फिर धीरे-धीरे अपनी सियासत को मजबूत करने की चाह लिए 1978 में जम्मू कश्मीर पीपुल्स काॅन्फ्रेंस का गठन किया। जम्मू कश्मीर में अब्दुल गनी लोन ने राजनीति तब शुरू की जब शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता चरम पर थी। उसी वक्त लोन कश्मीर को और अधिक दिलाने की मांग लिए अब्दुल्ला की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश में लग गए। लेकिन शुरुआती दो चुनाव में उन्हें पराजय ही मिलती है। 1983 में 10 वोट से और 1987 को 430 वोटों से। जिसके बाद अब्दुल गनी लोन अलगाववाद के रास्ते पर चल पड़ते हैं। उनके साथ मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के भी लोग साथ आ जाते हैं। अब्दुल गनी लोन कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर देखना चाहते थे। अपनी अलगाववादी कार्यों और बयानों की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। पूर्व राॅ चीफ एएस दुलत की किताब कश्मीर द वाजपेयी इयर्स के मुताबिक 1992 में जब लोन जेल से बाहर आए तो उनके दिमाग में बस अलगाववादियों का एक संगठन बनाने की बात थी। कश्मीर द वाजपेयी इयर्स के अनुसार लोन इसके लिए आईएसआई से भी सलाह मशवरा किया था। घाटी में 13 जुलाई 1993 को ऑल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस की नींव रखी गई। हुर्रियत कांफ्रेंस का काम पूरी घाटी में अलगाववादी आंदोलन को गति प्रदान करना था। यह एक तरह से घाटी में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के विरोध स्वरूप एकत्रित हुई छोटी पार्टियों का महागठबंधन था। इस महागठबंधन में केवल वही पार्टियां शरीक हुईं जो कश्मीर को वहां के लोगों के अनुसार जनमत संग्रह कराकर एक अलग पहचान दिलाना चाहती थीं। हालांकि इनके मंसूबे पाक को लेकर काफी नरम रहे। ये सभी कई मौकों पर भारत की अपेक्षा पाक से अपनी नजदीकियां दिखाते रहे हैं। 90 के दशक में जब घाटी में आतंकवाद चरम पर था तब इन्होंने खुद को वहां एक राजनैतिक चेहरा बनने की कोशिश की लेकिन लोगों द्वारा इन्हें नकार दिया गया। एपीएचसी  की एग्जिक्‍यूटिव कांउसिल में सात अलग-अलग पार्टियों के सात लोग बतौर सदस्‍य शामिल हुए। जमात-ए-इस्‍लामी से सैयद अली शाह गिलानी, आवामी एक्‍शन कमेटी के मीरवाइज उमर फारूक, पीपुल्‍स लीग के शेख अब्‍दुल अजीज, इत्‍तेहाद-उल-मुस्लिमीन के मौलवी अब्‍बास अंसारी, मुस्लिम कांफ्रेंस के प्रोफेसर अब्‍दुल गनी भट, जेकेएलएफ से यासीन मलिक और पीपुल्‍स कांफ्रेंस के अब्‍दुल गनी लोन शामिल थे। अब्दुल गनी लोन कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के काफी नजदीक हो जाते हैं। ओल्ड टाउन श्रीनगर की ईदगाह में मीरवाइज मौलवी फारुख की 12वीं मेमोरियल सर्विस में शरीक हुए थे तभी 21 मई 2002 को अब्दुल गनी लोन की आतंकिों द्वारा हत्या कर दी जाती है। जब अब्दुल गनी लोन की हत्या हुई तो उनके पुत्र सज्जाद लोन ने अपने पिता की हत्या में आईएसआई का हाथ होने की बात कही थी। लेकिन बाद में अपनी मां के कहने पर उन्होंने अपने आरोप वापस ले लिए थे। सज्जाद की मां हनीफा का कहना था कि मैंने अपने पति को खोया है और अब अपना बेटा नहीं खोना चाहती। बाद में सज्जाद लोन ने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया और अलगाववाद की राजनीति की वकालत शुरू कर दी।

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फारूक ने लोन को कश्मीर में बंदूक लाने का जिम्मेदार ठहराया

नेशनल काॅन्फ्रें, के नेता फारूक अब्दुल्ला ने एक बार अब्दुल गनी लोन को कश्मीर में बंदूक लाने का जिम्मेदार ठहराया था। जिसके पीछे अब्दुल्ला ने इतिहास की एक घटना का हवाला देते हुए कहा कि पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने जब उन्हें निलंबित किया था, उस वक्त अब्दुल गनी लोन उनके पास आए थे। उन्होंने कहा था कि वह पाकिस्तान से बंदूक लाएंगे। अब्दुल्ला ने कहा कि उस वक्त मैंने लोन को बहुत समझाया था, लेकिन वह माने नहीं। 

मुशर्रफ से कहा- पाकिस्तान के बारे में चिंता करें

कश्मीर द वाजपेयी इयर्स के अनुसार एक बार अब्दुल गनी लोन पाकिस्तान के जनरल परवेज मुशर्रफ से मिले तो उन्होंने गनी लोन से पूछा कि कश्मीर के हालात कैसे हैं तो इस पर लोन ने फट से जवाब देते हुए कहा कि कश्मीर के बारे में चिंता मत कीजिए, पाकिस्तान को देखिए। आपके कट्टरपंथी उसी हाथ को काट लेंगे जो उन्हें खिलाते हैं। 

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सज्जाद लोन की कश्मीर की सियासत में एंट्री

सज्जाद लोन कश्मीर की आजादी की बात करते रहे लेकिन पाकिस्तान के बिना और हिन्दुस्तान के साथ। मतलब आसान भाषा में समझें तो कश्मीर की और स्वायतता की मांग। साल 2002 में सज्जाद लोन के खिलाफ अलगाववादी उम्मीदवारों के खिलाफ डमी उम्मीदवार उतारने के आरोप भी लगे। बाद में उन्होंने हुर्रियत से अलग होना शुरू कर दिया। कश्मीर को लेकर सज्जाद हमेशा से मुखर रहे और साल 2006 में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात भी की। 2008 में अमरनाथ हिंसा के बाद खुद को सज्जाद लोन ने अलगाववाद से अलग कर लिया। साल 2008 और 2009 के दौरान सज्जाद लोन ने विधानसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन दोनों बार ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2014 में बारामूला में निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए भी उन्हें हार ही मिली। साल 2014 में उनकी पार्टी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की और बीजेपी-पीडीपी गठबंधन वाली सरकार में मंत्री बने। बाद में कश्मीर में विधानसभा भंग हो गई थी और सूबे में राष्ट्रपति शासन लग गया था। हाल ही में हुए डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल के चुनाव में जेकेपीसी ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की है। सज्जाद लोन को पीएम मोदी का करीबी भी माना जाता है। पीएम मोदी के कश्मीर दौरे के दौरान वह उनके साथ नजर भी आ चुके हैं। सज्जाद लोन की एक बहन हैं जिनका नाम शबनम लोन है। वह सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और कश्मीर मुद्दे को लेकर काॅलम लिखती हैं। -अभिनय आकाश







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