शुरुआती हिरासत गैर-कानूनी तो बाद की Arrest भी अमान्य, Allahabad High Court का फैसला

शुरुआती हिरासत गैर-कानूनी तो बाद की Arrest भी अमान्य, Allahabad High Court का फैसला
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रयागराज निवासी रवि चौरसिया को 31 घंटे तक बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए अवैध हिरासत में रखने पर रिहा करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि आरंभिक गैर-कानूनी हिरासत के बाद की गई गिरफ्तारी भी अमान्य हो जाती है। अदालत ने सोरांव थाना पुलिस की लापरवाही को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी।

प्रयागराज (उप्र), सात अक्टूबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रयागराज के एक निवासी को रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की शुरुआती हिरासत गैर-कानूनी होती है तो उसके बाद वैध आधारों पर की गई आधारित गिरफ्तारी और उससे जुड़ी रिमांड की कार्यवाही भी अमान्य हो जाती है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने प्रयागराज के सोरांव थाने की पुलिस द्वारा रवि चौरसिया नामक व्यक्ति की कथित गैर-कानूनी हिरासत से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की शुरुआती हिरासत गैर-कानूनी होती है तो उसके बाद की गिरफ्तारी (भले ही वह वैध आधारों पर आधारित हो) और उससे जुड़ी रिमांड की कार्यवाही भी अमान्य हो जाती है।

अदालत के गत 28 सितंबर के आदेश में कहा गया है कि चौरसिया को औपचारिक गिरफ्तारी या मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये बगैर लगभग 31 घंटे तक पुलिस हिरासत में रखने के बाद 16 सितंबर को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था। याचिका के अनुसार, चौरसिया को 14 सितंबर को अयोध्या से हिरासत में लेकर सोरांव थाने लाया गया, लेकिन उस समय गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई थी। चौरसिया की मां 15 सितंबर को उसका हाल जानने के लिए थाने गईं और बाद में गैर-कानूनी हिरासत का आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।

पुलिस ने गत 16 सितंबर को पूर्वाह्न 10 बजकर 45 मिनट पर चौरसिया को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया, गिरफ्तारी को रोजनामचे (जीडी) में दर्ज किया, उसका चिकित्सीय परीक्षण कराया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जिन्होंने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उच्च न्यायालय ने थाने से सीसीटीवी फुटेज मंगवाई थी, जिसके आधार पर अदालत ने पाया कि थानाध्यक्ष और जांच अधिकारी द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे में यह स्वीकार किया गया था कि चौरसिया पुलिस हिरासत में था। थानाध्यक्ष ने रोजनामचे में उसकी मौजूदगी दर्ज न किए जाने को अनजाने में हुई गलती बताया, लेकिन अदालत ने इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि एक अनुभवी पुलिस अधिकारी रोजनामचे में यह प्रविष्टि करने में चूक नहीं कर सकता था कि याचिकाकर्ता को थाने लाया गया था और हिरासत में रखा गया था। न्यायालय ने पाया कि औपचारिक गिरफ्तारी तब की गई जब पुलिस को 15 सितंबर को दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बारे में पता चला। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चौरसिया को रिमांड के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये बगैर 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया था।

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