जिस Bangladesh को बनवाया, वही हुआ खिलाफ, Ashok Gehlot ने 1971 War याद दिला साधा निशाना

एक पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही बर्बरता की खबरों को "चिंताजनक" बताया। उन्होंने कहा कि पांच हिंदुओं की हत्या और महिलाओं के खिलाफ किए गए अत्याचार मानवता पर कलंक हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को याद करते हुए, गहलोत ने बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाओं के बढ़ने पर चिंता व्यक्त की और इसे भारत सरकार की कूटनीति की विफलता बताया।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हुए हमलों की निंदा की और पड़ोसी देश के प्रति भारत सरकार के कूटनीतिक दृष्टिकोण की आलोचना की। एक पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही बर्बरता की खबरों को "चिंताजनक" बताया। उन्होंने कहा कि पांच हिंदुओं की हत्या और महिलाओं के खिलाफ किए गए अत्याचार मानवता पर कलंक हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को याद करते हुए, गहलोत ने बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाओं के बढ़ने पर चिंता व्यक्त की और इसे भारत सरकार की कूटनीति की विफलता बताया।
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गहलोत ने कहा, बांग्लादेश से हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही बर्बरता की खबरें चिंताजनक हैं। महज 19 दिनों में 5 हिंदुओं की हत्या और वहां महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार मानवता पर कलंक हैं। 1971 के उस दौर की यादें आज भी ताजा हैं, जब श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने न केवल कूटनीतिक दृढ़ता दिखाई, बल्कि अपने दृढ़ संकल्प से इतिहास और भूगोल दोनों को बदल दिया। उन्होंने अमेरिका जैसी महाशक्ति की भी परवाह नहीं की, जिसने भारत के खिलाफ अपना सातवां बेड़ा भेजा था। यह भी चिंताजनक है कि जिस देश के निर्माण में भारत ने ही मदद की थी, वह भारत के खिलाफ हो गया है। यह भारत सरकार की कूटनीतिक विफलता है। पूर्व मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के जीवन और गरिमा की रक्षा करना भारत का नैतिक और कूटनीतिक दायित्व है।
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गहलोत ने कहा, "केंद्र सरकार को 'गहरी चिंता' व्यक्त करने जैसे औपचारिक बयानों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने चाहिए। पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों के जीवन और गरिमा की रक्षा करना हमारा नैतिक और कूटनीतिक दायित्व है। इतिहास गवाह है कि निर्दोषों की जान केवल खोखले नारों से नहीं, बल्कि निर्णायक नेतृत्व से बचाई जा सकती है। प्रधानमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर प्रभावी दबाव डालना चाहिए।
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