Operation Tiger से तंग Aaditya Thackeray के ऐलान ने किया दंग, Varanasi से PM Modi के खिलाफ लड़ेंगे 2029 Lok Sabha Election

Modi Aaditya
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दरअसल वाराणसी कोई सामान्य लोकसभा सीट नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक गढ़ बन चुकी है। 2014 से लेकर 2024 तक के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि मोदी ने यहां केवल चुनाव नहीं जीते बल्कि विपक्ष को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी पराजित किया है।

ऑपरेशन टाइगर का शिकार होने के बाद शिवसेना यूबीटी अब राजनीतिक बेचैनी के दौर से गुजर रही है। पार्टी के युवा नेता और वर्ली के विधायक आदित्य ठाकरे ने ऐसा बयान दे दिया है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह अगला चुनाव फिर वर्ली से ही लड़ेंगे, तो उन्होंने जवाब दिया, "अगर आप कहेंगे तो मैं वाराणसी से लडूंगा।" इस एक वाक्य ने साफ संकेत दे दिया कि आदित्य ठाकरे भविष्य में लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से ताल ठोंकने का सपना देख रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राजनीतिक आत्मविश्वास है या फिर अनुभवहीनता से उपजा एक बचकाना दांव?

दरअसल वाराणसी कोई सामान्य लोकसभा सीट नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक गढ़ बन चुकी है। 2014 से लेकर 2024 तक के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि मोदी ने यहां केवल चुनाव नहीं जीते बल्कि विपक्ष को मनोवैज्ञानिक तौर पर भी पराजित किया है। 2014 में मोदी ने अरविंद केजरीवाल को भारी अंतर से हराया था। 2019 में उनकी जीत का अंतर और बढ़ गया था। 2024 में भी विपक्षी गठबंधन तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी के प्रभाव को तोड़ नहीं पाया। वाराणसी में भाजपा ने केवल संगठन नहीं खड़ा किया बल्कि वहां मोदी की छवि को विकास, हिंदुत्व और राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है।

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गंगा घाटों के सौंदर्यीकरण से लेकर काशी विश्वनाथ धाम परियोजना तक, मोदी ने वाराणसी को अपनी राजनीतिक पहचान का केंद्र बना दिया है। यही कारण है कि वहां भाजपा का चुनाव केवल पार्टी का चुनाव नहीं बल्कि मोदी बनाम बाकी सभी का चुनाव बन जाता है। ऐसे में आदित्य ठाकरे जैसे क्षेत्रीय नेता का वहां जाकर सीधे मोदी को चुनौती देने की बात करना राजनीतिक यथार्थ से कोसों दूर दिखाई देता है।

वैसे आदित्य ठाकरे की अपनी राजनीतिक जमीन भी उतनी मजबूत नहीं रही है जितनी उनकी बयानबाजी है। मुंबई की प्रतिष्ठित वर्ली विधानसभा सीट से वह 2019 में पहली बार विधायक बने थे। उस समय अविभाजित शिवसेना और भाजपा गठबंधन की ताकत उनके साथ थी। लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी राह बेहद कठिन हो गई थी। एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शिवसेना का पारंपरिक वोट बैंक बंट चुका था। आदित्य को जीत तो मिली, लेकिन यह जीत पहले जैसी सहज और दबदबे वाली नहीं थी। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी माना कि यदि मुंबई में ठाकरे परिवार की भावनात्मक पकड़ और पार्टी कैडर का पुराना आधार नहीं होता, तो वर्ली सीट भी हाथ से निकल सकती थी।

ऐसे में जो नेता अपनी पारंपरिक सीट पर कड़ी चुनौती का सामना कर रहा हो, उसका सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके सबसे सुरक्षित गढ़ में चुनौती देने की बात करना परिपक्व राजनीति नहीं बल्कि अपरिपक्व महत्वाकांक्षा अधिक लगती है। वाराणसी में चुनाव केवल उम्मीदवार नहीं जीतता, वहां पूरा राजनीतिक वातावरण मोदी के पक्ष में खड़ा नजर आता है। भाजपा ने हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा पहली बार वाराणसी में ही दिया था और यहां यह नारा नहीं एक राजनीतिक हकीकत है। दूसरी ओर, आदित्य ठाकरे का बयान इसलिए भी हल्का प्रतीत होता है क्योंकि उसमें जमीन से जुड़ी राजनीतिक समझ कम और सुर्खियां बटोरने की कोशिश ज्यादा दिखाई देती है।

दिलचस्प बात यह भी है कि हाल ही में उद्धव ठाकरे ने कहा था कि यदि कभी देवेंद्र फडणवीस प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनते हैं तो शिवसेना यूबीटी उनका समर्थन करेगी। हालांकि उद्धव ने साथ ही यह भी कहा कि भाजपा में ऐसा सपना देखना ही फडणवीस के लिए राजनीतिक आत्महत्या साबित होगा क्योंकि पार्टी नेतृत्व इसकी अनुमति नहीं देगा। उद्धव ठाकरे का यह बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक तरफ वह भाजपा पर हमला बोलते हैं, दूसरी तरफ फडणवीस जैसे भाजपा नेता के लिए समर्थन की बात भी करते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि ठाकरे परिवार अभी भी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए समीकरण तलाश रहा है।

बहरहाल, आदित्य ठाकरे का वाराणसी वाला बयान और उद्धव ठाकरे का फडणवीस को लेकर दिया गया बयान उसी राजनीतिक असमंजस की तस्वीर पेश करते हैं जिसमें शिवसेना यूबीटी इस समय फंसी हुई है। पार्टी एक ओर भाजपा और मोदी के खिलाफ आक्रामक दिखना चाहती है, दूसरी ओर भाजपा के भीतर संभावित शक्ति संतुलन पर नजर भी बनाए हुए है। लेकिन राजनीतिक वास्तविकता यही है कि नरेंद्र मोदी को वाराणसी में चुनावी चुनौती देकर विजय पाना असंभव मिशन है। और जब चुनौती देने वाला नेता खुद अपनी राजनीतिक जमीन पर संघर्ष कर रहा हो, तब यह दांव राजनीतिक परिपक्वता से ज्यादा बचपने का प्रदर्शन ही लगता है।

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