Allahabad High Court ने दुष्कर्म और अपहरण मामले में 38 साल बाद व्यक्ति को किया बरी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मेरठ की सत्र अदालत द्वारा 1988 में सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए सुभाष को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। जस्टिस अब्दुल शाहिद ने स्पष्ट किया कि आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं होगी।
प्रयागराज (उप्र), आठ अक्टूबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दुष्कर्म और अपहरण के एक मामले में दोषी ठहराये गये व्यक्ति की सजा को 38 साल बाद रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामला साबित करने में नाकाम रहा। उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहा।
न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने मेरठ सत्र न्यायालय द्वारा 1988 में सुभाष को दोषी ठहराए जाने के खिलाफ दायर आपराधिक अपील को मंजूरी दे दी। यह फैसला निचली अदालत के फैसले के लगभग 38 साल बाद आया है। उच्च न्यायालय ने सात अक्टूबर के अपने फैसले में यह भी निर्देश दिया कि चूंकि सुभाष विचारण के दौरान जमानत पर थे, इसलिए उन्हें आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं है और उनकी जमानत की जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी।
इस अपील में निचली अदालत द्वारा 26 सितंबर 1988 को दिए गए फैसले और आदेश को चुनौती दी गई थी। इस फैसले में सुभाष को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363 (अपहरण), धारा 366 (शादी के लिए मजबूर करने या गैर-कानूनी संबंध बनाने के लिए महिला का अपहरण) और धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत दोषी ठहराया गया था। अपीलकर्ता के वकील के अनुसार, कथित घटना 25 फरवरी 1986 को हुई थी, लेकिन प्राथमिकी एक दिन बाद दर्ज की गई थी।
यह तर्क दिया गया कि महिला को कोई चोट नहीं आई थी और उसकी मेडिकल जांच में दुष्कर्म का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अपील का विरोध करते हुए, राज्य के वकील ने कहा कि महिला पीड़ित पक्ष थी जिसने सत्र न्यायालय की सुनवाई में हिस्सा लिया और वह एक ‘विश्वसनीय गवाह’ है, जिसकी गवाही ही दोषसिद्धि और सज़ा को बनाए रखने के लिए काफी थी। हालांकि, उच्च न्यायालय अभियोजन पक्ष के मामले से सहमत नहीं हुआ और उसने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया।
अन्य न्यूज़















