इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व की जंग, अतातुर्क के तुर्की में Ertugrul वाया Erdogan

इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व की जंग, अतातुर्क के तुर्की में Ertugrul वाया Erdogan

तुर्की एक मुस्लिम बहुल्य देश हैं जहां करीब 98 फीसदी जनता इस्लाम को मानती है और तुर्की की गिनती उन गिने-चुने मुस्लिम देशों में होती है जिन्हें सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर माना जाता रहा है। वर्ष 1299 से 1922 तक तुर्की में ऑटोमन साम्राज्य का शासन था।

''मस्जिदें हमारी छावनी हैं, गुंबदें हमारी रक्षा कवच, मीनारें हमारी तलवार और इस्लाम के अनुयायी हमारे सैनिक हैं।'' बात आज एक मस्जिद की करेंगे , मीनारों और दीवारों की भी करेंगे, इस्लामीकरण की ओर तेजी से बढ़ते एक मुल्क के मुक्कदर की करेंगे और साथ ही इसको लेकर खींच रही तलवारों की भी करेंगे। इस्लामी देश बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ाते तुर्की में एक बड़ा वाक्या देखने को मिला। तुर्की के काले सागर तट से एक बड़े प्राकृतिक गैस का भंडार मिला है। इसके बाद प्राकृतिक गैस के आयात पर तुर्की की निर्भरता को कम करने में मदद करेगा। तुर्की के राष्ट्रपति के मुताबिक, काला सागर में ‘फ़तेह नामक ड्रिलिंग जहाज़’ द्वारा खोजा गया यह गैस भंडार 320 अरब क्यूबिक मीटर का है। वहीं तुर्की में देखते ही देखते चर्च को तोड़ कर मस्जिद में बदलने का सिलसिला सा चल गया है। इस्लामीकरण की हवा देश में तेजी से चल रही है और देश के राष्ट्रपति एर्दोआन इस कट्टरता की मुहिम के सरकारी संरक्षक हैं। इस्तांबुल के एक लोकप्रिय चोरा चर्च जिसे कारी संग्रहालय भी कहते हैं को मस्जिद में बदल दिया गया है। इसके पहले तुर्की में जिस चर्च को तोड़ कर मस्जिद में बदला गया था उसे हागिया सोफिया चर्च के नाम से जाना जाता था। इस चर्च को मस्जिद बना देने को लेकर दुनिया भर में तुर्की को विरोध झेलना पड़ा। अब आपको गैस के भंडार और चर्च को मस्जिद में बदलने व तुर्की में इस्लामीकरण की हवा तेजी से चलने के पीछे की कहानी से अवगत कराते हैं। 

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एक टीवी सीरियल Dirilis Ertugrul,  2014 में आया और अपने मुल्क तुर्की में खूब पॉपुलर रहा। इतना की लगभग पांच सीजन आ गए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसको देखने की अपील भी कर डाली। इसे मुसलमानों का Game of Thrones कहा जा रहा है। अगर एक लाइन में एर्तुग्रुल को परिभाषित करें तो ऑटोमन एम्पायर यानी उस्मानिया सल्तनत के उभरने की गौरव गाथा। जिसकी टाइमलाइन है 600 सालों की यानी 1299 से 1922 तक की।

उस्मानी सल्तनत 16वीं शताब्दी में इतना ताकतवर हो गया था कि कई भाषाओं वाले भू-भाग पर राज करता था। मुस्लिम तुर्की की आक्रमणकारी मंगोलो से लेकर पूर्वी रोमण साम्राज्य वालों से हुई लड़ाईयां। एर्तग्रुल गाजी उस्मानिया सल्तनत के संस्थापक उस्मान के पिता थे। इसको तुर्की के सरकारी टीवी चैनल टीआरटी-1 पर प्रसारित किया गया था। इस सीरिज में ऐतिहासिक तथ्यों से ज्यादा इस्लामिक राष्ट्रवाद और रजब तैयब एर्दोआन की राजनीति के साथ वर्तमान के सियासी मूड को भुनाने की पूरी कोशिश की गई है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि गिरती अर्थव्यवस्था से एर्दोआन की लोकप्रियता कम हो गई है इसलिए मुस्लिम बहुसंख्यकों को कट्टरता की तरफ घकेल रहे हैं इन्हें खुश करते नजर आ रहे हैं। जैसा कि हमने आपको बताया कि तुर्की में गैस का भंडार मिला है और फ़तेह नामक ड्रिलिंग जहाज़ ने इसे ढूंढ़ा है। अब आपको बता दें कि मुहम्मद द्वितीय फ़ातिह 1444 से 1446 और 1451 से 1481 तक उस्मानिया साम्राज्य के सुलतान रहे। उन्होंने क़रीब 21 साल की उम्र में क़ुस्तुंतुनिया पर फ़तेह करके बाज़न्तीनी साम्राज्य को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया था। मतलब गैस को खोजने वाले ड्रिलिंग जहाज का नाम भी इी सुल्तान से प्रभावित होकर रखा गया। 

