10 ब्राह्मण मंत्री, 46 ब्राह्मण MLA...फिर भी ब्राह्मण नाराज ! चुनाव से पहले मनाने में कितनी कामयाब होगी भाजपा

10 ब्राह्मण मंत्री, 46 ब्राह्मण MLA...फिर भी ब्राह्मण नाराज ! चुनाव से पहले मनाने में कितनी कामयाब होगी भाजपा

बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राम्हण योगी सरकार से नाराज हैं और अगर ब्राह्मण भाजपा से नाराज रहता है तो उसके सत्ता में वापसी की संभावना मुश्किलों में पड़ सकती है। ब्राह्मणों की नाराजगी की कई वजहें बताई जा रही हैं। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो किसी भी दल को सत्ता तक पहुंचाने में ब्राह्मण वोट काफी कारगर साबित होता है।

सीटों के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव है। सभी राजनीतिक दलों के लिए जातिगत समीकरणों को साधना जरूरी और मजबूरी दोनों है। कुल मिलाकर देखें तो मुख्य मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच होता नजर आ रहा है। सपा जहां अपने एमवाई समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में है तो साथ ही साथ कुछ और वर्ग को साधने का प्रयास भी हो रहा है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा सवर्ण और ओबीसी वोट को साधने में है। लेकिन भाजपा के लिए इस बार चुनौती ब्राह्मण वोट है। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राम्हण योगी सरकार से नाराज हैं और अगर ब्राह्मण भाजपा से नाराज रहता है तो उसके सत्ता में वापसी की संभावना मुश्किलों में पड़ सकती है। ब्राह्मणों की नाराजगी की कई वजहें बताई जा रही हैं। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो किसी भी दल को सत्ता तक पहुंचाने में ब्राह्मण वोट काफी कारगर साबित होता है।

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ब्राह्मण कमेटी का गठन 

हालांकि सवाल यह है कि आखिर ब्राम्हण योगी सरकार से नाराज क्यों हैं? योगी सरकार में तो 10 ब्राह्मण मंत्री और विधानसभा में 46 ब्राह्मण विधायक हैं। ऐसे में ब्राह्मणों की नाराजगी को कम करने के लिए भाजपा को कमेटी क्यों बनानी पड़ी। दरअसल, उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनावी प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान ने हाल में ही अपने घर उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण नेताओं की एक बड़ी बैठक बुलाई थी। इस बैठक को में ब्राह्मणों की नाराजगी को लेकर खूब चर्चा हुई। चर्चा के बाद यह तय किया गया कि हर हाल में ब्राह्मणों को मनाया जाना चाहिए और इसकी जिम्मेदारी पूर्व केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला को सौंपी गई। हालांकि जैसे ही इस कमेटी के गठन के खबर आई वैसे ही यह बात भी साफ हो गया कि भाजपा आलाकमान ने राज्य में ब्राह्मणों की नाराजगी की बात को कहीं ना कहीं स्वीकार कर लिया है।

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नेता रहे बेअसर

भाजपा फिलहाल ब्राह्मण चेहरों को आगे जरूर कर रही है। लेकिन कहीं ना कहीं नाराजगी कम होती दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस से भाजपा में आए जितिन प्रसाद को भी कैबिनेट विस्तार में जगह दी गई। यह भी कहा गया कि उनके आने से ब्राह्मणों का पार्टी की तरफ रुझान बढ़ा है। लेकिन कहीं ना कहीं भाजपा की चिंता फिलहाल बरकरार है। ब्राह्मणों का चेहरा बनाकर डॉ दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई। लेकिन वह भी ब्राह्मणों को फिलहाल साधने में नाकाम साबित होते दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा बृजेश पाठक, श्रीकांत शर्मा, रामनरेश अग्निहोत्री जैसे मंत्री भी योगी सरकार में ब्राह्मण है लेकिन मुश्किलें भाजपा के लिए बरकरार है। सतीश चंद्र द्विवेदी, नीलकंठ तिवारी, अनिल शर्मा, आनंद स्वरूप शुक्ला और चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को राज्यमंत्री बनाया गया है बावजूद इसके ब्राह्मणों में भाजपा के प्रति नाराजगी देखी जा रही है। हाल में ही केंद्रीय मंत्री परिषद में अजय मिश्र टेनी को भी शामिल किया गया जो कि ब्राह्मण नेता है। लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में उन पर लगे आरोपों के बीच वर्तमान में पार्टी उन्हें लगातार बचाती हुई दिखाई दे रही है।

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उत्तर प्रदेश में नाराज हुआ ब्राह्मण तो हाथ से निकल सकती है सत्ता

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की राजनीति काफी महत्वपूर्ण रही है। आजादी से लेकर 1989 तक देखे तो उत्तर प्रदेश के छह मुख्यमंत्री ब्राह्मण ही बने थे। हालांकि मंडल और लोहिया के दौर के बाद इसमें बदलाव जरूर हुआ। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 11 से 12 फ़ीसदी हैं। भले ही आंकड़ों के लिहाज से इतनी बड़ी दिखाई ना पड़ती हो लेकिन सरकार बनाने में इसका प्रभाव बहुत है। 2007 में ब्राह्मणों को साध कर ही मायावती ने सत्ता में वापसी की थी। मायावती ने ब्राह्मण और दलित का ऐसा फार्मूला बनाया कि उन्हें यूपी की कमान एक बार फिर से मिल गई। अब देखना होगा कि भाजपा के लिए यह कमेटी कितनी कारगर साबित होती है। लेकिन कहीं ना कहीं पार्टी यह मान चुकी है कि ब्राह्मण उससे नाराज हैं और उन्हें साधना बेहद जरूरी है।





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