दो भाई, दोनों तबाही...क्या है भारत-रूस का RELOS समझौता? चीन-पाक और US की हेकड़ी निकली

हाल ही में भारत दौरे से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने इस इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट को रटिफाई करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस एग्रीमेंट का मकसद भारत और रूस के बीच मिलिट्री डिप्लॉयमेंट, पोर्ट्स पर वॉरशिप्स की डॉकिंग और मिलिट्री एयरक्राफ्ट के लिए एयर स्पेस और एयर फील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल के लिए एक क्लियर फ्रेमवर्क तैयार करना है।
दो भाई और दोनों तबाही। चीन, पाकिस्तान और यूएस की हेकड़ी निकाल दी। एक पैक्ट, एक समझौता जो हुआ है भारत और रूस के बीच। भारत और रूस के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों और गहराते डिफेंस कोऑपरेशन को दर्शाते हुए एक अहम समझौता औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया है। भारत और रशिया के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इस फैक्ट के तहत दोनों देश एक दूसरे की टेरिटरी में अधिकतम 3000 मिलिट्री पर्सनल तैनात कर सकेंगे। सिर्फ सैनिक ही नहीं इस एग्रीमेंट के तहत शिप्स और एयरक्राफ्ट को भी एक दूसरे के क्षेत्र में तैनात करने की अनुमति दे दी गई है। यह समझौता रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट यानी रेलोस से जुड़ा हुआ है। जिसमें जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइजज़, ट्रेनिंग और ह्यूमैनिटेरियन मिशनंस जैसे पहलू भी शामिल हैं। हाल ही में भारत दौरे से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने इस इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट को रटिफाई करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस एग्रीमेंट का मकसद भारत और रूस के बीच मिलिट्री डिप्लॉयमेंट, पोर्ट्स पर वॉरशिप्स की डॉकिंग और मिलिट्री एयरक्राफ्ट के लिए एयर स्पेस और एयर फील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल के लिए एक क्लियर फ्रेमवर्क तैयार करना है।
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क्या है यह रेलॉस एग्रीमेंट?
द इंडियन रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट। इस एग्रीमेंट के तहत जरूरत पड़ने पर भारतीय सेना रशिया के कुछ चुनिंदा सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएगी। ठीक वैसे ही रशिया भी जरूरत पड़ी तो भारत के कुछ सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेगा। यह समझौता कुछ कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे अमेरिका मित्र देशों के सैन्य ठिकानों को अपने मिशन के लिए इस्तेमाल करता है। ठीक वैसे ही भारत और रशिया समय आने पर इसी तरह से एक दूसरे की जमीन का इस्तेमाल करेंगे अगर युद्ध में जरूरत पड़ती। जब दुनिया की दूसरी और चौथी सबसे ताकतवर सेनाएं एक साथ मिलकर खड़ी होंगी तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोक नहीं पाएगी। रूस और भारत ने अपनी दोस्ती को एक कदम आगे ले जाते हुए एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी की है जिसे देखकर दुनिया की कई महाशक्तियों के माथे पर सिकन नजर आने लगी है। भारत और रूस ने एक ऐसा समझौता किया जिससे दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे और इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्कटिक क्षेत्र तक और रूस की पहुंच हिंद महासागर तक हो जाएगी। इन दोनों ताकतवर देशों ने पल-पल बदल रही वैश्विक परिस्थितियों और जंग के माहौल के बीच यह समझौता अमल में लाकर दुश्मनों को परेशान कर दिया है। भारत और रूस के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इसके तहत भारत और रूस एक दूसरे के सैन्य ठिकानों पर अस्थाई बेस बना सकेंगे।
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अमेरिका ने कई देशों में बनाए अपने सैन्य ठिकाने
ईरान युद्ध में हमने देखा कि हवाई हमलों के लिए अमेरिका ने यूरोपीय देशों में बने अपने सैन्य ठिकानों की मदद ली। अमेरिका से सीधे ईरान पर हमले करना खर्चीला है और समय भी काफी लगता है। इसी वजह से अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के अपने ऑपरेशंस के लिए यूरोपीय देशों और मिडिल ईस्ट के भी कई देशों में अपने सैन्य ठिकाने बनाए हैं। इनमें कुछ स्थाई है और कुछ अस्थाई। ठीक वैसे ही अब से भारत और रूस एक दूसरे के सैनिक ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे। भारत के लिए रिलोस एग्रीमेंट रणनीतिक रूप से काफी फायदेमंद है। इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्थिक क्षेत्र तक हो जाएगी। दुनिया की लगभग सभी महाशक्तियां जैसे अमेरिका, रूस और चाइना इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। अभी तक भारत और रूस एक दूसरे के किन सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेंगे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस समझौते के बाद भारतीय सेना रूस के एक बड़े पोर्ट मुरबंस और नॉर्दन प्लीट के मुख्यालय सिविरो म्स पर अपनी तैनाती कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इससे भारतीय नौसेना की वैश्विक मौजूदगी बढ़ेगी और दूरदराज के सैन्य ऑपरेशन आसान हो जाएंगे। युद्ध की स्थिति में युद्धपोतों को बार-बार भारत वापस नहीं आना पड़ेगा। इसके अलावा चाइना के पास ब्लादी बोस्टोक पर भी भारतीय सैनिक तैनात किए जा सकते हैं। इसके अलावा कामचटका पर भी भारतीय सेना की रणनीतिक मौजूदगी हो सकती है। यह भी महत्वपूर्ण ठिकाना होगा। इसके अलावा रूस भी भारतीय सैन्य ठिकानों पर अपनी मौजूदगी से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर दबदबा बढ़ा सकता है।
5 वर्षों तक के लिए किया गया समझौता
इस पूरे क्षेत्र पर दोनों देशों की मौजूदगी से अमेरिका और चाइना जैसे देशों को काउंटर करने में मदद मिलेगी। यह समझौता एक बार में 5 वर्षों तक के लिए किया गया है और इसके बाद दोनों देश इसे अगले 5 वर्षों तक के लिए बढ़ा सकते हैं। हालांकि भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया से भी लॉजिस्टिकल सपोर्ट से जुड़े समझौते किए हैं। लेकिन इन सभी देशों के साथ रूस जैसा समझौता नहीं है। इन समझौतों के तहत भारतीय सेना को इन देशों की तरफ से लॉजिस्टिक सपोर्ट तो मिलेगा लेकिन इसमें सैनिकों की तैनाती की बात नहीं है। जबकि रेलॉस एग्रीमेंट के तहत भारतीय सेना रूस में भी सैनिक रख सकती है। पिछले साल आई सिपली की रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और रूस भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है।
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