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तुर्की के राष्ट्रपति की विदेश मामलों की रणनीति का लक्ष्य मुसलमान होने का गर्व वापस लाना है। वो ऑटोमन का आधुनिक वर्जन लाना चाहते हैं ताकि तुर्क इस्लामिक महानता का नेतृत्व कर सकें। जिसका जिक्र उन्होंने कई बार अपने भाषणों में भी किया है। अर्दोआन कई बार इस बात को कह चुके हैं कि तुर्की एकमात्र देश है, जो इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। ज़ाहिर है एर्दोआन जब ऐसा कहते हैं तो उनके दिमाग़ में ऑटोमन साम्राज्य की विरासत रहती होगी। वो ऑटोमन साम्राज्य, जो सोवियत संघ से भी बड़ा था। यह 2.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला था। ऑटोमन साम्राज्य का विस्तार मिस्र, ग्रीस, बुल्गारिया, रोमानिया, मेसिडोनिया, हंगरी, फ़लस्तीन, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, अरब के ज़्यादातर हिस्सों और उत्तरी अफ़्रीका के अधिकतर तटीय इलाक़ों तक था। यह साम्राज्य मुस्लिम शासकों को मान्यता देता था। एर्दोआन को लगता है कि इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करना तुर्की का ऐतिहासिक हक़ है। लेकिन एर्दोआन इस बात को भूल जाते हैं कि वो अब 2.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर वाले ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान नहीं हैं, बल्कि सात लाख 83 हज़ार वर्ग किलोमीटर में सिमट चुके तुर्की के राष्ट्रपति हैं। 

तुर्की एक मुस्लिम बहुल्य देश हैं जहां करीब 98 फीसदी जनता इस्लाम को मानती है और तुर्की की गिनती उन गिने-चुने मुस्लिम देशों में होती है जिन्हें सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर माना जाता रहा है। वर्ष 1299 से 1922 तक तुर्की में ऑटोमन साम्राज्य का शासन था। 1923 में तुर्की को इस साम्राज्य से आजादी मिल गई और इसका श्रेय तुर्की के पूर्व तानाशाह मुस्तफा कमाल अतातुर्क को जाता है।

वो तानाशाह होने के साथ ही प्रगतिशील भी थे और तुर्की को एक सेक्युलर देश बनाना चाहते थे। जो फ्रांस के सेक्युलरिज्म के सिद्धांत पर आधारित था। जिसके तहत धर्म और सरकार को एक दूसरे से अलग रखा जाता है। 1924 में संविधान बना और 1928  में इस्लाम से स्टेट रिलीजन का दर्जा वापस ले लिया गया। संविधान के तहत ही अतातुर्क ने तुर्की की सेना को देश में हमेशा सेक्युलरिज्म कायम रखने की जिम्मेदारी दी। तुर्की में धार्मिक प्रतीक चिन्हों के इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगा दी थी। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क की राजनीतिक विचारधारा की बहुत सराहना करते थे।

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1965 और 1971 के युद्ध में जब तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया तो दोनों देशों के रिश्तों में दरार और बढ़ गई। साल 2000 में तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री बुलेंट एसविट ने भारत का दौरा किया। करीब 15 सालों में किसी तुर्की नेता का ये पहला दौरा था। तुर्की राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के लोकतंत्र को कुचलकर सत्ता में आने की आलोचना की।

साल 2003 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने भी तुर्की का दौरा किया था। तुर्की में उनका जमकर स्वागत हुआ। जब दोनों देशों के रिश्ते सामान्य होने की तरफ आगे बढ़ रहे थे, तभी तुर्की की राजनीति में एर्दवान का उदय हुआ। साल 2002 में एर्दोआन ने इस्लाम की वापसी का नारा देते हुए चुनाव जीता। एर्दोआन सत्ता में आते ही तुर्की के सेक्युलर ताने-बाने को ढहाते हुए उसे इस्लामिक राष्ट्र की तरफ आगे बढ़ाने लगे। अर्दोआन के तुर्की की राजनीति में उभार में इस्लामिक कट्टरता की अहम भूमिका रही है। उनके भाषणों से मुसलमानों को यह लगता होगा कि वो धर्म की रक्षा और उसके हित की बात कर रहे हैं लेकिन इसके साथ ही कई तरह के विरोधाभास भी दिखते हैं। एर्दोआन जब 2003 में तुर्की के प्रधानमंत्री बने, तभी अमरीका इराक़ पर हमले की तैयारी कर रहा था। एर्दोआन की सद्दाम हुसैन से नहीं बनती थी। यहाँ तक कि उन्होंने अमरीका को इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध में तुर्की की ज़मीन का इस्तेमाल करने देने का मन बना लिया था। हालाँकि एर्दोआन का यह इरादा पूरा नहीं हुआ क्योंकि संसद में तीन वोट से यह प्रस्ताव गिर गया। इराक़ पर अमरीका के हमले में इस्लाम के हज़ारों अनुयायी मारे गए, मस्जिदें ध्वस्त हुईं, मीनारे टूटीं और एर्दोआन इस युद्ध में अमरीका के साथ थे। एक तरफ़ एर्दोआन का मुस्लिम प्राइड और उसके हित की बात करना और दूसरी तरफ़ इराक़ में अमरीका के हमले का समर्थन करना दोनों बिल्कुल उलट हैं। 

