Prabhasakshi NewsRoom: केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के 4 करीबी सहयोगियों को अचानक पद से हटाया गया, विपक्ष ने पूछा- क्या गड़बड़ी हुई थी?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि किसी मंत्री के पूरे कार्यालय में एक ही दिन में इस प्रकार व्यापक बदलाव किए जाते हैं तो यह कोई सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं मानी जा सकती।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मामलों के मंत्री भूपेंद्र यादव के चार प्रमुख सहयोगियों को एक साथ हटाए जाने के फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। मंत्रालय की ओर से तीन जुलाई को जारी अलग अलग आदेशों के माध्यम से मंत्री के निजी सचिव, दो अतिरिक्त निजी सचिव और एक सहायक निजी सचिव को तत्काल प्रभाव से उनके पदों से मुक्त कर दिया गया। इस असामान्य प्रशासनिक कदम के बाद विपक्षी कांग्रेस ने सरकार से पूरे मामले पर जवाब मांगा है और इसे गंभीर राजनीतिक संकेत बताया है।
मंत्रालय के आदेश के अनुसार मंत्री के निजी सचिव अमर सिंह को प्रशासनिक आधार पर उनके मूल विभाग राजस्व विभाग में तत्काल प्रभाव से वापस भेज दिया गया है। भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी अमर सिंह को वर्ष 2021 में उस समय मंत्री का निजी सचिव नियुक्त किया गया था, जब भूपेंद्र यादव श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे। बाद में उन्हें निदेशक स्तर तक पदोन्नत किया गया था। उनके कार्यकाल की अवधि सितंबर 2026 तक निर्धारित थी, लेकिन उससे पहले ही उन्हें वापस भेज दिया गया।
इसी प्रकार मंत्री के अतिरिक्त निजी सचिव शैलेश कुमार सिंह को भी समय से पहले उनके मूल विभाग कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में वापस भेजने का आदेश जारी किया गया। आदेश में विस्तारित कूलिंग ऑफ अवधि का भी उल्लेख किया गया है। वहीं एक अन्य अतिरिक्त निजी सचिव आयुष सारण की नियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई है। मंत्रालय के अवर सचिव विभूति पंजियार द्वारा जारी आदेश की प्रतियां प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रिमंडल सचिवालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग सहित संबंधित विभागों को भी भेजी गई हैं।
बाद में यह भी सामने आया कि मंत्री के सहायक निजी सचिव सिद्धार्थ यादव की नियुक्ति भी तीन जुलाई के ही एक अलग आदेश के माध्यम से तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई। इस प्रकार मंत्री के चार प्रमुख सहयोगियों को एक साथ हटाए जाने का मामला और अधिक चर्चा का विषय बन गया।
भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के अनुसार सिद्धार्थ यादव मंत्री भूपेंद्र यादव के सबसे पुराने और सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। दोनों का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शुरुआती दौर से बताया जाता है। सूत्रों का कहना है कि सिद्धार्थ यादव केवल मंत्री के प्रशासनिक कार्यों का संचालन ही नहीं करते थे, बल्कि कार्यालय के आने जाने वाले पत्र व्यवहार की निगरानी भी करते थे। इसके साथ ही विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी उनका नियमित संपर्क रहता था।
सूत्रों के अनुसार सिद्धार्थ यादव को एक राजनीतिक नियुक्ति के रूप में मंत्री के निजी स्टाफ में शामिल किया गया था। उनकी नियुक्ति जून 2024 से मंत्री के कार्यकाल के साथ जुड़ी हुई थी। इसके बावजूद उनकी सेवा भी बिना किसी सार्वजनिक कारण के समाप्त कर दी गई।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्रालय ने चारों अधिकारियों और सहयोगियों को हटाए जाने के पीछे कोई स्पष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किया है। केवल अमर सिंह के मामले में प्रशासनिक आधार का उल्लेख किया गया है, जबकि अन्य आदेशों में समय से पहले वापसी अथवा नियुक्ति समाप्त किए जाने की जानकारी दी गई है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से इस संबंध में प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई।
इस घटनाक्रम ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर भी दे दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटनाक्रम चौंकाने वाला है। उन्होंने सवाल उठाया कि मौजूदा व्यवस्था में इस प्रकार की नियुक्तियां किस प्रकार होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि क्या बिना किसी कारण इतना बड़ा घटनाक्रम संभव है या फिर चंदा दो, धंधा लो जैसी व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ी सामने आई है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि किसी मंत्री के पूरे कार्यालय में एक ही दिन में इस प्रकार व्यापक बदलाव किए जाते हैं तो यह कोई सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं मानी जा सकती। उन्होंने कहा कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि आखिर ऐसा क्या हुआ, क्या सामने आया और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी केंद्रीय मंत्री के चार प्रमुख सहयोगियों को एक साथ हटाया जाना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से अलग घटना है। चूंकि सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक अटकलों का दौर तेज हो गया है। विपक्ष लगातार जवाब मांग रहा है, जबकि सरकार और मंत्रालय की चुप्पी इस मामले को और अधिक रहस्यमय बना रही है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार इस फैसले के पीछे की वास्तविक वजह सार्वजनिक करेगी या यह मामला केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रह जाएगा।
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