Allahabad High Court का फैसला: समय पूर्व रिहाई में मनमानी नहीं होगी, आदेश रद्द

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हत्या के प्रयास के मामले में सात वर्ष की सजा काट रहे दोषी की समय पूर्व रिहाई खारिज करने का आदेश रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। अदालत ने रिहाई के प्रस्ताव पर राज्यपाल के समक्ष एक महीने के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत समय पूर्व रिहाई देने की राज्यपाल की शक्ति एक संप्रभु कार्यकारी शक्ति है, लेकिन इसका मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि यह शक्ति लागू नियमों और सजा में छूट देने की नीति से नियंत्रित होती है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत सात साल की सजा पाए एक दोषी को समय पूर्व रिहा करने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने पाया कि समय पूर्व रिहाई से इनकार करने का फैसला एक तथ्यात्मक त्रुटि के कारण था, क्योंकि अभिलेखों में याचिकाकर्ता द्वारा गुजारी गई कारावास अवधि गलत दर्ज की गई थी।

फतेहपुर के अपर सत्र न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता राम प्रताप सिंह को हत्या के प्रयास के एक मामले में 2002 में दोषी ठहराया था और सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। उस पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। उच्च न्यायालय में उसकी आपराधिक अपील 2019 में खारिज कर दी गई थी।

इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने भी उसकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी थी। सितंबर 2022 में जेल अधिकारियों और फतेहपुर के जिलाधिकारी को उसकी समय पूर्व रिहाई का प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन उस पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसके बाद याचिकाकर्ता ने फरवरी 2025 में आवेदन देकर अपने प्रस्ताव पर निर्णय लेने का अनुरोध किया।

उसने कहा था कि वह अपनी आधी से अधिक सजा काट चुका है। जेल रिपोर्ट के अनुसार, उसने बिना छूट के चार वर्ष, छह महीने और छह दिन तथा छूट सहित पांच वर्ष और चार महीने की सजा काटी थी। उसकी कुल सजा सात वर्ष थी और जेल में उसका आचरण संतोषजनक पाया गया था।

हालांकि, जून 2025 में उसे समय पूर्व रिहा करने से इस आधार पर इनकार कर दिया गया कि उसने बिना छूट के केवल दो वर्ष और छह दिन तथा छूट सहित दो वर्ष, एक महीने और 27 दिन की सजा काटी है। उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इस निर्णय में जेल की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया गया और याचिकाकर्ता द्वारा जेल में बिताई गई अवधि की गणना गलत तरीके से की गई। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित आदेश में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी प्रतिकूल सामग्री का उल्लेख नहीं किया गया था।

अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश बंदी रिहाई, 1983 के नियम 4 के उपनियम (3) के तहत एक दोषी व्यक्ति बिना छूट के अपनी एक-तिहाई सजा काटने के बाद समय पूर्व रिहाई के लिए पात्र हो जाता है। अदालत ने पाया कि दोषी अपनी कुल सजा की आधी से अधिक अवधि पहले ही काट चुका था। अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की शक्ति की प्रकृति पर अदालत ने कहा कि इसका मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं किया जा सकता।

अदालत ने हालांकि कहा कि यदि कारावास की सही अवधि की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी गई होती, तो मामले में निष्कर्ष अलग हो सकता था। इसके मद्देनजर उच्च न्यायालय ने रिट याचिका स्वीकार कर ली और 26 जून 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें समय पूर्व रिहाई से इनकार किया गया था। अदालत ने 10 अगस्त 2026 को दिए अपने फैसले में समय पूर्व रिहाई के अनुरोध पर एक महीने के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामला राज्यपाल के समक्ष भेज दिया।

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