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इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व की जंग

मुस्लिम दुनिया कई धड़ों में बंटी हुई है और हर कोई इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की होड़ में है। खाड़ी के अरब देश और मिस्त्र जहां अमेरिका के गुट में शामिल हैं, वहीं कतर और तुर्की अपने ही बनाए रास्ते पर चल रहे हैं जबकि ईरान, सीरिया और लेबनान में हिजबुल्लाह अलग गुट बनाए हुए हैं। सऊदी अरब को लगता है कि हाउस ऑफ सऊद के नियंत्रण में इस्लामिक पवित्र स्थल मक्का और मदीना हैं। यहाँ हर साल दुनिया भर से 20 लाख से ज़्यादा मुसलमान आते हैं। ऐसे में इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व वही कर सकता है। हालांकि तुर्की ख़ुद को सऊदी से ज़्यादा ताक़तवर मानता है और उसे लगता है कि वो मुसलमानों का सच्चा हितैशी है। अर्दोआन का इस्लामिक राष्ट्रवाद और सऊदी अरब को रोकने की रणनीति साथ-साथ चलते रहे हैं। एर्दोआन फ़लस्तीन और रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर भी मुखर रहे। इस्तांबुल अरब वर्ल्ड के बाग़ियों का भी पसंदीदा अड्डा बना। पिछले कुछ वक्त में पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की मिलकर मुस्लिम देशों का अलग गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश करते दिखे हैं। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान तीनों देशों ने इस्लामोफोबिया को लेकर आवाज उठाई थी। तुर्की ने हाल ही में एक म्यूजियम को मस्जिद में तब्दील कर साफ संदेश दिया कि वह अब यूरोप की तरफ नहीं बल्कि इस्लामवाद की तरफ आगे बढ़ना चाहता है।  तुर्की की इस कोशिश में पाकिस्तान उसे भरपूर समर्थन दे रहा है। ऐसा लग रहा है कि चीन और पाकिस्तान के समर्थन से तुर्की सऊदी से उसकी जगह छीनकर इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की भूमिका में आना चाह रहा है। 

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वहीं तुर्की के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर हैं और पाकिस्तान से भारत की शत्रुता उसके बनने के बाद से ही रही है। लेकिन सऊदी अरब पाकिस्तान का ऐसा दोस्त रहा है जिसने हर मुश्किल वक्त में उसका साथ दिया।  हाल के दिनों में पाकिस्तान को तुर्की की दोस्ती इस कदर रास आई है कि वो सऊदी को भी किनारे कर दे रहा है। सऊदी से पाकिस्तान की इस दूरी के पीछे भी कश्मीर मुद्दा ही है। जहां कश्मीर मुद्दे पर सऊदी भारत को समर्थन दे रहा है, वहीं, तुर्की खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा है। यही वजह है कि कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद से जितनी तेजी से भारत और पाकिस्तान के बीच कड़वाहट बढ़ी है, उतनी ही तुर्की से भी। भारत से रिश्ते खराब करने में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दवान की अहम भूमिका है। एर्दवान तुर्की जैसे आधुनिक और सेक्युलर मूल्यों वाले देश के कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपति हैं जो उसी आईने में विदेश संबंधों को भी देखते हैं। कश्मीर भी उनके इसी इस्लामिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है। तुर्की के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हामी एकसोय ने कहा कि भारत ने अपने इस कदम से जम्मू-कश्मीर के हालात और जटिल बना दिए हैं और इससे क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में कोई मदद नहीं मिली है। तुर्की ने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और प्रस्तावों के तहत वार्ता के जरिए सुलझाने की बात कही। जहां तह बात तुर्की में तेजी से बढ़ते इस्लामीकरण की है और चर्च को मस्जिद में बदलने की तो अमेरिका से लेकर रूस तक दोनों पहली बार एक सुर में इस कदम की मुखालिफत की है।  यूनेस्को ने भी चिट्ठी भेजकर इसपर आपत्ति जताई है। - अभिनय आकाश 






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